सुबह के पांच बज रहे थे ...कालका मेल धीरे धीरे कालका स्टेशन के प्लेटफार्म पर लग रही थी ! सब की जानी पहचानी आवाज चाय चाय चाय सुनाई देने लगी थी ! सब सुकून से बैठे थे !
किसी को जल्दी नहीं थी ट्रेन से उतरने की ! यहाँ के बाद अगली ट्रेन कोई तीन घंटो के बाद थी !
तीस लोगो का ग्रुप था ! दिल्ली से कालका होते हुए शिमला के लिए निकला था ! उज्जवल ने सारा इन्तेजाम किया था अपनी शादी की ख़ुशी में ! दोस्तों ,रिश्तेदारों को ले कर घूमने निकला था !
सब अपने अपने सामान के साथ कालका के प्लेटफोर्म पर ठाकाहे लगा रहे थे ! आने जाने वाले उनको देख देख कर अपने ज़माने को याद कर रहे थे ...जब वो ऐसे मजा करते थे ! फिर उम्र और जिम्मेदारियों के साथ साथ सब पिघल गया जीवन की मोमबत्ती की तरह !
उज्जवल ने सबका धयान अपनी और खीचा :हाँ भाई लोग कौन कोन समोसे खायगा और
कौन कौन ब्रेड पकोड़े और कौन कौन ये दोनों खायेगा जल्दी बोलो , आर्डर करना है !
सब एक साथ बोल रहे थे ! किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था !
उज्जवल : ठीक है सब के लिए सब ले लेता हूँ !
दूर खड़ा रवि ये सब देख रहा था !
रवि हाँ वहीँ की एक बड़ी मिठाई की दूकान पर काम करता है ! उज्जवल ने उसे ही बुलाया था अपने ग्रुप के लिए नाश्ते का इंतज़ाम करने के लिए !
उज्जवल : देख रवि तू देख ही रहा है यहाँ कुछ भी क्लियर नहीं है तो तू एसा कर तीस समोसे , तीस ब्रेड पकोड़े और पचास कप चाय का इन्तेजाम कर दे ! ये पकड़ दो हज़ार रुपे बाकि हिसाब बाद में करता हूँ !
रवि : ठीक है जी ! आधा घंटा लगेगा !
उज्जवल : हाँ कोई बात नहीं ! वैसे भी ये लोग वेटिंग रूम में फ्रेश होने में इस से कम समय कहाँ लेंगे ! जा तू जल्दी से शुरू हो जा !
रवि मुस्कुराता हुआ दूकान की और लपका !
अभी अभी दूकान पर आये फ़िरोज़ भाई रवि को और उज्जवल को देर से देख रहे थे !
रवि : भाई साब बड़ा आर्डर मिला है ...और एक सांस में उज्जवल का पूरा ऑर्डर उसने फ़िरोज़ भाई को बता दिया !
फ़िरोज़ भाई : चल तो फिर चाय तुम देख लो बाकि मैं करवा लेता हूँ !
एक चाय देना : एक रोज़ के ग्राहक ने उन दोनों की वार्ता को विराम लगाया !
रवि : सर आधे घंटे के बाद दे सकूँगा !
ग्राहक : क्यों ?
रवि : बस दूकान अभी अभी खोली है ना ...ज़रा संभाल लूं फिर देता हूँ !
ग्राहक : ठीक है !
दर असल रवि उज्जवल के ऑर्डर को पूरा करने की ख़ुशी में था !
सबेरे के छे बजे पूरी दूकान के लोग काम पर लगे थे ! कोई बेसन ! कोई आलू ! कोई मैदा ! कोई तेल और कोई चाय के साथ उलझा हुआ था !
फ़िरोज़ भाई समोसे तल रहे थे बीच बीच में उज्जवल की तरफ देख लेते थे ! कुछ तलाश रहे थे वो उज्जवल में , शायद !
उज्जवल भी इधर उधर घूमता फिरता नाश्ते की खबर ले लेता था और वो भी फ़िरोज़ भाई को छुपी निगाह से देख लेता था ....कुछ वो भी तलाश रहा था उनमे शायद !
