Saturday, March 29, 2014

संस्मरणों कि पंक्तियाँ !!

गमछे से,
कोहनियों तक,
पोछता पसीना,
मूर्तिकार,
दिन भर, रात भर,
मूर्तियाँ बनाते हुए !

पूजा पंडालों में,
कल भगवान् ,
हो जाएंगी !
दूर हो जाएँगी,
दर्शनाथियों कि,
लम्बी पंक्तियों कि सी !

जैसे ,
दूर हो जाते हैं,
रात भर ,
दिन भर,
पाले पोसे,
मासूम चहरे,
हमारे घरों से !

फिर ,
बंध  जाती हैं,
संस्मरणों कि पंक्तियाँ,
आँखों से ,
पिघलती हुई !

Wednesday, March 26, 2014

एक कहानी : " टॉयट्रेन "

        " स्कूल के प्रिंसिपल सर ने सुबह कि प्रार्थना के  ख़तम होने के बाद घोषणा करी के अगले हफ्ते सिलीगुड़ी के कान्वेंट स्कूल के 12th क्लास के दस बच्चों कि टीम हमारे स्कूल के बच्चों के साथ २ दिन के जॉइंट टूर पर चलेंगे !"आप सभी बारहवीं के बच्चे मुझ से असेंबली के बाद  ऑफिस में मिलिए !
         १४ से १६ साल के बच्चों को उड़ने को बड़ा आकाश मिलने को था ! नए साथियों के साथ , नयी उमीदों के साथ !
         जैसे पतझड़ के बाद आयी नयी कोपलों को ओस कि बूंदों के स्पर्श से बनते संबंधों और भविष्य कि आशाओं को मूर्त रूप दे लेने के मौके मिलने को हों और रास्ता सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के  बीच दौड़ती टॉय ट्रेन कि उस कोच से जाता हो जो रिज़र्व किया गया था, इस यात्रा के लिए !
        " आतिश "  से  बिजॉय दादा ने अपने पुराने विजय सुपर स्कूटर को  सुबह ७:३० बजे सिलीगुड़ी स्टेशन कि  पार्किंग में खड़ा  कर के इग्निशन स्विच को ऑफ करते हुए पुछा :

कहाँ खोये हो बंधू ?

         आतिश तो जैसे बड़े से लस्सी कि ग्लास में तैरते मक्खन कि तरह दिन भर में मिलने वाले नए साथीयों के साथ कि सम्भावित गरमाहट से पिघलता जाता था और बिजॉय दादा कि आवाज़ उसे ऐसी लगती थी जैसे ठंडक देते बर्फ़ के टुकड़े !

बिजॉय दा : कि रे , भालो तो ? ( क्या , ठीक तो हो ? ).

आतिश के कंधों को छूते हुए बिजॉय दा ने पुछा ! आतिश मलमली घांस से जैसे खुरदरी सड़क पर नंगे पैर अचानक आ गया हो और बोला :

हाँ दादा , क्या हुआ ?

बिजॉय दा ने मुस्कुराते हुए आतिश को कहा कुछ नहीं चल तेरे कान्वेंट स्कूल के साथी अपनी स्कूल बस से आ गए है , देख तुझे किसका साथ मिलता है !

आतिश वेटिंग रूम कि तरफ बढ़ गया जहाँ प्रिंसिपल और स्कूल के दूसरे लड़के पहले से इकठ्ठा थे !

कान्वेंट स्कूल के बच्चों में लडके और लड़कियां दोनों थे , स्कूल ड्रेस में !

दिसंबर कि सर्द सुबह ! कोहरे से जूझती सूरज कि किरणें !

      बीच बीच में सर्द हवाएँ किशोर किशोरियों के खुश्क होते चेहरों को और खुश्की दे जाती थीं तो कोई मफ़लर कस लेता था तो किसी कि हथेलियाँ स्वेटर कि जेबों में और गेहरी जा कर कस जाती थी !

हैलो , तुम्हारे पास वैसलीन है ? विभूती ने आतिश से पुछा !

विभूति कॉन्वेंट स्कूल के एक लड़की !

