Saturday, October 18, 2014

एक कहानी : पूर्णिमा !!

           बाहर हल्की बूंदा बांदी थी !  रात ९ बजकर २५ मिनट की फ्रंटियर मेल गुजर चुकी थी ! स्टेशन से कुछ पहले पड़ने वाले रेलवे फाटक के गेटमैन " रमेश भाई " अपने केबिन में निवाड़ की कुर्सी पर बैठे लॉग बुक में एन्ट्री कर रहे थे ! 

रमेश भाई चाय मंगवाऊ या छत्तीसग़ढ एक्सप्रेस के बाद पियेंगे ? 

केबिन के बाहर खड़े फल वाले आदिल ने पुछा !
लॉग बुक में एंट्री कर के पेन को कान के ऊपर खोंसते हुए रमेश भाई बोले :  आदिल , आज अभी ही मंगा लो !

ठीक है कहते हुए आदिल ने पास के चाय वाले को दो चाय का इशारा किया !

       छोटे से केबिन के बाहर दो चार सदाबहार के पौधे ! जिनपर गहरे गुलाबी रंग के फूल ! एक तुलसी का पौधा ! जिस पर रोज़ घर से लाये ताम्बे के लोटे से रमेश भाई जल चढ़ाते थे ! हलकी बारिश की फुहारों से भीग चुके थे और ट्यूबलाइट की रौशनी से चमक रहे थे !
रमेश भाई : आदिल ये तुलसी का गमला ज़रा अंदर सरका दो , बारिश धीरे धीरे तेज़ हो रही है मैं फाटक बंद कर रहा हूँ , छत्तीसगढ़ का सिग्नल मिल गया है ! 

आदिल ने झिझकते हुए तुलसी के गमले को केबिन के भीतर रखा और बोला :

आदिल : आइये चाय पीते हैं !
रमेश  भाई : हाँ लाओ मुझे यही पकड़ा दो मेरा गिलास , मैं हरी झंडी लिए यहीं खड़ा हूँ , इसके गुजरने तक !
धधड़ाती हुई छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस गुजर गयी ! पौधों से बूँदें छिटक के ज़मीन पर बिखर गयी !
रमेश भाई ने फाटक खोल कर लॉग बुक में एंट्री करते हुए चाय की आखिरी घूँट ली और गिलास खिड़की पर बाहर की तरफ रख दिया !
आदिल : आज आप कुछ अलग लग रहे हैं आप ! क्या ख़ास है आज रमेश भाई ?
आदिल साल में एक दिन मैं ऐसे ही खुश रहता हूँ ! रमेश भाई ने तुलसी का गमला फिर बाहर रखते हुए जवाब दिया !
आदिल : साल में एक दिन ? वो कैसे ?
रमेश भाई : आओ ज़रा ये लकड़ी का टेबल बाहर रखवाओ , बारिश काम हो चली , यहीं बैठ कर बताता हूँ !

आदिल : ठीक है फिर दूकान बढ़ा कर बैठते हैं !
        फाटक ये उस पार यादव जी अपनी पान की दूकान बढ़ा कर चलने की तैयारी में थे ! आदिल भी फलों को करीने से सजाने में लगा था ! एस टी डी की विकलांग द्वारा संचालित दूकान कब की बंद हो चुकी थे ! दिन भर बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे पूरा संसार चहल कदमी करता दिखाई देता है और रात में सिर्फ फाटक पर रमेश भाई और पड़ोस की कालोनी के घुमते चौकीदार !
       लीजिये रमेश भाई आपके पान ! यादव जी ने अपनी सायकिल से उतरते हुए ४ जोड़ी पान रमेश भाई की तरफ बढ़ा दिए और राम राम कहते हुए घर की तरफ बढ़ गए !
        लीजिये रमेश भाई ये सेब खाइये आखिरी दो बचा रखे थे , यहीं मैं अपने और आपके लिए ले आया ! आदिल अपनी दूकान बंद कर के केबिन के करीब रखे लकड़ी के टेबल पर बैठ गया !
रमेश भाई भी निवाड़ की कुर्सी पर बैठ गए !
आदिल : हाँ , अब बताइये !
रमेश भाई ने केबिन के भीतर रखे एक बड़े से पैकेट को आदिल की तरफ बढ़ाते हुए कहा : लो , इसे खोलो तो !
आदिल : अरे , इसमें क्या है ?
रमेश भाई : तुम मेरी आज की ख़ुशी का राज जानना चाह रहे थे ना , तो खोलो इसे फिर बात करते हैं !