गरमा गरम समोसे , ब्रेड पकोड़े और चाय से उठती भाप , कालका स्टेशन की हवा में नरम हलकी नारंगी धुप में प्रकृति का अनोखा आनंद दे रही थी !
सब अपने अपने अनुभव एक दुसरे से साँझा करते हुए आनंद ले रहे थे ! इस बीच उज्जवल ने एक समोसा दूर पोल से सहारे खड़े रवि की और बढ़ा दिया एक कप चाय के साथ ! कितना अपनत्व , कितनी निकटता , कितना समर्पण ...!
उज्जवल ऐसा ही है शुरू से ! फ़िरोज़ भाई के मुह से धीरे से निकल गया !
रवि को वो फ़िरोज़ भाई की आवाज़ सुनाई दे गयी !
आप , आप जानते हैं इनको ? रवि ने जैसे अपनी गति से चलती हुई रहस्यमय पुरानी फिल्म का अंत सबको इंटरवेल से पहले बता दिया हो !
सबका धयान रवि और फ़िरोज़ भाई की तरफ गया !
याकूब बोला : उज्जवल भाई कोई पुराना रिश्ता लगता है तुम्हारा इस जगह से ! अब बता भी दो भाई !
इसी बीच फ़िरोज़ भाई धीरे धीरे चलते हुए ग्रुप के बीच आ गए थे ! पांच वक़्त के नमाज़ी ! चौड़ा माथा ! मेहदी लगे बाल ! ढीले ढाले कुर्ते पायजामे में एक गंभीर वयकतितव ! सब ने उनको बैठने के लिए जगह दी !
फ़िरोज़ भाई एक बड़े से काले संदूक पर बैठ गए और उनके घुटनों के सहारे से ज़मीन पर उज्जवल भी बैठ गया ! ऐसे जैसे बरसों से अनाम , अनजान और अनिश्चित दूर मंजिल की और बढ़ता हुआ कोई मुसाफिर बीच राह में बैठ जाता है !
अब तक फ़िरोज़ भाई और उज्जवल एक दुसरे को पहचान चुके थे ! कोई संवाद नहीं हुआ एक दुसरे से फिर भी दोनों ने एक दुसरे को बधाई दी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की आज मिला ही दिया !
फ़िरोज़ भाई : क्यों भाई जवान कोई ग्लानी तो नहीं होगी ना मेरे यहाँ तुम्हारे दोस्तों के बीच में आ जाने से ?
उज्जवल : क्या भाई आप कैसी बात कर रहे हैं ?
याकूब : सर आप कैसे जानते हैं हमारे उज्जवल सर को ?
फ़िरोज़ भाई ने अपना दाहिना हाथ उज्जवल के बालों पर फेरते हुए कहा : छोटे मिया क्या कहते हो सब बता दूं ये थोडा थोडा ?
उज्जवल : सब !
फ़िरोज़ भाई : सब कुछ ?
उज्जवल : हाँ एक एक बात !
फ़िरोज़ भाई : तू सच बोल रहा है ना ?
उज्जवल : जी बिलकुल - उज्जवल की ऑंखें नाम थीं !
बाकि के समोसे और चाय अपनी बारी का इन्तेजार कर रहे थे की कोई उनका लुत्फ़ के लेकिन यहाँ तो कुछ और ही खुलासा होने वाला था , सब उसका इंतज़ार कर रहे थे !
उज्जवल आज एक बड़ी कंपनी के एक बड़े औहदे पर था ! उसने सारी पढाई दिल्ली से की थी ! अपने बल बूते पर ! फ़िरोज़ भाई बोल रहे थे !
बात कोई बीस बरस पहले की है ! एक सुन्दर सा हाफ नेकर में गुलाबी गालों वाला लड़का जिसने पास के ही सरकारी स्कूल की ड्रेस पहनी हुई थी मेरी दूकान पर आया सुबह के कोई दस बजे का समय था और बोला: मुझे चाय दीजिये मैं छोटी गाड़ी में सब से पहले बीच दूंगा !