आतिश : हाँ, ये लो लेकिन यूज़ करी हुई है , तुम अपनी उंगली पर ले लो  ! वैसलीन कि ट्यूब विभूति कि तरफ़ बढ़ाते हुए बोला !

विभूति : तो क्या हुआ ? लाओ दो ! केहते हुए विभूति ने बिना झिझक ट्यूब अपने होठों पर फेर ली !

आतिश के लिए ये लम्हा अनोखा था ! जिसमे विश्वास  एवं  अपनत्व था ,साथ में था अधिकार का उदघोष ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था ! सरकारी स्कूल के  संस्कारों कि धूप से बनती परछाइयों के सिमटने कि घडी थी ये , नए साथीयों के सानिध्य एवं सम्भावित सम्बन्धों के फैलते प्रकाश में !

        चलिए भाई ट्रेन के आने में देर है नाश्ता कर लेते हैं ! कौशल भाई जो हॉस्पिटालिटी के लिए जिम्मेद्दार है ने ,दोनों तरफ के बच्चों को आवाज़ लगायी !

        गरमागरम पकौड़ियों और चाय कि चुस्कियों के साथ किशोर किशोरियों के ठहाके और विचित्र से सामीप्य कि मर्यादित कोशिश में सब ने नाश्ता ख़तम किया !

सब ने अपने अपने साथी चुन लिए थे , आगे के सफ़र के लिए !

यहाँ आ जाओ आतिश , विभूति ने अपने बगल कि सीट पर उसे लगभग खींच लिया !

       ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरकने लगी थी ! दूर पहाड़ों पर उभरता हुआ सूरज अपनी किरणो से नई कोपलों को स्पर्श करता था तो दोनों स्कूल के प्रिंसिपल अपने साथियों के साथ सजग थे ! किशोरों के साथ एडुकेशनल टूर जो था , तमाम सम्भावनाएं लिए !

           छुक छुक करती ट्रेन करीब कि मार्किट से गुजर रही थे  ! बीच बीच में तामाम चीज़ों के बेचने वाले चढ़े और उतरे ! स्टेशन आते जाते रहे ! आतिश और विभूति खो गए थे !

बारिश कि फुहारों से ट्रेन कि रफ़्तार से तेज़ दौड़ते मन को विराम मिला !

आतिश : इस टूर से क्या हासिल होगा हमें ?

विभूति : मुझे तुम जैसा नया दोस्त हासिल हुआ !

आतिश ने हलके से मुस्कुराते हुए अपनी निगाहें नीचे लगभग सूख चुकी नदी कि तरफ कर ली !

विभूति : फ्यूचर का क्या प्लान है तुम्हारा करियर का ?

आतिश : तुम बताओ !

विभूति : 12th के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला ! 3rd इयर में कैम्पस सिलेक्शन फिर पॉकेट और स्टडी के लिए कमाऊंगी और आय ए एस कि तय्यारी करुँगी , और फिर शादी वादी !

      बड़ी सहजता से बोल  गयी विभूति ! जैसे कलकल करता पानी रस्ते में पड़ने वाले सभी पेड़ पौधों को सींचता जाता है , आतिश कितने दिनों बाद आज तर हुआ था किसी कि मन कि बात में अपने को पा कर !

विभूति ने कुछ देर रुक कर पुछा : अब तुम बताओ !

      आतिश अभी कुछ बोल पाता कि ट्ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई ! विभूति ने अपना चश्मा उतारते हुए आतिश कि तरफ देखा और मुस्कुरा दी फिर अपने गले के मफलर से चश्मे के शीशे साफ़ करने लगी ! मफलर कंधे से कुछ ज़यादा नीचे सरक गया था  !  आतिश सम्भलते हुए अपनी निगाहें एक तरफ कर ली , अनदेखा करते हुए वो पल !

चाय चलेगी दोस्तों ? कौशल भाई ने पुकारा !

हाँ , सब के सब एक सुर में बोले !

प्रिंसिपल सर : अभी तक हमने आधा रास्ता तय कर लिया है , यहाँ से ट्रेन कुछ दूर पीछे चलेगी और फिर आगे ये एक अनोखा मोड़ है इस रस्ते का !

