Saturday, February 11, 2017

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फ़ुदकती फ़िरती ,
गालियारों में,
आँगन में,
खिलखिलाती , मुस्कुराती !

हथेलियों पर,
चित्र उकेरती,
उम्मीदों के,
आशाओं के, जीवन के !
दो हाथो से सहेजती ,
बिख़रे कपडे,
बेतरतीब बर्तन,
और खिलौने !

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फुदकती फिरती ,
अपनी स्कूल ड्रेस में,
पहले प्राइज में,
पहले सर्टिफिकेट में,
पिता के गोद में,
भर देती हैं,
अनमोल खजाना ,
उम्रभर के लिए !

एक दिन,
शादी के जोड़े में,
सजी  उम्मीदों सी,
चली जाती है,
फुदकने , खिलखिलाने ,
किसी और गलियारे ,
किसी और आँगन में,
फिर से ,
लौटती है , यादों की ,
गिलहरियां बन कर,
बिखरे बर्तोनो में,
चादर की सलवटों में,
और खिलौने में,
पिता के घर !

बेटियाँ गिलहरीयों  सी !!

                                      :: मनीष सिंह ::




 

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