साल कोई २००५ या २००६ रहा होगा ...मैं अपने अधिकारिक कार्य से पुदुचेरी के प्लांट मैं जाने की तयारी कर रहा था .....अचानक ये ख़याल आया की इस बार क्यों ना कुछ घूमना भी किया जाए ...तो अपना केमरा भी साथ रख लिया ...! शाम की किंग फिशर की उड़ान थी ... मुंबई से उड़े और चेन्नई के कामराज एअरपोर्ट पर उतर गए ...!
गाडी आगई थे हमें लेने के लिए चेन्नई से पुदुचेरी कुछ २ से २.३० घंटो का सफ़र है ...कार से....अद्भुद सफ़र होता है ..सही मैं , कई बार किया है ... रात के वक़्त तो और भी अनोखा हो जाता है... ई सी आर से ...इस्ट कोस्ट रोड ... हाँ तो हम एअरपोर्ट से निकले ... तिन्दिवानाम होते हुए...रात के कुछ ११ बज रहे थे और सफ़र २ घंटों का था ... हम चले.. ....वैसे तो हवाई जहाज मैं खाना मिला था किन्तु ...मेरे आकार प्रकार के लिए वो कम था... मुझे भूख लग रही थी... लिकिन अब तो हम एअरपोर्ट से निकल चुके थे... तो खाने को भी कुछ नहीं मिलता ...
मैंने ड्राइवर से कहा " भाई कहीं कुछ मिले तो खिला देना ! "
१ घंटा चलने के बाद एक छोटी सी सड़क के किनारे झोपड़ी दिखाई दी... एक कम रौशनी की किरने आ रही थीं ....कुछ लोग भी दिखाई दे रहे थे... घुप अँधेरा ..हमारी गाड़ी किनारे पर खाड़ी कर के ड्राइवर ने तमिल मैं दूकान वाले से पुछा और मुझे कहा सर आइये डोसा , इडली और उत्तपम है यहाँ विथ टी !! मैं खुश ....उतरा ..और हैण्ड वश कर के ..टेबल पर बैठ गया ... कुछ समझ नहीं आ रहा था ..सब तमिल मैं बात कर रहे थे ...और हम इस भाषा को आज तक नहीं समझ पाए ...!
मेरे ड्राइवर ने मुझ से इंग्लिश मैं पूछ कर चार डोसा आर्डर किया .. और मेरे कहे अनुसार एक एक कर के देने को कहा ...बस आदेश मिलने के बाद ...मोटे लोहे के तवे पर नारियल की रेशों से बने एक देसी ब्रश से पानी और नारियल के तेल की छींट मार कर डोसा बनाया जाने लगा ... भाई सच बोलता हूँ ...कुछ चीज़ों का बनाना इतना कलात्मक होता है की उसको खाने से ज़यादा उसको बनते देखने से संतुष्टि मिलती है.... चाहे हमारे गाज़ियाबाद के शर्मा जी की चाट हो या फिर ये डोसा ... बस कुछ देर मैं डोसा , संभार , चटनी , केले के पत्ते पर मेरे सामने थी , और चाय भी .... मेरे साथी ड्राइवर ने इडली मंगवाई अपने लिए ... ...मैंने थीं दोसे खाए ... बस मैं कुछ नहीं समझ पा रहा था की काया बातें कर रहे हैं सब... जब कुछ चाहिए होता था तो इशारा कर के बता देता था ...हाँ मेरा ड्राइवर मेरी मदद कर रहा था ... सज्जन होते हैं ये लोग....वरना तो हम भूखे रह जाएँ इसी जगह पर... ..........मैंने अपने दोसे ख़तम किये और चाय की चुस्की लेता हुआ झोपड़ी से बहार निकल कर रोड पर गुजरते हुए ट्रक और दुसरे वाहनों को देखने लगा ...सच मानिए ...ये अनोखा अनुभव है ...रात के १२ बजे ...सुदूर दक्षिण मैं एक अँधेरी रात मैं आप डोसा खा कर चाय पी रहे हों ...जहाँ आप किसी से बात नहीं सकते ...क्यों की कोई आपकी भाषा नहीं समझता ... मैं ये सब सोच ही रहा था की अचानक मेरे कानों मैं कुछ जाने पहचाने से शब्द पड़े ..... शब्द थे " यार ये चेप्टर तो कल ही ख़तम कर लेने की बात थी ना ? " .....मुझे लगा भाई यहाँ हिंदी कौन बोल रहा है... देखा तो दो लडके आपस मैं बात कर रहे थे.... मैं लपक के उनके पास गया और पूछा ...कौन है आप और यहाँ क्या कर रहे हो ? वो दोनों वहीँ के पास के एक उनिवेर्सित्य एस आर एम् के पढ़ने वाले थे ... एन्गिनियारिंग कर रहे थे... प्रणव नाम था उस लड़के का ....दुसरे का नाम नहीं याद अभी ...कुछ सालों तक प्रणव से संपर्क था ..आजकल कुछ बात नहीं होती... ये पता है की वो दिल्ली मैं है ...पर संपर्क नहीं है .... ....
हाँ उस मुलाकात के बाद मैं पुद्दुचेरी पहुंचा लगभग १ : ३० बजे ...वहां के मशहूर होटल मैं रुका ...गाँधी बीच के पास ही है ...बस फिर काम शुरू... ये लेख इस लिए लिखा ...दोस्ती हो जाती है ...करी नहीं जाती ...सम्बन्ध जीवित रखे जाते हैं ...रहते नहीं हैं.... लेकिन ये निर्भर करता है ....दोनों पर...किसी एक की लगातार कोशिश भी ....कमजोर पड जाती है जब प्रतिउत्तर मैं कुछ चालाकी का अनुभव हो.....किन्तु ख़तम नहीं होती...