     आतिश और विभूति एक दूसरे को देखते हुए सोच रहे थे ! कहाँ अभी आधा रास्ता तय हुआ ! ठीक से पहचान भी नहीं हुई अभी तो ! दोंनो अपने इस सफ़र में एक नए सफ़र कि तलाश में थे !

       ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली थी ! हिचकोले खाती , घुमावदार रास्तों पर कन्धों से कंधे टकराती मस्ती करती टॉय ट्रेन दार्जीलिंग कि तरफ बढ़ रही थी कि सब के हाथो में कुल्हड़ में गरमा गरम चाय आ गयी साथ में गरमा गरमा समोसे अभी - अभी गुजरे " घूम स्टेशन " से दो लड़कों ने ये व्य्वस्था करी थी !

विभूति और आतिश ने अपनी सीट के बीच के हिस्से में समोसों कि प्लेट रखी और बतियाने लगे !

आतिश : तुम मेरे फ्यूचर प्लान के बारे में पूछ रही थी न ? वैसे मैंने अभी ज़यादा कुछ सोचा नहीं है ! बस अच्छे परसेंटेज से 12th पास हो जाये तो फिर दादा आय टी आय में दाखला दिलवाने कि बोल रहे थे ! तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिए ?

विभूति : तुम्हारे स्कूल में करियर गाइडेंस नहीं देते ?

आतिश : ये क्या होता है ?

विभूति ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ आतिश कि तरफ देखा !

      गाढ़े गेहुंए रंग के आतिश के चहरे पर हलके हलके उभार लेती रोओं कि कतारें , सख्त होने को थीं  ! ऊपरी होठो पर घने होते मूछों के बाल हलके हरे रंग कि आभा दे रहे थे ! यौवन दस्तक देता था , हर तरफ से ! 

    आतिश ने विभूति को हलके से ज़ोर देर कर पुछा : क्या हुआ बोलती क्यों नहीं ? एकटक क्या देखे जा रही हो ?

विभूति ऐसे में क्या बोलती , कई बार शब्द नहीं मिलते कुछ हालातों को व्यक्त करने के लिए ! किन्तु मन सब समझता है और आसानी से  समझा भी देता है !

आतिश तुम मेरी मानो तो स्पोर्ट्स में अपना करियर बनाओ !

     विभूति ने चुप्पी तोड़ते हुए आतिश से कहा कहा !तुम्हारी सोलिड बॉडी और हाइट सब ठीक ठाक है ,और एक स्पोर्टसमैन मुझे पसंद भी है ! तुम फ़ुटबाल खेलना शुरू करो !  

आतिश : फुटबॉल तो मैं खेलता ही हूँ ! एक बार गिरा तो घुटनो पर चोट लगी , चार टांके लगे थे उसके बाद से नहीं खेला !

ट्रेन अगले स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी !

ये लो , बड़े से पेड़ से एक गुलाबी और चटक लाल रंग एक बड़ा सा फूल ला कर आतिश ने विभूति को दिया !

थैंक यू : विभूति !

आतिश : क्या मुझे इंजीनियरिंग नहीं करनी चाहिए !

आतिश ने अपने मन में दबे हुए प्रश्न को शब्द दिए !

विभूति : क्यों नहीं , लेकिन तुम स्पोर्ट्स में अच्छा कर सकते हो !

आतिश : लेकिन में इंजीनियरिंग में भी अच्छा कर लूँगा !

ओके फिर ठीक है , जो मन करे करो कहती हुए विभूति सीट पर बैठ गयी लगभग रूठते हुए ! पीछे पीछे आतिश भी आ गया और दोनों हाथों से विभूति के कन्धों को सम्भालता हुआ बोला , ठीक है मैं फूटबाल ही खेलूंगा : अब खुश !

विभूति के होठों पर आती मुस्कुराहट के साथ ट्रेन ने लम्बी सीटी लगायी जैसे अपने होने का परिचय देती हो !

      दो अनजान युवा बरसों मन के भीतर सैकड़ों अनछुए विषयों कि जिज्ञासा संजोय कितने समीप आ चुके थे कि एक दूसरे कि मुस्कुराहटों कि चिन्ता होने लगी थी दोनों को , सिर्फ चार घंटों के सफ़र में !

धीरे - धीरे आतिश और विभूति दोस्त थे !

