Saturday, February 11, 2017

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फ़ुदकती फ़िरती ,
गालियारों में,
आँगन में,
खिलखिलाती , मुस्कुराती !

हथेलियों पर,
चित्र उकेरती,
उम्मीदों के,
आशाओं के, जीवन के !
दो हाथो से सहेजती ,
बिख़रे कपडे,
बेतरतीब बर्तन,
और खिलौने !

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फुदकती फिरती ,
अपनी स्कूल ड्रेस में,
पहले प्राइज में,
पहले सर्टिफिकेट में,
पिता के गोद में,
भर देती हैं,
अनमोल खजाना ,
उम्रभर के लिए !

एक दिन,
शादी के जोड़े में,
सजी  उम्मीदों सी,
चली जाती है,
फुदकने , खिलखिलाने ,
किसी और गलियारे ,
किसी और आँगन में,
फिर से ,
लौटती है , यादों की ,
गिलहरियां बन कर,
बिखरे बर्तोनो में,
चादर की सलवटों में,
और खिलौने में,
पिता के घर !

बेटियाँ गिलहरीयों  सी !!

                                      :: मनीष सिंह ::




 

Wednesday, December 14, 2016

निर्भया .... वो तुम ही थी .... !!

निर्भया   .... वो तुम ही थी  .... !!
दिल्ली की सड़कों पर !!
                
नाजाने कितना मोम , पिघला ,
दिल्ली की सड़कों पर,
न्याय दिलाने का आक्रोश, पिघला ,
दिल्ली की सड़कों पर,
तंत्र के विद्रोह में , हम सब उठे, बैठे,घूमे ,
दिल्ली की सड़कों पर,
तखितयां लिए , ढपलियाँ लिए,
खुद को जगाया ,
दिल्ली की सड़कों पर !

कल के बाद ,
फिर एक बरस बीतेगा,
तुम, याद आओगी,
दिल्ली की सड़कों पर ,
हम अब , भी घुमते हैं,
सहमे से, खबरों से,
कहीं फिर , कोई तारिख,
१६ दिसंबर न हो जाये,
दिल्ली की सड़कों पर

हमें निर्भय और ,एकजुट कर देती हो ,
कम से कम ,एक दिन तो ,
दिल्ली की सड़कों पर
निर्भया वो तुम ही थी,
निर्भया ,वो तुम ही हो.........

हम मोम सरीख़े ,
पिघलते हैं आक्रोश की तपिश से ,
रात भर ,
किन्तु, भोर तक ज़िम्मेदारियाँ बंटाते हुए,
फिर मोम हो जाते हैं ,
दिल्ली की सड़कों पर !!
                                  :: मनीष सिंह ::


             

Saturday, November 26, 2016

अनुभव जैसे शंख ध्वनि ,
        मन  एकांकी होने  पर !           
             जिज्ञासाएँ तितलियाँ,
                     तन हो जाता यायावर !!
इसका , उसका साथ रहे,
     आशाओं के जमघट में ,           
         अपनों का घट रीते न ,
            पलकों के नम होने से  !

अंगारों सी उम्मीदे ,
    रिश्ते , बर्फ खिलोनो से !
   
                                              :: मनीष सिंह ::
          

            
     
           



 

Thursday, April 30, 2015

आ गई है " काश्वी " !!

श्वेत पत्रों पर चमकती,
    आस की किरणों सरीखी !
         मौन शब्दों की निशा में ,
             गुनगुनाते जुगनुओं सी !!
                रिश्तों के इस शांत जल में,
                      बन  तरंगें  बन्धनों  की ,
                           भर  रही  है  ज़िन्दगी ,
                                 आ गई है   " काश्वी "  !!

" काश्वी = Shining, Beautiful"

Wednesday, October 22, 2014

एक दिन !

आस के दीपक,
सिन्दूरी से,
जल कर,
ढूंढ लेंगे मार्ग,
किरणें बन,
ख्याति का,
सबलता का !
एक दिन !

आइयें,
बनकर जलें 
दीपक, 
दीपोत्सव पर,
जो , शेष कर दे,
भेद एवं अहंकार,
प्रबलता से,
एक दिन !

दीपावली की शुभकामनाएँ !

::~~ :: मनीष सिंह 


Saturday, October 18, 2014

एक कहानी : पूर्णिमा !!

           बाहर हल्की बूंदा बांदी थी !  रात ९ बजकर २५ मिनट की फ्रंटियर मेल गुजर चुकी थी ! स्टेशन से कुछ पहले पड़ने वाले रेलवे फाटक के गेटमैन " रमेश भाई " अपने केबिन में निवाड़ की कुर्सी पर बैठे लॉग बुक में एन्ट्री कर रहे थे ! 

रमेश भाई चाय मंगवाऊ या छत्तीसग़ढ एक्सप्रेस के बाद पियेंगे ? 

