ना तो ठंडक थी ना ही गर्मी का एहसास.....ये ही कोई सातवीं या आठवीं में पढता था तब मैं ....और आब आप समझ सकते हैं की इस समय क्या उम्र रही होगी ....सुबह के कोई चार बजे थे और मेरी आँख खुल गयी ....पुरे दिन का उत्साह और आने वाले चार या पांच दिनों में खूब घूमने का मन मुझे सोने नहीं से रहा था ...पूरी रात करवटें बदलते हुए कटी ....कुछ समय के लिए आँख लगी भी तो चार बजे खुल गयी ....और कानो में कुछ कुछ सुनाई पड़ने लगा .....
में उन दिनों अपने बड़े मामा जी के पास रहता था , जमशेदपुर में ...उनको दफ्तर की और से रहने को मकान मिला था ...एग्रिको में ....वो नेशनल मेत्रोलौगिकल लैब ( NML ) में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत थे ....बड़ा सा घर चार बड़े बड़े कमरे , एक बड़ा सा वरामदा सब बड़ा बड़ा .....जहाँ पर घर की बालकोनी हटी बस ठीक उस से सटी एक पेड़ की डाली मिलती थी , जिस पर खूब मीठे मीठे फल आते थे ....जिसको जंगल जिलेबे कहते हैं ....हम कभी भी उस पेड़ के पास नहीं गए ...बस ऊपर से ही हाथ गया तो तोड़ कर खा ली ....!! वो एक पूरी की पूरी कालोनी थी ...जिसमे सब प्रकार के लोग रहते थे ... पुरे कालोनी में एक खुला थियेटर था , एक दुर्गापूजा के लिए मंच था , एक फूटबाल मैदान था , एक डिस्पेंसरी थी, एक और मैदान था ....घूमने के लिए ....दो बहुत बड़े बड़े बंगले थे ....निदेशक लेवल के लोगो के लिए ....जिसके अहाते में कई विशेष प्रकार के पेड़ पौधे थे ....जिनमे से एक कदम का पेड़ भी था ....जी हाँ वो ही कदम का पेड़ जिसका ज़िक्र सुभद्रा कुमारी चोहान ने अपनी कविता में किया है ....!!
में चार बजे उठा कर बैठ गया ...पड़ोस के ही फ्लैट से डॉ झिंगन के घर से झगड़े की आवाजे आ रही थी , वो हमेशा झगड़ते रहते थे , अब दोनों लोग डॉ थे को किसी में ज्ञान की कमी तो थी नहीं तो कैसे कोई किसी की बात मान ले ....खैर छोडिये ...में अपनी बात बत्ताता हूँ....वो दिन दुर्गा पूजा का सप्तमी का दिन था ....सब लोग नहा धो कर अच्छा अच्छा पहन कर इधर उधर घूमने लगे थे ...स्कूल की तो छुट्टी पद गयी थे , छोटे , बड़े, किशोर , युवा , जवान , बुजुर्ग सब कोई दुर्गा पूजा के पंडाल के आस पास ही विचरण करने लगा था ..किसी कोई कोई काम करते नहीं देखा किन्तु सब व्यस्त ....क्या होता है न वो वातावरण .....!!
