Manish Awadh Narayan Singh
Saturday, January 21, 2012
धीरे - धीरे आंच बने, अनुवान्छित सा ताप मिले !
" लकड़ी - कोयले का धुआं, मेरा तेरा अपनापन,
हौले - हौले से उठती, अभिलाषाओं की सिहरन !
धीरे - धीरे आंच बने, अनुवान्छित सा ताप मिले,
जिससे अनुकृत होता है, अनुबंधित ,पर नव जीवन !!"
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