केबिन के बाहर खड़े फल वाले आदिल ने पुछा !
लॉग बुक में एंट्री कर के पेन को कान के ऊपर खोंसते हुए रमेश भाई बोले :  आदिल , आज अभी ही मंगा लो !

ठीक है कहते हुए आदिल ने पास के चाय वाले को दो चाय का इशारा किया !

       छोटे से केबिन के बाहर दो चार सदाबहार के पौधे ! जिनपर गहरे गुलाबी रंग के फूल ! एक तुलसी का पौधा ! जिस पर रोज़ घर से लाये ताम्बे के लोटे से रमेश भाई जल चढ़ाते थे ! हलकी बारिश की फुहारों से भीग चुके थे और ट्यूबलाइट की रौशनी से चमक रहे थे !
रमेश भाई : आदिल ये तुलसी का गमला ज़रा अंदर सरका दो , बारिश धीरे धीरे तेज़ हो रही है मैं फाटक बंद कर रहा हूँ , छत्तीसगढ़ का सिग्नल मिल गया है ! 

आदिल ने झिझकते हुए तुलसी के गमले को केबिन के भीतर रखा और बोला :

आदिल : आइये चाय पीते हैं !
रमेश  भाई : हाँ लाओ मुझे यही पकड़ा दो मेरा गिलास , मैं हरी झंडी लिए यहीं खड़ा हूँ , इसके गुजरने तक !
धधड़ाती हुई छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस गुजर गयी ! पौधों से बूँदें छिटक के ज़मीन पर बिखर गयी !
रमेश भाई ने फाटक खोल कर लॉग बुक में एंट्री करते हुए चाय की आखिरी घूँट ली और गिलास खिड़की पर बाहर की तरफ रख दिया !
आदिल : आज आप कुछ अलग लग रहे हैं आप ! क्या ख़ास है आज रमेश भाई ?
आदिल साल में एक दिन मैं ऐसे ही खुश रहता हूँ ! रमेश भाई ने तुलसी का गमला फिर बाहर रखते हुए जवाब दिया !
आदिल : साल में एक दिन ? वो कैसे ?
रमेश भाई : आओ ज़रा ये लकड़ी का टेबल बाहर रखवाओ , बारिश काम हो चली , यहीं बैठ कर बताता हूँ !

आदिल : ठीक है फिर दूकान बढ़ा कर बैठते हैं !
        फाटक ये उस पार यादव जी अपनी पान की दूकान बढ़ा कर चलने की तैयारी में थे ! आदिल भी फलों को करीने से सजाने में लगा था ! एस टी डी की विकलांग द्वारा संचालित दूकान कब की बंद हो चुकी थे ! दिन भर बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे पूरा संसार चहल कदमी करता दिखाई देता है और रात में सिर्फ फाटक पर रमेश भाई और पड़ोस की कालोनी के घुमते चौकीदार !
       लीजिये रमेश भाई आपके पान ! यादव जी ने अपनी सायकिल से उतरते हुए ४ जोड़ी पान रमेश भाई की तरफ बढ़ा दिए और राम राम कहते हुए घर की तरफ बढ़ गए !
        लीजिये रमेश भाई ये सेब खाइये आखिरी दो बचा रखे थे , यहीं मैं अपने और आपके लिए ले आया ! आदिल अपनी दूकान बंद कर के केबिन के करीब रखे लकड़ी के टेबल पर बैठ गया !
रमेश भाई भी निवाड़ की कुर्सी पर बैठ गए !
आदिल : हाँ , अब बताइये !
रमेश भाई ने केबिन के भीतर रखे एक बड़े से पैकेट को आदिल की तरफ बढ़ाते हुए कहा : लो , इसे खोलो तो !
आदिल : अरे , इसमें क्या है ?
रमेश भाई : तुम मेरी आज की ख़ुशी का राज जानना चाह रहे थे ना , तो खोलो इसे फिर बात करते हैं !

        आधी रात हो चली थी ! अब अगली ट्रेन कोई दो बजे के करीब गुजरने वाली थी ! आदिल और रमेश भाई हलकी बारिश से भीगी मिटटी की सौंधी खुशबू में करीब की मज़ार पर आने जाने वाले इक्का दुक्का नौकरीपेशा ज़ायरीन की इबादत से जलाई अगरबत्तियों की महक के बीच ख़ुशी का राज तलाश रहे थे !