सफ़र बड़ा हो चला था , रस्ते छोटे पड़ेंगे दोनों को एहसास था ! 

     चिनार के पत्तों से झरती बारिश कि बूँदें ट्रेन के शीशे पर हवाओं कि तूलिका से आड़े टेढ़े चित्र उकेरती थीं जिनके अर्थ सिर्फ आतिश और विभूति को पता थे !

         दार्जिलिंग कि सड़कों पर सब अपने अपने प्रोजेक्ट के लिए सामान इकठ्ठा करने में लग गए , ये दोनों भी  ! होटल के कमरों में चेंज कर के सब रेस्टोरेंट में इक्कठा हुए , स्कूल ड्रेस में नहीं , नॉर्मल पहरावे में ! किशोरों के मन और इच्छाओं का वातावरण जिसे प्रिंसिपल सर और दूसरे अधिकारी अपनी पैनी निगाहों से नियंत्रित करते जाते थे फिर भी खुश्बुएं और रोशनी कहाँ बंधती हैं  बंधन में ! 

आज वापस लौटने का दिन है ! 

कहीं उत्साह तो कहीं कुछ समय और साथ रह पाने कि लालसा चहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई देती थी !

ट्रेन के इंजन ने लम्बी सीटी दी !

भाप से पूरा इंजन लगभग छुप सा गया जैसे मन में उफनते कामनाओं के तूफ़ान में वापसी का समय इतनी 

तपिश दे रहा हो कि भविष्य भाप सरीखा उड़ ही जाएगा जो उसे अगर आज न समेटा तो , समय रहते !

        वापसी के सफ़र में भी आतिश और विभूति पास  पास ही रहे ! आते जाते स्टेशन पर उतरते चढ़ते लोगो कि चहल पहल रही ! लोकल मिलने वाले रंग बिरंगे फूलों कि डालियाँ तो कभी नाश्ते के  लिए चाय पकोडों के साथ सर्द हवाओं के झोके !

      एक दो बार आतिश ए सी कम्पार्टमेंट में भी झाँक आता था ! इंग्लिश न्यूज़ पेपर पढते सूटेड बूटेड लोग ! चीनी मिटटी के कप में चाय और नाश्ता !  देख कर सोच लेता मैं भी ये सब करूंगा ठीक से पढ़ लिख कर !

      चलो बस में बैठो बच्चों हमें अभी २० मिनट और चलना है ! अँधेरा होने को था ! सर्दी पल पल बढ़ती जाती थी !

विभूति और आतिश अभी प्लेटफॉर्म पर ही थे !

कॉन्टैक्ट नम्बर दे ले रहे थे ! 

२० - २५  सालों बाद

एक कप चाय तो पिला दो मैडम !

नहीं सुबह से दो कप पी चुके हो अब लंच के बाद मिलेगी ! विभूति ने मेज पर पड़ी प्याली उठाते हुए कहा !

आतिश : ठीक है में थोड़ी देर में आता हूँ !  करुणा और सचिन कहाँ है , सुबह से देखा नहीं दोनों को ?

विभूति : आज स्कूल का एडुकेशनल टूर है , दोनों वहीँ गए हैं रात हो जाएगी ऐसा कहा था प्रिंसिपल ने मुझे !

आतिश : चलो उठो  कहीं चलना है !

विभूति : कहाँ ?

दार्जिलिंग , टॉय ट्रेन से  !

हाँ , वेसलीन साथ रख लेना तुम्हारे होठ सूख जाते हैं : आतिश ने मुस्कुराते हुए कहा !

ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया था !

 आतिश ने अपनी सरकारी गाड़ी के ड्राईवर से शाम को आने का इशारा करते हुए विभूति को ट्रेन में खीच लिया !

आपका टिकट तो ए सी का है , तो आप यहाँ क्यों बैठे हैं ?

विभूति ने आतिश को और आतिश ने विभूति को देखा और मुस्कुरा दिए !

ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई !  टी टी कुछ समझता हुआ आगे बढ़ गया , जैसे आप सब समझ चुके हैं !

                                       ~~~~~~        एक कहानी : " टॉयट्रेन "  ~~~~~~ 
::: ~~ ::: आपका मनीष