        आधी रात हो चली थी ! अब अगली ट्रेन कोई दो बजे के करीब गुजरने वाली थी ! आदिल और रमेश भाई हलकी बारिश से भीगी मिटटी की सौंधी खुशबू में करीब की मज़ार पर आने जाने वाले इक्का दुक्का नौकरीपेशा ज़ायरीन की इबादत से जलाई अगरबत्तियों की महक के बीच ख़ुशी का राज तलाश रहे थे !

       आदिल ने बारी बारी से एक एक रीबन खोला और बड़े से पैकेट के अंदर से नायाब और बहुत महंगा, शानदार पश्मीना का दुशाला निकाला ! आश्चर्य से आदिल कुछ बोल ही नहीं पा रहा था ऐसा दुशाला उसने कश्मीर में देखा था जब वो दो साल पहले अपनी बुआ के घर गया था  ! दुशाले के नीचे करीने से महंगे सूखे मेवे सजे थे और साथ में कुछ रुपयों के लिफाफे के साथ एक चिट्ठी रखी थी , रमेश भाई के नाम ,

जिसपर लिखा था :

" दिवाली मुबारक़ हो दोस्त , साँसें रहीं तो अगली  " शरद पूर्णिमा " , फिर मिलेंगे ! "

आदिल एक हाथ में दुशाला , अपनी जांघों पर मेवों का डब्बा और दूसरे हाथ में लिफाफा लिए चिट्ठी पढता हुआ रमेश भाई की तरफ देख रहा था !

रमेश भाई गुम-सुम आँखों में अजीब से चमक लिए अतीत में जा चुके थे और बुदबुदा रहे थे :

           आज से कोई २० - २२ साल पहले मैंने इण्टर का एग्जाम " रौशन " के साथ दिया था ! आखिरी एग्जाम के दिन बहुत खुश थे हम दोनों ! आर से शुरू होने वाले नामो के कारण बचपन से ही साथ साथ एक ही बेंच पर बैठते थे और दोस्त थे ! हम दोनों के पिता रेलवे में थे तो हम रहते भी एक ही कॉलोनी में थे ! एग्जाम दे कर  घर पहुंचे तो मेरे घर के सामने भीड़ जमा थी ! मेरी धड़कन धीरे धीरे तेज़ होती जाती थी रौशन ने मुझे कस के पकड़ रखा था ! मेरे पिता का एक्सीडेंट हुआ था और वो नहीं रहे !

          में ही सबसे बड़ा था घर में ! दो छोटे भाई और एक बहन की ज़िम्मेदारी थी ! रौशन के पिता और दूसरे स्टाफ की मदद से मुझे पापा की जगह रेलवे में नौकरी मिल गयी पहले अस्सिटेंस और फिर गेटमेन की ! मुझे इंजीनियर बनना था लेकिन अगर मैं ये गेटमेन की नौकरी नहीं करता तो हम सब सड़क पर आ जाते ! घर रेलवे ले लेती और माँ को काम करना पड़ता ! अब घर भी वही पापा वाला हमारे पास है और छोटे भाई बहन पढ़ लिख गए ! सब अपने अपने घर खुश हैं ! मैंने शादी नहीं करी ! माँ मेरे ही साथ रहती है , एक नौकरानी है जो उनकी  ज़रूरतों का ख्याल रखती है ! भाई बहन आते हैं कभी कभी मिलने मुझे से लेकिन मुझे पूरे साल इंतज़ार रहता है कार्तिक की पूर्णिमा का जब रौशन मुझ से मिलने आता है , इस रेलवे फाटक पर !

रात गहराती जा रही थी रमेश भाई यादों और वर्तमान के गलियारों में घूम रहे थे  !

दोबारा होती बारिश के झोंके ने आदिल और रमेश भाई को टेबल थोड़ा भीतर सरकाने को मजबूर किया !

रमेश भाई ठण्ड बढ़ रही है मैं चाय बनता हूँ और आप ये दोशाला ओढिये !

अहमदाबाद मेल के गुज़र जाने के बाद लॉग बुक की एंट्री खत्म करी रमेश भाई ने और फिर खो गए अतीत में !