मेरे पास पांच जोड़ी नए कपडे थे ...हर दिन के लिए एक जोड़ी ...!! में सब से अधिक खुश ....में षष्ठी से ही नोतून जामा ( नए कपडे ) पहनुगा !! भसान के दिन तक ...! एक नानी जी ने दिया , कुछ मामा जी ने दिलवाया , एक मसि जी ने दिया , एक माँ ने भेजा दिल्ली से , सेक और भी किसी अच्छे से रिश्तेदार ने दिया ....!! हमें मामा जी अपने विजय सुपर स्कूटर पर दुर्गापूजा दिखने ले जाते थे ....कैसे अब में आपके सामने शब्द चित्र रखता हूँ आप देखिये :
उनका विजय सुपर स्कूटर ...रंग गाढ़ा पीला .....हेन्देल के पास मामाजी बेटी कड़ी होती , राजा बाबु बन कर, फिर मामा जी, फिर दूसरी बेटी , फिर मामी जी, फिर बाद में विशेष प्रकार से लगाईं गयी स्टेपनी पर में बैठता था सब से आराम दायक सीट थी मेरी ! शाम के पांच बजे निलकते थे ...तो रात को 11 - 11.30 तक वापस आते थे ....टेल्को एरिया , अग्रिको एरिया , सिट गोरा एरिया , जुगसलाई एरिया , बर्मा माइंस एरिया और आज तो मुझे याद भी नहीं की कहा कहाँ जाते थे .....लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा ...मामा जी हम सब को खूब बैलेंस कर के चलते थे , मुझे तो रुक कर पंडाल देखने से ज्यादा स्कूटर पर चलते रहने में आनंद आता था ....वो ही 40 से 45 की स्पीड और रास्ते भर हम सब को सब कुछ बताते चलते थे मामा जी ! एक बार हम जुगसलाई से एग्रिको जा रहे थे .....रेलवे के पुल पर चढे ...किनारे किनारे सब्जियों की दूकान है ...हम रुके ...कुछ लिया और फिर चलने लगे तो स्कूटर ने चलने से मन कर दिया ....रात के 8 बज रहे थे , और जमशेदपुर में 8 के बाद रात होने लगती है ....जबकि दिल्ली और मुंबई में 8 के बाद ही दिन का एहसास होता है ...सब अपने लिए रात कके 8 के बाद ही समय निकलते हैं ....दिन भर तो कंपनी मालिक का होता है .....खैर स्कूटर हो पुल के पार तक धक्का लगा कर आये ....मकेनिक मिला , ठीक करवाया , इस समय में मामी जी और बच्चे डॉ खुदियार के घर रुके जो पास में ही था, वो हिमियोपेथी के डाक्टर थे ....छोटी मोती समस्या वो हो हल कर देते थे हमारी ....उनको में इस लिए याद कर रहा हूँ क्यों की उनके पास एक 1930 की मोडल के कार थी , भूरे रंग की , जिसमे एक ही दरवाज़ा था ....और आगे की सीट को थोडा झुका कर पीछे सवारी बैठती थी, पीछे बैठने के बाद ही आगे कोई बैठ पाता था ...मैंने एक बार सवारी करी थे उसकी ....राजसी ठाठ लगते हैं उसमे बैठ कर !! स्कूटर ठीक हुआ , हम घर चले , कालोनी में पहुचे तो देखा के दुर्गा पूजा पुरे रंग पर थी ...प्रसाद खाया और हम भी वही रुक गए ...रात के 1 बजे घर गए !!
अगले दिन षष्ठी थी सबसे बड़ा दिन सबसे अधिक उत्साह का दिन, समर्पण का दिन , मिलन का दिन !! कहीं चनाचूर , कहीं झाल मूढ़ी , कहीं आलूचाप , कहीं चौमीन , कहीं सिंघाड़ा ( समोसे ) कहीं पुचकी ( गोल गप्पे ) कहीं , डोसा , कहीं इडली, कहीं चिले , कहीं पूरा का पूरा खाना बिक रहा होता है ....जैसे की उत्तर भारत में दशेहरे में रौनक होती हैं उसी तरह की रौनक दुर्गापूजा में वहां होती है ....!!
में अपने उन दिनों को याद करता हूँ तो बस याद ही करता रह जाता हूँ ....कई बातें फिर नहीं आ सकती ज़िन्दगी में ....और ये भी सच है की मैं अगर वहां नहीं गया होता तो कई बातें नहीं आ सकती थी ज़िन्दगी में ....!! किस भी बात से आहात नहीं हों ...किन्तु जीवन का स्वर्णिम समय बीत चूका है ...अब तो उसको सहेजने के प्रयास करने चाहिए ....और आगे की ज़िन्दगी को आनंदित करना चाहिए ....!! वो बीता समय फिर नहीं आएगा , किन्तु साथ रहे यादों में का प्यास करते रहना भी जीवन है !!