       आदिल ने बारी बारी से एक एक रीबन खोला और बड़े से पैकेट के अंदर से नायाब और बहुत महंगा, शानदार पश्मीना का दुशाला निकाला ! आश्चर्य से आदिल कुछ बोल ही नहीं पा रहा था ऐसा दुशाला उसने कश्मीर में देखा था जब वो दो साल पहले अपनी बुआ के घर गया था  ! दुशाले के नीचे करीने से महंगे सूखे मेवे सजे थे और साथ में कुछ रुपयों के लिफाफे के साथ एक चिट्ठी रखी थी , रमेश भाई के नाम ,

जिसपर लिखा था :

" दिवाली मुबारक़ हो दोस्त , साँसें रहीं तो अगली  " शरद पूर्णिमा " , फिर मिलेंगे ! "

आदिल एक हाथ में दुशाला , अपनी जांघों पर मेवों का डब्बा और दूसरे हाथ में लिफाफा लिए चिट्ठी पढता हुआ रमेश भाई की तरफ देख रहा था !

रमेश भाई गुम-सुम आँखों में अजीब से चमक लिए अतीत में जा चुके थे और बुदबुदा रहे थे :

           आज से कोई २० - २२ साल पहले मैंने इण्टर का एग्जाम " रौशन " के साथ दिया था ! आखिरी एग्जाम के दिन बहुत खुश थे हम दोनों ! आर से शुरू होने वाले नामो के कारण बचपन से ही साथ साथ एक ही बेंच पर बैठते थे और दोस्त थे ! हम दोनों के पिता रेलवे में थे तो हम रहते भी एक ही कॉलोनी में थे ! एग्जाम दे कर  घर पहुंचे तो मेरे घर के सामने भीड़ जमा थी ! मेरी धड़कन धीरे धीरे तेज़ होती जाती थी रौशन ने मुझे कस के पकड़ रखा था ! मेरे पिता का एक्सीडेंट हुआ था और वो नहीं रहे !

          में ही सबसे बड़ा था घर में ! दो छोटे भाई और एक बहन की ज़िम्मेदारी थी ! रौशन के पिता और दूसरे स्टाफ की मदद से मुझे पापा की जगह रेलवे में नौकरी मिल गयी पहले अस्सिटेंस और फिर गेटमेन की ! मुझे इंजीनियर बनना था लेकिन अगर मैं ये गेटमेन की नौकरी नहीं करता तो हम सब सड़क पर आ जाते ! घर रेलवे ले लेती और माँ को काम करना पड़ता ! अब घर भी वही पापा वाला हमारे पास है और छोटे भाई बहन पढ़ लिख गए ! सब अपने अपने घर खुश हैं ! मैंने शादी नहीं करी ! माँ मेरे ही साथ रहती है , एक नौकरानी है जो उनकी  ज़रूरतों का ख्याल रखती है ! भाई बहन आते हैं कभी कभी मिलने मुझे से लेकिन मुझे पूरे साल इंतज़ार रहता है कार्तिक की पूर्णिमा का जब रौशन मुझ से मिलने आता है , इस रेलवे फाटक पर !

रात गहराती जा रही थी रमेश भाई यादों और वर्तमान के गलियारों में घूम रहे थे  !

दोबारा होती बारिश के झोंके ने आदिल और रमेश भाई को टेबल थोड़ा भीतर सरकाने को मजबूर किया !

रमेश भाई ठण्ड बढ़ रही है मैं चाय बनता हूँ और आप ये दोशाला ओढिये !

अहमदाबाद मेल के गुज़र जाने के बाद लॉग बुक की एंट्री खत्म करी रमेश भाई ने और फिर खो गए अतीत में !

          वो रोज़ मुझ से मिलने आता था पहले कॉलेज जाते - आते समय और फिर जब उसने जज की परीक्षा पास कर ली फिर भी आता था ! ट्रेनिंग के बाद उसकी पोस्टिंग यहाँ से २०० मील दूर दूसरे जिले में हुई ! वो फिर भी आता  मिलने हफ्ते दो हफ्ते में एक बार ! ये सिलसिला कुछ १० साल ठीक ठाक चला और फिर बाद में बंद हो गया ! अगले ७ साल तक उसकी कोई खबर नहीं ! बड़ा इंसान था ! घर में सब ठीक ठाक था ! ना कभी मैंने उसके रहने का ठिकाना पुछा और ना कभी उसने बताया पर हम मिलते थे ! पर मेरा घर तो यही था जो उसे पता था !
             सुबह के ३ बज चुके थे ! आदिल की आँखों की नींद रमेश भाई के शब्दों के उडनखटोलों पर तैर रही थी ! हलके से इत्र की खुशबू ने रमेश भाई को गहरी सांस लेने को मजबूर किया ! करीब के हनुमान मंदिर के चौखट को धोने वाला पंडित जी का बेटा नल में पाइप लगाने की तैयारी कर रहा था ! इक्का दुक्का भारी सामान लिए ट्रक करीब के फलिओवेर से गुजर जाते थे !

