" बेटियाँ गिलहरियों सी "
बेटियाँ गिलहरियों सी,
फ़ुदकती फ़िरती ,
गालियारों में,
आँगन में,
खिलखिलाती , मुस्कुराती !
हथेलियों पर,
चित्र उकेरती,
उम्मीदों के,
आशाओं के, जीवन के !
दो हाथो से सहेजती ,
बिख़रे कपडे,
बेतरतीब बर्तन,
और खिलौने !
बेटियाँ गिलहरियों सी,
फुदकती फिरती ,
अपनी स्कूल ड्रेस में,
पहले प्राइज में,
पहले सर्टिफिकेट में,
पिता के गोद में,
भर देती हैं,
अनमोल खजाना ,
उम्रभर के लिए !
एक दिन,
शादी के जोड़े में,
सजी उम्मीदों सी,
चली जाती है,
फुदकने , खिलखिलाने ,
किसी और गलियारे ,
किसी और आँगन में,
फिर से ,
लौटती है , यादों की ,
गिलहरियां बन कर,
बिखरे बर्तोनो में,
चादर की सलवटों में,
और खिलौने में,
पिता के घर !
बेटियाँ गिलहरीयों सी !!
:: मनीष सिंह ::
बेटियाँ गिलहरियों सी,
फ़ुदकती फ़िरती ,
गालियारों में,
आँगन में,
खिलखिलाती , मुस्कुराती !
हथेलियों पर,
चित्र उकेरती,
उम्मीदों के,
आशाओं के, जीवन के !
दो हाथो से सहेजती ,
बिख़रे कपडे,
बेतरतीब बर्तन,
और खिलौने !
बेटियाँ गिलहरियों सी,
फुदकती फिरती ,
अपनी स्कूल ड्रेस में,
पहले प्राइज में,
पहले सर्टिफिकेट में,
पिता के गोद में,
भर देती हैं,
अनमोल खजाना ,
उम्रभर के लिए !
एक दिन,
शादी के जोड़े में,
सजी उम्मीदों सी,
चली जाती है,
फुदकने , खिलखिलाने ,
किसी और गलियारे ,
किसी और आँगन में,
फिर से ,
लौटती है , यादों की ,
गिलहरियां बन कर,
बिखरे बर्तोनो में,
चादर की सलवटों में,
और खिलौने में,
पिता के घर !
बेटियाँ गिलहरीयों सी !!
:: मनीष सिंह ::
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