मैंने उसे बिना कुछ पूछे एक केतली में चार कप चाय दी और दो गिलास दिए ! वो आधे घंटे में सब बेच का आगया ! फिर चार कप ले गया और फिर वापस आ गया सिर्फ बीस मिनट में ! इतने सारे लोगो के बीच उसका अंदाज़ निराला था और लोग बाकि को छोड़ कर उससे ही चाय ले कर पीते थे ! ये सिलसिला रोज़ का हो गया ! एक दिन दो में से एक ग्लास टूट गया ! मैंने उसके पेसे उस के उस दिन के मेहनताने से काट लिए ! इस लिए नहीं की मुझे नुक्सान हुआ बल्कि इस लिए की इस को मेहनत का और भी अंदाज़ा हो !
दो दिनों बाद ये अपने बचाए हए पैसों से चाल कांच के गिलास ले आया ! बड़े ही सुन्दर थे वो ! अब मुझ से बस चाय लेता था ! गिलास नहीं ! अब वो दिन में चार केतली चाय बेच लेता था ! दादा और दादी के गुजरने के बाद मैंने इसको दिल्ली के एक पहचानवाले के पास भेज दिया ! ये सोच कर की चाय बेच कर सिर्फ ये अपनी ज़िन्दगी चलाएगा जब की मुझे इस में दुनिया को दिशा देने की काबिलियत दिखती थी ! फिर धीरे धीरे ये अपनी पढाई और वहां के एक बड़े अखबार के साथ मस्त हो गया और फिर मुझ से दूर ...और मैं इस से दूर ! आज फिर से करीब हैं !
सब लोग अपनी सांस रोके फ़िरोज़ भाई के एक एक शब्दों को सुन रहे थे ! उज्जवल आज कितना काबिल है ! उसने कभी अपनी पिचलि ज़न्दगी के ज़िक्र किसी से नहीं किया और सब का ख्याल रखा ! आज भी सब का गार्जियन बना हुआ है ! कितने अनाथ बच्चों की देख रेख का खर्च उठता है वो , सब को पता है !
फ़िरोज़ भाई बोले : उज्जवल मिया छोटी गाड़ी आ गयी है , शिमला नहीं जाओगे ?
उज्जवल : हाँ , जाऊंगा तो पर आज नहीं !
फ़िरोज़ भाई : तो आज का क्या करोगे ?
उज्जवल : कांच के गिलास खरीदूंगा !
फ़िरोज़ भाई : वो क्यों ?
उज्जवल : ताकि फिर बीस बरस अपनों से दूरी न रहे !
फ़िरोज़ भाई मुस्कुराते हुए अपनी सुरमे वाली आँखों का पानी पोछ रहे थे और उज्जवल उनके कुर्ते की जेब से अपना वो ही एक बचा हुआ कांच का गिलास निकाल कर छु कर अपना बचपन याद कर रहा था !
वातावरण में ख़ामोशी थी !
सब चुप चाप छोटी टॉय ट्रेन मे अपनी अपनी सीट पर बैठ गए थे !
सूरज पूरे तौर पर निकल चूका था ! चुभन वाली बर्फीली हवाएं कब की जा चुकी थी !
गार्ड ने एक लम्बी सीटी मारी ! ट्रेन ने भी जोर से आवाज लगायी ! उज्जवल का ध्यान गया की ट्रेन सरक रही है ! वो ट्रेन पर चढ़ गया ! जसे बीस बरस पहले चढ़ गया था ....तब ना आने के लिए ...और आज जल्दी से लौट आने के लिए !
नए कांच के गिलास महंगे हो गए हैं लेकिन वो एक बचा कांच का गिलास सब से मूल्यवान है जो आज फ़िरोज़ भाई ने उज्जवल को दिया .....ट्रेन गहरे लकड़ी के पुल से गुजर रही थी और खिड़की के सहारे से बैठा उज्जवल अपनी बचपन की कमाई का पहला सौदा निहार रहा था बचपन के सब कुछ उसके सामने था जैसे कल ही की बात हो ......!!
ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो चली थी .... शिमला आने वाला था !
तीस लोगो का ग्रुप था ! दिल्ली से कालका होते हुए शिमला के लिए निकला था ! उज्जवल ने सारा इन्तेजाम किया था अपनी शादी की ख़ुशी में ! दोस्तों ,रिश्तेदारों को ले कर घूमने निकला था !
सब अपने अपने सामान के साथ कालका के प्लेटफोर्म पर ठाकाहे लगा रहे थे ! आने जाने वाले उनको देख देख कर अपने ज़माने को याद कर रहे थे ...जब वो ऐसे मजा करते थे ! फिर उम्र और जिम्मेदारियों के साथ साथ सब पिघल गया जीवन की मोमबत्ती की तरह !
उज्जवल ने सबका धयान अपनी और खीचा :हाँ भाई लोग कौन कोन समोसे खायगा और
कौन कौन ब्रेड पकोड़े और कौन कौन ये दोनों खायेगा जल्दी बोलो , आर्डर करना है !
सब एक साथ बोल रहे थे ! किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था !
उज्जवल : ठीक है सब के लिए सब ले लेता हूँ !
दूर खड़ा रवि ये सब देख रहा था !
रवि हाँ वहीँ की एक बड़ी मिठाई की दूकान पर काम करता है ! उज्जवल ने उसे ही बुलाया था अपने ग्रुप के लिए नाश्ते का इंतज़ाम करने के लिए !
उज्जवल : देख रवि तू देख ही रहा है यहाँ कुछ भी क्लियर नहीं है तो तू एसा कर तीस समोसे , तीस ब्रेड पकोड़े और पचास कप चाय का इन्तेजाम कर दे ! ये पकड़ दो हज़ार रुपे बाकि हिसाब बाद में करता हूँ !
रवि : ठीक है जी ! आधा घंटा लगेगा !
उज्जवल : हाँ कोई बात नहीं ! वैसे भी ये लोग वेटिंग रूम में फ्रेश होने में इस से कम समय कहाँ लेंगे ! जा तू जल्दी से शुरू हो जा !
रवि मुस्कुराता हुआ दूकान की और लपका !
अभी अभी दूकान पर आये फ़िरोज़ भाई रवि को और उज्जवल को देर से देख रहे थे !
रवि : भाई साब बड़ा आर्डर मिला है ...और एक सांस में उज्जवल का पूरा ऑर्डर उसने फ़िरोज़ भाई को बता दिया !
फ़िरोज़ भाई : चल तो फिर चाय तुम देख लो बाकि मैं करवा लेता हूँ !
एक चाय देना : एक रोज़ के ग्राहक ने उन दोनों की वार्ता को विराम लगाया !
रवि : सर आधे घंटे के बाद दे सकूँगा !
ग्राहक : क्यों ?
रवि : बस दूकान अभी अभी खोली है ना ...ज़रा संभाल लूं फिर देता हूँ !
ग्राहक : ठीक है !
दर असल रवि उज्जवल के ऑर्डर को पूरा करने की ख़ुशी में था !
सबेरे के छे बजे पूरी दूकान के लोग काम पर लगे थे ! कोई बेसन ! कोई आलू ! कोई मैदा ! कोई तेल और कोई चाय के साथ उलझा हुआ था !
फ़िरोज़ भाई समोसे तल रहे थे बीच बीच में उज्जवल की तरफ देख लेते थे ! कुछ तलाश रहे थे वो उज्जवल में , शायद !
उज्जवल भी इधर उधर घूमता फिरता नाश्ते की खबर ले लेता था और वो भी फ़िरोज़ भाई को छुपी निगाह से देख लेता था ....कुछ वो भी तलाश रहा था उनमे शायद !