             जब सात सालों तक वो नहीं आया मुझ से मिलने तो मैंने समझा की अब अंतर समझ लेना होगा मुझे उसमे  और खुद में जिस के कारण उसने दूरियाँ बना ली हैं फिर मैं अपने काम में अलग रहा ! छोटे भाइयों के बच्चे , बहन की शादी और माँ की सेहत और उनका ख्याल बस ये सब ही जीवन रह गया ! आपने कहने को कोई था तो वो माँ या फिर रौशन जिसने हर समय मेरा साथ दिया , हौसला दिया ! कभी मन खट्टा हुआ ये सोच कर की जीवन में क्या - क्या करने की चाहत थी और मैं रेलवे के फाटक पर काम पढ़ा लिखा गेटमैन बन कर रह गया !

       पिछले से पिछले साल मैं  इसी उधेड़बुन और खुद की किस्मत पर पर दिनभर सोचने के बाद स्टेशन पर रुकी फरंटियर मेल के गुजरने का इंतज़ार कर रहा था की आखिरी डब्बे के दरवाज़े से किसी ने पुकारा :

रमेश , रमेश !

रमेश भाई : कौन हो भाई ?

आवाज़े आई : अरे , मैं रौशन हूँ !

रमेश भाई : ओहह तुम इतने दिनों बाद !  नीचे आ जाओ  !

रौशन : नहीं , यहाँ कम देर का स्टॉपेज  है , अगले साल पूर्णिमा आऊंगा फिर मिलूंगा ! हर साल मैं अमृतसर अपनी बेटी के घर जाता हूँ शरद पूर्णिमा पर वहां से हम सब हरिद्धार गंगास्नान करने जाते हैं !

रमेश भाई : ठीक है , मैं इंतज़ार करूंगा दोस्त !

         फ्रंटियर मेल लम्बी सीटी देती हुई आगे बढ़ गयी लेकिन रमेश भाई का जीवन वहीँ घूमता रहा घर से फाटक और फिर घर अगले साल आने वाली " शरद पूर्णिमा " के लिए !

          अगले साल फिर वो रात आ गयी ! रौशन अपने कम्पार्टमेंट से ट्रैन के अंदर ही अंदर लास्ट कोच तक आ गए और इधर रमेश भाई भी उनसे मिलने को खड़े थे हाथों में हरी झंडी लिए !

         रमेश भाई ने चीनी मिटटी की बर्नी में कटहल का आचार रौशन की तरफ बढ़ा दिया माँ के संदेशे के साथ और रौशन ने एक गुलाबी पैकेट उनकी तरफ बढ़ा दिया गले लगाते हुए और वादा किया अगली पूर्णिमा फिर मिलेंगे !

पिछली रात भी फरंटियर मेल रुकी !

दो दोस्त मिले और दूर हो गए अगली शरद पूर्णिमा तक !

           सुबह के पांच बजने को थे ! आदिल की आँखों में नींद का नमो निशाँ नहीं था ! रमेश भाई और आदिल ने पूरी रात गुज़ार दी थी उस चाँदनी रात में ! 

           सुबह पांच चालीस की पसेंजेर ट्रेन की सवारियां प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने लगी थी !

         सवेरे से ही चाँद पूरा दिखाई दे रहा था और दिखाई दे रही थी रमेश भाई को अपने दोस्त की तरक्की और खुद का रुका हुआ समय जो रोज़ रात को फाटक पर जागता था फिर दिन में सो जाता था , सिर्फ और सिर्फ अपनेपन को तलाश में जो खत्म होती थी हर साल पूर्णिमा की रात फरंटियर मेल के आने और चले जाने पर  !



एक कहानी : " पूर्णिमा " 

:: मनीष सिंह :: 

Sunday, August 3, 2014

एक कहानी : पोशम्पा पा ……

        तेज़ रफ़्तार से दौड़ती टैक्सी लाल बत्ती पर रुकी तो " अनिरुद्ध " की नज़र सड़क के उस ओर लंच टाइम मे पोशम्पा पा भाई पोशम्पा पा   … खेलते बच्चों पर टिक गयी ! उनके सुरीले और तारतम्य लिए शब्दों ने उसे लगभग बाँध सा दिया था !  ड्राइवर ने तेज़ और लम्बा हॉर्न बजाया फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी  ! उन 120 सेकेंड्स में अनिरुद्ध जैसे बचपन , किशोरावस्था और जवानी का सफर कर आया था , पोशम्पा भाई पोशम्पा की शंब्दिक और भावपूर्ण नाव में हिचकोले लेते हुए !
 
         बीनू भाई ज़रा गाड़ी उसी स्कूल के पास फिर से ले चलो जहाँ लाल बत्ती पर रुके थे ! अनिरुद्ध ने ड्राईवर से आग्रह किया !
 
         बीनू ने जी सर कहते हुए गाड़ी अगले गोल चक्कर से वापस मोड़ ली और पूछा : साब किसी को मिलना है उस स्कूल में आपको ?
 
अनिरुद्ध निरुत्तर था !
 