लेकिन हम नहीं बदलेंगे ....दोस्ती करने का सिलसिला चलता रहेगा .....तभी तो मैं हूँ.... जिंदा... सब के लिए सिर्फ अपने लिए नहीं ....
गाडी आगई थे हमें लेने के लिए चेन्नई से पुदुचेरी कुछ २ से २.३० घंटो का सफ़र है ...कार से....अद्भुद सफ़र होता है ..सही मैं , कई बार किया है ... रात के वक़्त तो और भी अनोखा हो जाता है... ई सी आर से ...इस्ट कोस्ट रोड ... हाँ तो हम एअरपोर्ट से निकले ... तिन्दिवानाम होते हुए...रात के कुछ ११ बज रहे थे और सफ़र २ घंटों का था ... हम चले.. ....वैसे तो हवाई जहाज मैं खाना मिला था किन्तु ...मेरे आकार प्रकार के लिए वो कम था... मुझे भूख लग रही थी... लिकिन अब तो हम एअरपोर्ट से निकल चुके थे... तो खाने को भी कुछ नहीं मिलता ...
मैंने ड्राइवर से कहा " भाई कहीं कुछ मिले तो खिला देना ! "
१ घंटा चलने के बाद एक छोटी सी सड़क के किनारे झोपड़ी दिखाई दी... एक कम रौशनी की किरने आ रही थीं ....कुछ लोग भी दिखाई दे रहे थे... घुप अँधेरा ..हमारी गाड़ी किनारे पर खाड़ी कर के ड्राइवर ने तमिल मैं दूकान वाले से पुछा और मुझे कहा सर आइये डोसा , इडली और उत्तपम है यहाँ विथ टी !! मैं खुश ....उतरा ..और हैण्ड वश कर के ..टेबल पर बैठ गया ... कुछ समझ नहीं आ रहा था ..सब तमिल मैं बात कर रहे थे ...और हम इस भाषा को आज तक नहीं समझ पाए ...!
मेरे ड्राइवर ने मुझ से इंग्लिश मैं पूछ कर चार डोसा आर्डर किया .. और मेरे कहे अनुसार एक एक कर के देने को कहा ...बस आदेश मिलने के बाद ...मोटे लोहे के तवे पर नारियल की रेशों से बने एक देसी ब्रश से पानी और नारियल के तेल की छींट मार कर डोसा बनाया जाने लगा ... भाई सच बोलता हूँ ...कुछ चीज़ों का बनाना इतना कलात्मक होता है की उसको खाने से ज़यादा उसको बनते देखने से संतुष्टि मिलती है.... चाहे हमारे गाज़ियाबाद के शर्मा जी की चाट हो या फिर ये डोसा ... बस कुछ देर मैं डोसा , संभार , चटनी , केले के पत्ते पर मेरे सामने थी , और चाय भी .... मेरे साथी ड्राइवर ने इडली मंगवाई अपने लिए ... ...मैंने थीं दोसे खाए ... बस मैं कुछ नहीं समझ पा रहा था की काया बातें कर रहे हैं सब... जब कुछ चाहिए होता था तो इशारा कर के बता देता था ...हाँ मेरा ड्राइवर मेरी मदद कर रहा था ... सज्जन होते हैं ये लोग....वरना तो हम भूखे रह जाएँ इसी जगह पर... ..........मैंने अपने दोसे ख़तम किये और चाय की चुस्की लेता हुआ झोपड़ी से बहार निकल कर रोड पर गुजरते हुए ट्रक और दुसरे वाहनों को देखने लगा ...सच मानिए ...ये अनोखा अनुभव है ...रात के १२ बजे ...सुदूर दक्षिण मैं एक अँधेरी रात मैं आप डोसा खा कर चाय पी रहे हों ...जहाँ आप किसी से बात नहीं सकते ...क्यों की कोई आपकी भाषा नहीं समझता ... मैं ये सब सोच ही रहा था की अचानक मेरे कानों मैं कुछ जाने पहचाने से शब्द पड़े ..... शब्द थे " यार ये चेप्टर तो कल ही ख़तम कर लेने की बात थी ना ? " .....मुझे लगा भाई यहाँ हिंदी कौन बोल रहा है... देखा तो दो लडके आपस मैं बात कर रहे थे.... मैं लपक के उनके पास गया और पूछा ...कौन है आप और यहाँ क्या कर रहे हो ? वो दोनों वहीँ के पास के एक उनिवेर्सित्य एस आर एम् के पढ़ने वाले थे ... एन्गिनियारिंग कर रहे थे... प्रणव नाम था उस लड़के का ....दुसरे का नाम नहीं याद अभी ...कुछ सालों तक प्रणव से संपर्क था ..आजकल कुछ बात नहीं होती... ये पता है की वो दिल्ली मैं है ...पर संपर्क नहीं है .... ....
हाँ उस मुलाकात के बाद मैं पुद्दुचेरी पहुंचा लगभग १ : ३० बजे ...वहां के मशहूर होटल मैं रुका ...गाँधी बीच के पास ही है ...बस फिर काम शुरू... ये लेख इस लिए लिखा ...दोस्ती हो जाती है ...करी नहीं जाती ...सम्बन्ध जीवित रखे जाते हैं ...रहते नहीं हैं.... लेकिन ये निर्भर करता है ....दोनों पर...किसी एक की लगातार कोशिश भी ....कमजोर पड जाती है जब प्रतिउत्तर मैं कुछ चालाकी का अनुभव हो.....किन्तु ख़तम नहीं होती...
लेकिन हम नहीं बदलेंगे ....दोस्ती करने का सिलसिला चलता रहेगा .....तभी तो मैं हूँ.... जिंदा... सब के लिए सिर्फ अपने लिए नहीं ....