में उन दिनों अपने बड़े मामा जी के पास रहता था , जमशेदपुर में ...उनको दफ्तर की और से रहने को मकान मिला था ...एग्रिको में ....वो नेशनल मेत्रोलौगिकल लैब ( NML ) में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत थे ....बड़ा सा घर चार बड़े बड़े कमरे , एक बड़ा सा वरामदा सब बड़ा बड़ा .....जहाँ पर घर की बालकोनी हटी बस ठीक उस से सटी एक पेड़ की डाली मिलती थी , जिस पर खूब मीठे मीठे फल आते थे ....जिसको जंगल जिलेबे कहते हैं ....हम कभी भी उस पेड़ के पास नहीं गए ...बस ऊपर से ही हाथ गया तो तोड़ कर खा ली ....!! वो एक पूरी की पूरी कालोनी थी ...जिसमे सब प्रकार के लोग रहते थे ... पुरे कालोनी में एक खुला थियेटर था , एक दुर्गापूजा के लिए मंच था , एक फूटबाल मैदान था , एक डिस्पेंसरी थी, एक और मैदान था ....घूमने के लिए ....दो बहुत बड़े बड़े बंगले थे ....निदेशक लेवल के लोगो के लिए ....जिसके अहाते में कई विशेष प्रकार के पेड़ पौधे थे ....जिनमे से एक कदम का पेड़ भी था ....जी हाँ वो ही कदम का पेड़ जिसका ज़िक्र सुभद्रा कुमारी चोहान ने अपनी कविता में किया है ....!!
में चार बजे उठा कर बैठ गया ...पड़ोस के ही फ्लैट से डॉ झिंगन के घर से झगड़े की आवाजे आ रही थी , वो हमेशा झगड़ते रहते थे , अब दोनों लोग डॉ थे को किसी में ज्ञान की कमी तो थी नहीं तो कैसे कोई किसी की बात मान ले ....खैर छोडिये ...में अपनी बात बत्ताता हूँ....वो दिन दुर्गा पूजा का सप्तमी का दिन था ....सब लोग नहा धो कर अच्छा अच्छा पहन कर इधर उधर घूमने लगे थे ...स्कूल की तो छुट्टी पद गयी थे , छोटे , बड़े, किशोर , युवा , जवान , बुजुर्ग सब कोई दुर्गा पूजा के पंडाल के आस पास ही विचरण करने लगा था ..किसी कोई कोई काम करते नहीं देखा किन्तु सब व्यस्त ....क्या होता है न वो वातावरण .....!!