बीनू ने कुछ देर बाद फिर पुछा : साब , स्कूल के अंदर ले लू ?
 
अनिरुद्ध : नहीं , यही पलाश के पेड़ नीचे रोक लो !
 
बीनू : सर ,ये नो पार्किंग ज़ोन है , फाईन हो सकता है !
 
       अनिरुद्ध ने कुछ रूपये निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिए और की कहा कुछ चीज़ों की कीमत नहीं होती बंधू और अपनी हाथ घडी को ठीक करता हुआ स्कूल की दीवार की तरफ बढ़ गया !
 
       अनिरुद्ध स्कूल की दीवार पर अपनी दोनों बाँहों को टिकाये खेलते बच्चों में अपना बीता बचपन तलाशने लगा ! जब शशांक और बाकी दोस्त पोशम्पा खेलते थे तो अनुपमा कितना रोती थी उसको भी साथ खिला लेने के लिए लेकिन वो दोनों ही उसको नहीं खेलने देते थे !
 
बीस ,पचीस सालों पहले बीत चुके दिनों की यादों में  खो गया था अनिरुद्ध दीवार पर बाँहों बीच ठुड्डी टिकाये !
 
       आज तो मेरा बर्थडे है ऐनी ( अनुपमा अनिरुद्ध को ऐनी कह कर पुकारती थी ! )  आज तो अपने साथ खेलने दो ! अनुपमा बोलते हुए क्लास रूम से शशांक और अनिरुद्ध के पीछे पीछे चल रही थी !
 
अनिरुद्ध : एक शर्त पर !
 
अनुपमा : वो क्या ?
 
तुम्हे मेरा और शशांक का बैग घर तक ले चलना होगा : अनिरुद्ध मुस्कुराते हुए बोला !
 
अनुपमा ने अपनी भौंह सिकोड़ते हुए हामी भरी !
 
           20  - 25 मिनट का रास्ता - खेल फिर बारिश , धुप और सर्द हवाओं में सड़क के किनारे लगे पलाश के पेड़ों के नीचे चलते हुए घर पहुचना ! रोज़ का काम था उन तीनो का ! जब बड़े हुए तो सामाजिक दायरे सिकुड़े और सब अलग अलग हो गए  ! पिता की ट्रांसफर के कारणं सब बिखर गया ! समय अपनी चाल से चलता रहा !

           शरीर ,दिमाग और ज़रूरतें कुछ चीज़ें भूल जाते हैं किन्तु हर उस चीज़ को मन ज़रूर याद रखता है जिसे आप भूलना चाहते है क्योंकि किसी को भूलने के लिए आपको उसको सबसे ज़्यादा याद रखना होता है !
 
बहुत सालों बाद :::::
 
            पहली नौकरी थी वो अनिरुद्ध की ! एक दवा कंपनी में ! अभी दो महीने ही हुए थे उसको की उस कंपनी में आय एस ओ सर्टिफिकेशन का प्रोसेस शुरू हो गया था ! तब कम्प्यूटर आया आया था और अनिरुद्ध उस का यूज़ जनता था इस लिए कुछ मैनुअल्स टाइप करने का काम उसको ही दिया गया और उसका कम्प्यूटर रखा गया लैबोरेटरी में !
 
क्या , अनिरुद्ध भाई आज आप जल्दी आ गए ? टाइम ऑफिस के खान ने पुछा !
 
अनिरुद्ध : हाँ , खान भाई आज दो पेपर पूरे करके देने हैं !
 
खान : मुझे लगा की आप आज आने वाली नई लैब असिस्टेंट से मिलने के लिए जल्दी आये हैं !
 
अनिरुद्ध : कोई न्यू जॉइनिंग है क्या आज ?
 
खान : जी हाँ ! वसीम साब के दोस्त की बेटी हैं ! रूडकी से आ रही हैं , नाम है अनुपमा !
 
          अनिरुद्ध को अब जैसे हर मिनट एक घंटे सा लगने लगा ! गोल गोल घूम कर लैब की पुरानी सी घडी ने नौ बजाये और वसीम साब की गाड़ी गेट पर आ रुकी !
 
अनिरुद्ध ने लेब की खिड़की से देख कर कन्फर्म कर लिया की खान ने सही कहा था की गलत !
 
           रोज़ मज़ाक करने वाला खान आज सही था , अनुपमा उतर चुकी थी गाड़ी से और सीढ़ियों से होते हुए मेन ऑफिस में दाखिल हुई !

लेकिन , ये वो तो नहीं !

            अनिरुद्ध के अंतर्मन ने आँखों को जवाब दिया ! अनिरुद्ध रिशेप्शन का दरवाज़ा जिस जोश से खोल कर बहार गया था उसके आधे से भी कम उत्साह से आ कर अपने कम्प्यूटर के सामने बैठ गया ! अनमना और अनुत्साहित ! खान के मुह से अनुपमा का नाम सुन कर ना जाने क्या क्या सोच लिया था उसने और सब एक बुलबुले सा एक पल में खत्म !