          वो रोज़ मुझ से मिलने आता था पहले कॉलेज जाते - आते समय और फिर जब उसने जज की परीक्षा पास कर ली फिर भी आता था ! ट्रेनिंग के बाद उसकी पोस्टिंग यहाँ से २०० मील दूर दूसरे जिले में हुई ! वो फिर भी आता  मिलने हफ्ते दो हफ्ते में एक बार ! ये सिलसिला कुछ १० साल ठीक ठाक चला और फिर बाद में बंद हो गया ! अगले ७ साल तक उसकी कोई खबर नहीं ! बड़ा इंसान था ! घर में सब ठीक ठाक था ! ना कभी मैंने उसके रहने का ठिकाना पुछा और ना कभी उसने बताया पर हम मिलते थे ! पर मेरा घर तो यही था जो उसे पता था !
             सुबह के ३ बज चुके थे ! आदिल की आँखों की नींद रमेश भाई के शब्दों के उडनखटोलों पर तैर रही थी ! हलके से इत्र की खुशबू ने रमेश भाई को गहरी सांस लेने को मजबूर किया ! करीब के हनुमान मंदिर के चौखट को धोने वाला पंडित जी का बेटा नल में पाइप लगाने की तैयारी कर रहा था ! इक्का दुक्का भारी सामान लिए ट्रक करीब के फलिओवेर से गुजर जाते थे !

             जब सात सालों तक वो नहीं आया मुझ से मिलने तो मैंने समझा की अब अंतर समझ लेना होगा मुझे उसमे  और खुद में जिस के कारण उसने दूरियाँ बना ली हैं फिर मैं अपने काम में अलग रहा ! छोटे भाइयों के बच्चे , बहन की शादी और माँ की सेहत और उनका ख्याल बस ये सब ही जीवन रह गया ! आपने कहने को कोई था तो वो माँ या फिर रौशन जिसने हर समय मेरा साथ दिया , हौसला दिया ! कभी मन खट्टा हुआ ये सोच कर की जीवन में क्या - क्या करने की चाहत थी और मैं रेलवे के फाटक पर काम पढ़ा लिखा गेटमैन बन कर रह गया !

       पिछले से पिछले साल मैं  इसी उधेड़बुन और खुद की किस्मत पर पर दिनभर सोचने के बाद स्टेशन पर रुकी फरंटियर मेल के गुजरने का इंतज़ार कर रहा था की आखिरी डब्बे के दरवाज़े से किसी ने पुकारा :

रमेश , रमेश !

रमेश भाई : कौन हो भाई ?

आवाज़े आई : अरे , मैं रौशन हूँ !

रमेश भाई : ओहह तुम इतने दिनों बाद !  नीचे आ जाओ  !

रौशन : नहीं , यहाँ कम देर का स्टॉपेज  है , अगले साल पूर्णिमा आऊंगा फिर मिलूंगा ! हर साल मैं अमृतसर अपनी बेटी के घर जाता हूँ शरद पूर्णिमा पर वहां से हम सब हरिद्धार गंगास्नान करने जाते हैं !

रमेश भाई : ठीक है , मैं इंतज़ार करूंगा दोस्त !

         फ्रंटियर मेल लम्बी सीटी देती हुई आगे बढ़ गयी लेकिन रमेश भाई का जीवन वहीँ घूमता रहा घर से फाटक और फिर घर अगले साल आने वाली " शरद पूर्णिमा " के लिए !

          अगले साल फिर वो रात आ गयी ! रौशन अपने कम्पार्टमेंट से ट्रैन के अंदर ही अंदर लास्ट कोच तक आ गए और इधर रमेश भाई भी उनसे मिलने को खड़े थे हाथों में हरी झंडी लिए !

         रमेश भाई ने चीनी मिटटी की बर्नी में कटहल का आचार रौशन की तरफ बढ़ा दिया माँ के संदेशे के साथ और रौशन ने एक गुलाबी पैकेट उनकी तरफ बढ़ा दिया गले लगाते हुए और वादा किया अगली पूर्णिमा फिर मिलेंगे !

पिछली रात भी फरंटियर मेल रुकी !

दो दोस्त मिले और दूर हो गए अगली शरद पूर्णिमा तक !

           सुबह के पांच बजने को थे ! आदिल की आँखों में नींद का नमो निशाँ नहीं था ! रमेश भाई और आदिल ने पूरी रात गुज़ार दी थी उस चाँदनी रात में ! 

           सुबह पांच चालीस की पसेंजेर ट्रेन की सवारियां प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने लगी थी !

         सवेरे से ही चाँद पूरा दिखाई दे रहा था और दिखाई दे रही थी रमेश भाई को अपने दोस्त की तरक्की और खुद का रुका हुआ समय जो रोज़ रात को फाटक पर जागता था फिर दिन में सो जाता था , सिर्फ और सिर्फ अपनेपन को तलाश में जो खत्म होती थी हर साल पूर्णिमा की रात फरंटियर मेल के आने और चले जाने पर  !



एक कहानी : " पूर्णिमा " 

:: मनीष सिंह :: 

1 comment:

  1. Waah Manishbhai.... Very Nice Touching story of Friendship and Life.
    Very Good..

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