गरमा गरम समोसे , ब्रेड पकोड़े और चाय से उठती भाप , कालका स्टेशन की हवा में नरम हलकी नारंगी धुप में प्रकृति का अनोखा आनंद दे रही थी !
सब अपने अपने अनुभव एक दुसरे से साँझा करते हुए आनंद ले रहे थे ! इस बीच उज्जवल ने एक समोसा दूर पोल से सहारे खड़े रवि की और बढ़ा दिया एक कप चाय के साथ ! कितना अपनत्व , कितनी निकटता , कितना समर्पण ...!
उज्जवल ऐसा ही है शुरू से ! फ़िरोज़ भाई के मुह से धीरे से निकल गया !
रवि को वो फ़िरोज़ भाई की आवाज़ सुनाई दे गयी !
आप , आप जानते हैं इनको ? रवि ने जैसे अपनी गति से चलती हुई रहस्यमय पुरानी फिल्म का अंत सबको इंटरवेल से पहले बता दिया हो !
सबका धयान रवि और फ़िरोज़ भाई की तरफ गया !
याकूब बोला : उज्जवल भाई कोई पुराना रिश्ता लगता है तुम्हारा इस जगह से ! अब बता भी दो भाई !
इसी बीच फ़िरोज़ भाई धीरे धीरे चलते हुए ग्रुप के बीच आ गए थे ! पांच वक़्त के नमाज़ी ! चौड़ा माथा ! मेहदी लगे बाल ! ढीले ढाले कुर्ते पायजामे में एक गंभीर वयकतितव ! सब ने उनको बैठने के लिए जगह दी !
फ़िरोज़ भाई एक बड़े से काले संदूक पर बैठ गए और उनके घुटनों के सहारे से ज़मीन पर उज्जवल भी बैठ गया ! ऐसे जैसे बरसों से अनाम , अनजान और अनिश्चित दूर मंजिल की और बढ़ता हुआ कोई मुसाफिर बीच राह में बैठ जाता है !
अब तक फ़िरोज़ भाई और उज्जवल एक दुसरे को पहचान चुके थे ! कोई संवाद नहीं हुआ एक दुसरे से फिर भी दोनों ने एक दुसरे को बधाई दी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की आज मिला ही दिया !
फ़िरोज़ भाई : क्यों भाई जवान कोई ग्लानी तो नहीं होगी ना मेरे यहाँ तुम्हारे दोस्तों के बीच में आ जाने से ?
उज्जवल : क्या भाई आप कैसी बात कर रहे हैं ?
याकूब : सर आप कैसे जानते हैं हमारे उज्जवल सर को ?
फ़िरोज़ भाई ने अपना दाहिना हाथ उज्जवल के बालों पर फेरते हुए कहा : छोटे मिया क्या कहते हो सब बता दूं ये थोडा थोडा ?
उज्जवल : सब !
फ़िरोज़ भाई : सब कुछ ?
उज्जवल : हाँ एक एक बात !
फ़िरोज़ भाई : तू सच बोल रहा है ना ?
उज्जवल : जी बिलकुल - उज्जवल की ऑंखें नाम थीं !
बाकि के समोसे और चाय अपनी बारी का इन्तेजार कर रहे थे की कोई उनका लुत्फ़ के लेकिन यहाँ तो कुछ और ही खुलासा होने वाला था , सब उसका इंतज़ार कर रहे थे !
उज्जवल आज एक बड़ी कंपनी के एक बड़े औहदे पर था ! उसने सारी पढाई दिल्ली से की थी ! अपने बल बूते पर ! फ़िरोज़ भाई बोल रहे थे !
बात कोई बीस बरस पहले की है ! एक सुन्दर सा हाफ नेकर में गुलाबी गालों वाला लड़का जिसने पास के ही सरकारी स्कूल की ड्रेस पहनी हुई थी मेरी दूकान पर आया सुबह के कोई दस बजे का समय था और बोला: मुझे चाय दीजिये मैं छोटी गाड़ी में सब से पहले बीच दूंगा !