         अनिरुद्ध ये अनुपमा हैं ! आज से तुम्हारा कम्प्यूटर ये भी शेयर करेंगी रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए ! वसीम साब ने एक सोबर और सलीके से हाथों में राइटिंग पैड पकडे लड़की से उसको मिलवाया !

अनुपमा ये अनिरुद्ध हैं  , कहते हुए वसीम साब प्लांट की तरफ चले गए !

लैब में अब दो अजनबी थे !

कुछ देर  ख़ामोशी के बाद अनिरुद्ध ने ही पुछा : ये आपकी पहली  जॉब है ?

अनुपमा की पीठ थी अनिरुद्ध की ओर , उसने  टेस्ट ट्यूब में कुछ केमिकल मिलाते हुए जावाब दिया : हाँ !

अनिरुद्ध और अनुपमा फिर खामोश हो गए !

        एक दूसरे को चाह कर भी नहीं देख सकते थे ! बगल के दरवाज़े पर शीशा था जो बाहर की लॉबी में आने जाने वालों को लेब में एक नज़र डाल लेने को काफी था और फिर प्रोडक्शन एरिया से आने जाने का रास्ता भी वही था जिस से वसीम साब भी गुजरते थे !
 
       दोनों लगभग हमउम्र !

       दोनों के अंदर अंदर उधेड़बुन !

       एक दूसरे को जान लेने की चाहत !  
 
          अनुपमा अनिरुद्ध की अँगुलियों से दबते की बोर्ड की आवाज़ के बीच खुद का नाम सुनने  कोशिश करती थी तो अनिरुद्ध अनुपमा की हाथों में पकड़ी टेस्ट ट्यूब की रगड़ के बीच अपने को पुकारे जाने का इंतज़ार करता था ! दोनों एक दूसरे की पहल करने के इंतज़ार में अपना अपना काम करते रहे और सुबह से दोपहर हो गयी !
 
अरे भाई आज लंच नहीं करोगे दोनों ? शर्मा जी ने लेब का शीशा लगा दरवाज़ा थोड़ा सा खोलते हुए कहा !
 
जी सर ,  चलिए आते हैं ! अनिरुद्ध ने शर्मा जी ( लैब इंचार्जे ) को जवाब दिया और शर्मा जी वापस लंच रूम की तरफ बढ़ गए !
 
चलो अनु लंच ले लेते हैं !

अनिरुद्ध ने अनुपमा  की तरफ बिना देखे कम्प्यूटर लॉग ऑफ करते हुए कहा !
 
तुमने मुझे अनु कहा ?
 
अनिरुद्ध अचानक से किये गए अनुपमा के इस सवाल पर ठिठक गया !
 
अनिरुद्ध : कुछ गलत कह गया क्या मैं ?
 
अनुपमा कुछ नहीं बोली डबडबाई आँखों से अपना लंच बॉक्स ले कर लैब से बाहर निकल गयी !

अनिरुद्ध जैसे मृगतृष्णा में डूबा कम्प्यूटर के सहारे खड़ा रह गया ! लैब से होती हुई लॉबी से गुजरती अनुपमा को देखता हुआ.

दस मिनट  बाद !

तुम खाना नहीं खाओगे क्या ? अनुपमा लैब के दरवाज़े पर खड़ी अनिरुद्ध से पूछ रही थी !

हाँ, चलो आता हूँ कहता हुआ अनिरुद्ध टिश्यू पेपर से हाथ पोंछता हुआ दरवाज़े की तरफ बढ़ गया !

          लैब से लंच रूम की दूरी सिर्फ 50 कदम की थी और उन दोनों को जैसे पूरा जीवन मिल गया था अपनी कह सुनने के लिए !

बुरा लगा तुम्हे मेरा तुम्हे अनु कहना ? : अनिरुद्ध  ने पुछा !

अनुपमा : हाँ भी और ना भी !

अनिरुद्ध : हाँ कैसे ? और ना कैसे ?

अनुपमा : अभी में यहां बहुत दिन हूँ , फिर किसी रोज़ बताउंगी !

दोनों लंच  कर के अपनी अपनी सीट  बैठ गए थे  ! दोनों की पीठ दूसरे की तरफ ! निगाहें और हाथ अपने अपने काम पर किन्तु जुबान दूसरे से बात करती हुई !

अनुपमा : वो भी मुझे अनु कह कर बुलाता था !

अनिरुद्ध : वो , कौन ?

अनुपमा : मेरा एक पुराना दोस्त ! जिसे मैंने दिया पिछले महीने !

अनिरुद्ध : खो दिया मतलब ?

