Manish Awadh Narayan Singh
Friday, January 20, 2012
" धुंध मैं खो गए सारे खवाबों के झुण्ड,
सब यथार्थ हो गया !!
जब चला छोड़ कर अंगुलियाँ औरों की,
सब यथार्थ हो गया !!
सहारे-सहारे जो भी मिलता रहा ,
उपलब्धियां नहीं, चरितार्थ हो गया !! "
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