" .....इदम ताम्बुल समर्पयामि , इदाम वस्त्रं समर्पयामि !! "
उपरोक्त शब्दों को सामान्यतः घरों में करी जाने वाली सत्यनारायण भगवान् जी की कथा के अंतर्गत सुना जा सकता है ! कथा के प्रारंभ होने के पूर्व ही भगवान् की स्थापना एवं आह्वान की प्रक्रिया के अंतर्गत ये शब्द सुने जा सकते हैं ! तिलक , चन्दन , रंगोली, पान के पत्ते , आम के पत्ते, डंठल सहित पाचं पत्ते , कलवा , रूई और सब सामान ! पुजारी जी के लिए एक जोड़ा कपडा ! अंगोछा इत्यादि ....!
इश्वर के आह्वान से समय उनको विभिन्न प्रकार की वस्तुएं समर्पित करी जाती हैं ....अब जैसे पुजारी जी के लिए पुरे वस्त्र आते हैं तो उसी प्रकार से भगवान् के लिए भी पुरे वस्त्र आने चाहिए ...किन्तु पुजारी जी नहीं मंगवाते , सिर्फ अपने लिए ही मंगवाते हैं ...जिस से की यजमान पर अधिक भर ना पड़े और ये भी प्रभाव पड़े के देखो पंडित जी ने कम ही चीजों में काम चला लिया !!
हम इश्वर की पूजा , कथा क्यों करते हैं जिस से की हमें दीर्घ समय तक लाभ हो किन्तु उसी इश्वर को जब कुछ देना होता है तो कम में काम चलाने की कोशिश करते हैं ... या ये हम जानते हैं की इश्वर तो इन भौतिक एवेम सांसारिक चीजों का प्रयोग करेंगे नहीं अतः क्या आवश्यक है की भरपूर खर्चा करने की ....."
अब देखिये जब पूजा शुरू होती है तो इश्वार का आह्वान कर के हमारे माध्यम से पंडित जी इश्वार को हर उस वास्तु को प्रदान करवाता है जो की एक सामान्य व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक चीज़ है .....जिनमे से एक है वस्त्र और दूसरी पान , हाँ जी खाने वाला पान ..... तो ये दोनों चीज़ होती तो नहीं इश्वर के नाम की तो पंडित जी करते क्या हैं ......जब वस्त्र चढ़ाना हो इश्वार को तो थोडा सा कपास ( रूई ) ले कर हमें देते हैं और कहते हैं चढ़ाइए ...और बोलिए ....इदम वस्त्रं समर्पयामि .....और जब पान की बारी आती है तो कभी कभी तो आम के पत्ते हो ही तोड़ कर हमारे हात में देते हैं और कहते हैं लीजिये चढ़ाइए और बोलिए ...इदम ताम्बुल समर्पयामि ....अब सोचिये ...इश्वर से सब कुछ सही सही और ज्यादा ज्यादा की चाह में हम पूजा करवाते हैं किन्तु इश्वर को देते क्या हैं ....सब कुछ प्रतीकात्मक और थोडा थोडा .....क्या उचित है ....नहीं किन्तु मानना पड़ता है ....अब पंडित जे ने कहा है ...और मन ही मन हम भी ये ही चाहते हैं ...कम में ही काम चल जाए !!
मुझे आपको मिलने वाला वार्षिक इन्क्रीमेंट भी लगभग उसी तरह से .....थोडा थोडा प्रतिक के रूप में ...किसी बड़ी चीज़ जैसा ..... इदम इन्क्रीमेंट समर्पयामि .....एक बार का किया गया दान पुरे वर्ष भर के लिए पर्याप्त ....है ना ...?? कोई भी पंडित जी को आहत करने कि की मंशा नहीं है हमारी ....बस दिखाए गए मार्ग पर ही चलने का प्रयास है ....!!
!! इति समाप्तम !!
उपरोक्त शब्दों को सामान्यतः घरों में करी जाने वाली सत्यनारायण भगवान् जी की कथा के अंतर्गत सुना जा सकता है ! कथा के प्रारंभ होने के पूर्व ही भगवान् की स्थापना एवं आह्वान की प्रक्रिया के अंतर्गत ये शब्द सुने जा सकते हैं ! तिलक , चन्दन , रंगोली, पान के पत्ते , आम के पत्ते, डंठल सहित पाचं पत्ते , कलवा , रूई और सब सामान ! पुजारी जी के लिए एक जोड़ा कपडा ! अंगोछा इत्यादि ....!
इश्वर के आह्वान से समय उनको विभिन्न प्रकार की वस्तुएं समर्पित करी जाती हैं ....अब जैसे पुजारी जी के लिए पुरे वस्त्र आते हैं तो उसी प्रकार से भगवान् के लिए भी पुरे वस्त्र आने चाहिए ...किन्तु पुजारी जी नहीं मंगवाते , सिर्फ अपने लिए ही मंगवाते हैं ...जिस से की यजमान पर अधिक भर ना पड़े और ये भी प्रभाव पड़े के देखो पंडित जी ने कम ही चीजों में काम चला लिया !!
हम इश्वर की पूजा , कथा क्यों करते हैं जिस से की हमें दीर्घ समय तक लाभ हो किन्तु उसी इश्वर को जब कुछ देना होता है तो कम में काम चलाने की कोशिश करते हैं ... या ये हम जानते हैं की इश्वर तो इन भौतिक एवेम सांसारिक चीजों का प्रयोग करेंगे नहीं अतः क्या आवश्यक है की भरपूर खर्चा करने की ....."
अब देखिये जब पूजा शुरू होती है तो इश्वार का आह्वान कर के हमारे माध्यम से पंडित जी इश्वार को हर उस वास्तु को प्रदान करवाता है जो की एक सामान्य व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक चीज़ है .....जिनमे से एक है वस्त्र और दूसरी पान , हाँ जी खाने वाला पान ..... तो ये दोनों चीज़ होती तो नहीं इश्वर के नाम की तो पंडित जी करते क्या हैं ......जब वस्त्र चढ़ाना हो इश्वार को तो थोडा सा कपास ( रूई ) ले कर हमें देते हैं और कहते हैं चढ़ाइए ...और बोलिए ....इदम वस्त्रं समर्पयामि .....और जब पान की बारी आती है तो कभी कभी तो आम के पत्ते हो ही तोड़ कर हमारे हात में देते हैं और कहते हैं लीजिये चढ़ाइए और बोलिए ...इदम ताम्बुल समर्पयामि ....अब सोचिये ...इश्वर से सब कुछ सही सही और ज्यादा ज्यादा की चाह में हम पूजा करवाते हैं किन्तु इश्वर को देते क्या हैं ....सब कुछ प्रतीकात्मक और थोडा थोडा .....क्या उचित है ....नहीं किन्तु मानना पड़ता है ....अब पंडित जे ने कहा है ...और मन ही मन हम भी ये ही चाहते हैं ...कम में ही काम चल जाए !!
मुझे आपको मिलने वाला वार्षिक इन्क्रीमेंट भी लगभग उसी तरह से .....थोडा थोडा प्रतिक के रूप में ...किसी बड़ी चीज़ जैसा ..... इदम इन्क्रीमेंट समर्पयामि .....एक बार का किया गया दान पुरे वर्ष भर के लिए पर्याप्त ....है ना ...?? कोई भी पंडित जी को आहत करने कि की मंशा नहीं है हमारी ....बस दिखाए गए मार्ग पर ही चलने का प्रयास है ....!!
!! इति समाप्तम !!
No comments:
Post a Comment