अनुपमा खामोश हो चुकी थी ! जैसे तेज़ आंच पर उबलती चाय पर अचानक कुछ ठन्डे पानी छीटें पड़ गए हों !

अनिरुद्ध निरुत्तर अनुपमा की तरफ घूम गया और फिर से पूछा :  खो गया मतलब अनु क्या हुआ तुम्हारे दोस्त को ?

अनुपमा  की आँखें डब डबा रहीं थीं !

अनिरुद्ध : क्या हुआ अनु ?

अनुपमा बह चली यादों की लहरों पर    .......

        मैं और फज़ल स्कूल से साथ साथ थे ! कॉलेज में भी साथ रहे ! फिर वो दिल्ली चला आया और अच्छी नौकरी करने लगा ! हम दोनों घर बसाना चाहते थे ! सब तय लिया था हमने सिर्फ घर के लोगो की मंजूरी के सिवाय ! अनुपमा की भीतर की यादों की नदी भावनाओं के किनारों को तोड़ती हुई बह चली थी अनिरुद्ध उनसे उठती शब्द फुहारों से पल पल भीगता जाता था !

फिर ? अनिरुद्ध ने वर्ड की फाइल को डेस्क टॉप सेव करते हुए पुछा !

        उस दिन दोपहर में फज़ल मेरे घर पर आया और हम मूवी देखने गए ! अभी पिछले महीने की ही बात है !उसको पहेली बार मिली थी मैं दिल्ली में उसकी नौकरी लगने के बाद !  दिन भर एन्जॉय के बाद  मैं  लौटी तो हमारे घर का माहौल कुछ बदला बदला लगा मुझे ! दरअसल मेरे पापा को अंदाजा हो गया था की हम दोस्ती को रिश्ते में बदलना चाहते हैं और उन्होंने मुझे  ताउजी के पास भेजने का फैसला किया था ! अगले दिन की ट्रैन थी डेल्ही से !

अगली सुबह मैंने अपनी छोटी बहन के थ्रू फज़ल को सब कुछ बता दिया !

          दोपहर को रुड़की से दिल्ली आये टैक्सी से फिर हमने ट्रैन पकड़ी और पटना के लिए निकल गए ! अगले दिन हम पटना में ताऊ जी के घर थे ! पापा का रिटर्न टिकिट अगले दिन शाम का था ! दोपहर में ड्राइंग रूम में रखे लैंड लाइन फ़ोन की घंटी बजी ! ताई जी ने फ़ोन उठाया और मुझे दिया ये कहते हुए की मेरी छोटी बहन है लाइन पर ! रिया के उन दो वाक्यों को सुनने के बाद उस दिन से मेरी ज़िन्दगी जीने की इक्छा खत्म हो गयी !

अनिरुद्ध : क्या कहा था उसने ?

          अनुपमा मोमबत्ती सरीखी निरंतर शब्द दर शब्द जलती जा रही थी और पिघलती जा रही थी :

         जब हम रुड़की से दिल्ली को चले थे तब उस रोज़ रुड़की से नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन तक फज़ल भी हमारे पीछे पीछे आया था बाइक पर ! हमारी ट्रैन चले जाने बाद वापस लौट रहा था की रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया और वो गुजर गया ! तब से मैं अकेली हूँ ! मैं परेशान रहती थी तो डाक्टर की सलाह पर मुझे कुछ बदलाव के लिए यहाँ  भेजा गया है ! वसीम अंकल मेरे पापा के दोस्त हैं !

अनिरुद्ध आवाक , अचेत और निःशब्द था !

तुम कहाँ खो गए हो ? अनुपमा ने अनिरुद्ध के कन्धों पर अपनी अँगुलियों को रखते हुए कहा !

यहीं हूँ ?

क्या सोच रहे हो ?

यही की मिलने के सौ बहाने और बिछड़ने के सिर्फ एक , वो भी ऐसे !

दोनों एक दूसरे को देख रहे थे ! कुछ  था जो खीच रहा था दोनों को !

अभी बात शुरू ही हुई थी की 4 बजे का हूटर बज उठा !

ऑफिस के पीयून " सोजल " ने लैब का दरवाज़ा खटखटाते हुए पुछा अनिरुद्ध भाई साब , अनुपमा दीदी आपके लिए चाय लाऊँ , पिएंगे ?

सोजल के शब्द ऐसे थे जैसे शांत जंगल में बरसते बादलों को किसी ने अचानक रुकने को कह दिया था !

हाँ सोजल ले आओ : अनिरुद्ध ने अपनी आँखों से टपकने को आतुर आंसुओं को टिस्शु पेपर से पोंछते हुए कहा !

कहाँ रहोगी तुम ?

वसीम अंकल के घर ही !

ओ के !

अगली सुबह !

गुड मॉर्निंग ऐनी ! अनुपमा अनिरुद्ध के बालों में अंगुलियां फेरती हुई बोली !