मेरे पास पांच जोड़ी नए कपडे थे ...हर दिन के लिए एक जोड़ी ...!! में सब से अधिक खुश ....में षष्ठी से ही नोतून जामा ( नए कपडे ) पहनुगा !! भसान के दिन तक ...! एक नानी जी ने दिया , कुछ मामा जी ने दिलवाया , एक मसि जी ने दिया , एक माँ ने भेजा दिल्ली से , सेक और भी किसी अच्छे से रिश्तेदार ने दिया ....!! हमें मामा जी अपने विजय सुपर स्कूटर पर दुर्गापूजा दिखने ले जाते थे ....कैसे अब में आपके सामने शब्द चित्र रखता हूँ आप देखिये :
उनका विजय सुपर स्कूटर ...रंग गाढ़ा पीला .....हेन्देल के पास मामाजी बेटी कड़ी होती , राजा बाबु बन कर, फिर मामा जी, फिर दूसरी बेटी , फिर मामी जी, फिर बाद में विशेष प्रकार से लगाईं गयी स्टेपनी पर में बैठता था सब से आराम दायक सीट थी मेरी ! शाम के पांच बजे निलकते थे ...तो रात को 11 - 11.30 तक वापस आते थे ....टेल्को एरिया , अग्रिको एरिया , सिट गोरा एरिया , जुगसलाई एरिया , बर्मा माइंस एरिया और आज तो मुझे याद भी नहीं की कहा कहाँ जाते थे .....लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा ...मामा जी हम सब को खूब बैलेंस कर के चलते थे , मुझे तो रुक कर पंडाल देखने से ज्यादा स्कूटर पर चलते रहने में आनंद आता था ....वो ही 40 से 45 की स्पीड और रास्ते भर हम सब को सब कुछ बताते चलते थे मामा जी ! एक बार हम जुगसलाई से एग्रिको जा रहे थे .....रेलवे के पुल पर चढे ...किनारे किनारे सब्जियों की दूकान है ...हम रुके ...कुछ लिया और फिर चलने लगे तो स्कूटर ने चलने से मन कर दिया ....रात के 8 बज रहे थे , और जमशेदपुर में 8 के बाद रात होने लगती है ....जबकि दिल्ली और मुंबई में 8 के बाद ही दिन का एहसास होता है ...सब अपने लिए रात कके 8 के बाद ही समय निकलते हैं ....दिन भर तो कंपनी मालिक का होता है .....खैर स्कूटर हो पुल के पार तक धक्का लगा कर आये ....मकेनिक मिला , ठीक करवाया , इस समय में मामी जी और बच्चे डॉ खुदियार के घर रुके जो पास में ही था, वो हिमियोपेथी के डाक्टर थे ....छोटी मोती समस्या वो हो हल कर देते थे हमारी ....उनको में इस लिए याद कर रहा हूँ क्यों की उनके पास एक 1930 की मोडल के कार थी , भूरे रंग की , जिसमे एक ही दरवाज़ा था ....और आगे की सीट को थोडा झुका कर पीछे सवारी बैठती थी, पीछे बैठने के बाद ही आगे कोई बैठ पाता था ...मैंने एक बार सवारी करी थे उसकी ....राजसी ठाठ लगते हैं उसमे बैठ कर !! स्कूटर ठीक हुआ , हम घर चले , कालोनी में पहुचे तो देखा के दुर्गा पूजा पुरे रंग पर थी ...प्रसाद खाया और हम भी वही रुक गए ...रात के 1 बजे घर गए !!
अगले दिन षष्ठी थी सबसे बड़ा दिन सबसे अधिक उत्साह का दिन, समर्पण का दिन , मिलन का दिन !! कहीं चनाचूर , कहीं झाल मूढ़ी , कहीं आलूचाप , कहीं चौमीन , कहीं सिंघाड़ा ( समोसे ) कहीं पुचकी ( गोल गप्पे ) कहीं , डोसा , कहीं इडली, कहीं चिले , कहीं पूरा का पूरा खाना बिक रहा होता है ....जैसे की उत्तर भारत में दशेहरे में रौनक होती हैं उसी तरह की रौनक दुर्गापूजा में वहां होती है ....!!
में अपने उन दिनों को याद करता हूँ तो बस याद ही करता रह जाता हूँ ....कई बातें फिर नहीं आ सकती ज़िन्दगी में ....और ये भी सच है की मैं अगर वहां नहीं गया होता तो कई बातें नहीं आ सकती थी ज़िन्दगी में ....!! किस भी बात से आहात नहीं हों ...किन्तु जीवन का स्वर्णिम समय बीत चूका है ...अब तो उसको सहेजने के प्रयास करने चाहिए ....और आगे की ज़िन्दगी को आनंदित करना चाहिए ....!! वो बीता समय फिर नहीं आएगा , किन्तु साथ रहे यादों में का प्यास करते रहना भी जीवन है !!
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