मैंने उसे बिना कुछ पूछे एक केतली में चार कप चाय दी और दो गिलास दिए ! वो आधे घंटे में सब बेच का आगया ! फिर चार कप ले गया और फिर वापस आ गया सिर्फ बीस मिनट में ! इतने सारे लोगो के बीच उसका अंदाज़ निराला था और लोग बाकि को छोड़ कर उससे ही चाय ले कर पीते थे ! ये सिलसिला रोज़ का हो गया ! एक दिन दो में से एक ग्लास टूट गया ! मैंने उसके पेसे उस के उस दिन के मेहनताने से काट लिए ! इस लिए नहीं की मुझे नुक्सान हुआ बल्कि इस लिए की इस को मेहनत का और भी अंदाज़ा हो !
दो दिनों बाद ये अपने बचाए हए पैसों से चाल कांच के गिलास ले आया ! बड़े ही सुन्दर थे वो ! अब मुझ से बस चाय लेता था ! गिलास नहीं ! अब वो दिन में चार केतली चाय बेच लेता था ! दादा और दादी के गुजरने के बाद मैंने इसको दिल्ली के एक पहचानवाले के पास भेज दिया ! ये सोच कर की चाय बेच कर सिर्फ ये अपनी ज़िन्दगी चलाएगा जब की मुझे इस में दुनिया को दिशा देने की काबिलियत दिखती थी ! फिर धीरे धीरे ये अपनी पढाई और वहां के एक बड़े अखबार के साथ मस्त हो गया और फिर मुझ से दूर ...और मैं इस से दूर ! आज फिर से करीब हैं !
सब लोग अपनी सांस रोके फ़िरोज़ भाई के एक एक शब्दों को सुन रहे थे ! उज्जवल आज कितना काबिल है ! उसने कभी अपनी पिचलि ज़न्दगी के ज़िक्र किसी से नहीं किया और सब का ख्याल रखा ! आज भी सब का गार्जियन बना हुआ है ! कितने अनाथ बच्चों की देख रेख का खर्च उठता है वो , सब को पता है !
फ़िरोज़ भाई बोले : उज्जवल मिया छोटी गाड़ी आ गयी है , शिमला नहीं जाओगे ?
उज्जवल : हाँ , जाऊंगा तो पर आज नहीं !
फ़िरोज़ भाई : तो आज का क्या करोगे ?
उज्जवल : कांच के गिलास खरीदूंगा !
फ़िरोज़ भाई : वो क्यों ?
उज्जवल : ताकि फिर बीस बरस अपनों से दूरी न रहे !
फ़िरोज़ भाई मुस्कुराते हुए अपनी सुरमे वाली आँखों का पानी पोछ रहे थे और उज्जवल उनके कुर्ते की जेब से अपना वो ही एक बचा हुआ कांच का गिलास निकाल कर छु कर अपना बचपन याद कर रहा था !
वातावरण में ख़ामोशी थी !
सब चुप चाप छोटी टॉय ट्रेन मे अपनी अपनी सीट पर बैठ गए थे !
सूरज पूरे तौर पर निकल चूका था ! चुभन वाली बर्फीली हवाएं कब की जा चुकी थी !
गार्ड ने एक लम्बी सीटी मारी ! ट्रेन ने भी जोर से आवाज लगायी ! उज्जवल का ध्यान गया की ट्रेन सरक रही है ! वो ट्रेन पर चढ़ गया ! जसे बीस बरस पहले चढ़ गया था ....तब ना आने के लिए ...और आज जल्दी से लौट आने के लिए !
नए कांच के गिलास महंगे हो गए हैं लेकिन वो एक बचा कांच का गिलास सब से मूल्यवान है जो आज फ़िरोज़ भाई ने उज्जवल को दिया .....ट्रेन गहरे लकड़ी के पुल से गुजर रही थी और खिड़की के सहारे से बैठा उज्जवल अपनी बचपन की कमाई का पहला सौदा निहार रहा था बचपन के सब कुछ उसके सामने था जैसे कल ही की बात हो ......!!
ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो चली थी .... शिमला आने वाला था !