वाह ! गुड मॉर्निंग अनु लो ये तुम्हारे लिए !

कैडबरी सेलिब्रेशन का गिफ्ट पैक अनुपमा के हाथों में रखते हुए बोला !

          दिन भर एक दूसरे की बातें करते दोनों बहुत करीब थे ! जैसे नये रिश्ते बनने को थे की एक सुबह अनुपमा ने कहा !मुझे देखने कुछ लोग आने वाले हैं अगले संडे ! मुझे जाना होगा !

ओहह : अनिरुद्ध शांत सा बोला !

अनुपमा कुछ और सुनना चाहती थी किन्तु अनिरुद्ध से वो नहीं मिला तो वो संडे को अपने घर चली गयी !

संडे के बाद अनुपमा और अनिरुद्ध फिर से साथ थे !

क्या हुआ ? अनिरुद्ध ने पुछा !

अनुपमा : हाँ देख गए वो मुझे !

अनिरुद्ध : तुम्हारा क्या मन है ?

अब मुझे कुछ मन का करने का मन नहीं करता ! जब किया था तब हुआ नहीं ! अनुपमा बोली !

अनिरुद्ध : तो तुम वहां शादी लिए तैयार हो ?

अनुपमा : तुम  शादी करोगे ?

अनिरुद्ध : ये जवाब नहीं है !

अनुपमा : तो उत्तर समझ लो !

अनिरुद्ध : मतलब ?

अनुपमा : अब और मतलब क्या समझाऊँ ऐनी ?

अनिरुद्ध : ओह्ह !

एक हफ्ता बीत गया ! सब बातें हुई सिर्फ उस सब्जेक्ट पर ही दोनों खामोश  जाते थे  !

एक सुबह अनुपमा बोली : लड़के वालों ने मेरा ब्लड माँगा है !

अनिरुद्ध : वो क्यों ?

मेरा और उसका ब्लड टेस्ट होगा ! अनु बोली !

अनिरुद्ध : ठीक है फिर दे आओ !

तुम चलो मुझे लेबोरेटरी में ले कर यहीं पास में देना है ! अनुपमा ने सवाल के लहजे में आग्रह किया !

अनिरुद्ध अनुपमा को लेबोरेटरी ले गया और फिर घर छोड़ा !

अगले दिन से अनुपमा फिर कभी ऑफिस नहीं आयी !

कुछ साल बाद अनिरुद्ध के घर के बगल के घर पर लैंड लाइन पर फ़ोन आया !

अनुपमा की छोटी बहन रिया बात रही थी !

अनिरुद्ध : हेलो !

रिया : हेलो ! आप अनिरुद्ध बोल रहे हैं ?

अनिरुद्ध : जी , बोलिए रिया !

रिया : आपकी मम्मी की तबियत कैसी है ? दीदी ने जर्मनी जाने से पहले मुझ से कहा था पता करने को !

अनिरुद्ध : माँ तो नहीं रहीं !

रिया : ओह्ह ! ठीक है मैं दीदी को बता दूंगी !

अनिरुद्ध : अनुपमा कहाँ हैं ?

रिया : जी , शादी के बाद वो जर्मनी चली गयी !

अनिरुद्ध : ठीक है !

रिया : चलिए अनिरुद्ध जी रखती हूँ , फिर बात होगी आप अपना ख्याल रखियेगा !

अनिरुद्ध : जी , अनु को कहियेगा मुझे  याद रेहगीं , हमेशा !

और दोनों तरफ से फ़ोन रख दिया गया !

शाम होने को थी ! स्कूल बंद  चूका था !

सर , अब चलें !

बारिश होने को है ! बीनू ने विनम्रता से स्कूल की दीवार के सहारे खड़े अनिरुद्ध से आग्रह किया !

        बारिश होने को नहीं बीनू भाई , बारिश हो चुकी है कहता हुआ अनिरुद्ध अपनी भीगी आँखों को पोछता हुआ बीनू के कन्धों हाथ रख कर पलाश के पेड़ के नीचे खड़ी कार की तरफ चल दिया !

         कार अपनी रफ़्तार से घर की ओर चल दी थी ! घर कहाँ मकान था वो , जिनको घर बनाने वाली दो अनुपमा आते - आते कही और मुड़ गयी थीं ! कार के शीशे पर बारिश की बूंदों से बनती आड़ी टेढी रेखाओं के बीच कुछ तलाशता अनिरुद्ध बच्चों के शब्द सुनता जाता था जो उसने अपने iPhone  में रिकॉर्ड कर लिए थे  …… पोशम्पा पा …… भाई   पोशम्पा पा ……

एक कहानी : पोशम्पा पा ……



                                       ~~~~~~~~~~~~~~~  समाप्त ~~~~~~~~~~~~~~~~~