Wednesday, October 17, 2012

.. स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें, खुद की तलाश के लिए !!

                   अनमने मन से उठा और बाहर की तरफ देखा छोटे से परदे को बड़ी सी खिड़की से हटा कर ....तो खुला सा समुन्दर अपने पूरे जोश में सब को संभावनाएं बाँट रहा था , रोज़ की तरह ...लेकिन मेरे होटल के किनारे एक छोटी सी दूकान पर उस नन्ही सी जान के लिए कुछ भी नया नहीं था आज ....  उसके लिए बस एक दिन था जिसमे दिन में गर्मी रहती है और शाम को हल्का अँधेरा और शाम को खाना मिला मिला ना मिला लेकिन खुले आसमान की चादर और ठंडी धरती का बिस्तर ज़रूर नसीब में था !!

                बात उन दिनों की है जब हमने नया नया उड़ना / घूमना सीखा था और शहर शहर घूम रहे थे , अधिकारिक यात्रा पर !!  उत्तर के शहर इतने करीब से देखें हैं की कुछ गूढ़ नहीं दीखता ..किन्तु वहीँ दक्षिण के शहर कभी देखे नहीं तो वहां की गलियां तक विशेष लगती हैं ! पोंडिचेरी की गलियों की सैर कर रहे थे अकेले ....पैदल !!  हाथ में डाभ ( कच्चा नारियल , पानी से भरा हुआ ) ले कर , गटकते हुए !! गवर्नर के बंगले से होते हुए जैसे ही गाँधी जी के पुतले की ओर बढ़ते हैं तो कुछ दूरी पर एक रेत से भरा हुआ रास्ता मिलता है  बिलकुल एसा लगता है जैसे की वहां की सरकारी आँखें इस टूकडे को देख नहीं सकीं नहीं तो इसको भी पुरे प्रयास से पथरीला कर देतीं या फिर ये भी लगता है की शायद इस को इस लिए उसके मूल स्वरूप में छोड़ा गया हो की आने वाले लोगों की कुछ सामीप्य लगे ...अपनी ज़मीन से इन पथरीले रास्तों में !!
              उसी रेतीली ज़मीन पर सुबह और शाम को छोटा सा बाज़ार लगता है , अपने शहर और आगंतुकों दोनों के लिए !! वहां दक्षिण के पारंपरिक पकवान के सिवा ,,,उत्तर भारत के भी पकवान मिलते हैं ....जैसे आलू की टिक्की , गोलगप्पे किन्तु उनमे आपको दक्षिण की खुशबू ज़रूर मिलेगी ताकि आपको स्मरण रहे की आप मूल स्थान से हट कर आनंदित हो रहे हैं !!
             चाय भी मिलती है !! मुरुगन उसी चाय की दूकान पर रहता था ! मेरा रोज़ का साथी ! आज कुछ उदास था , चाय भी कुछ फीकी बनी थी ....न चीनी तो उतने ही चम्मच डाली थी ज़रूरी पानी में बस स्वाद आया ही नहीं !! चाय की छन्नी में रखे बारीक कपडे के ऊपर पूरी की पूरी चाय उधेल दी थी उसने कुछ बहार छलक कर उसके हाथ पर आ गिरी तो उसे ख़याल आया की कुछ गलत जो रहा है !!... मैंने पुछा " क्या बात है मनु ? " कुछ नहीं साब .. ठेठ दक्षिण भारतीय हिंदी में जवाब मिला !! कुछ तो है बोल तो मन हल्का होगा ......मैंने इतना कहते हुए उसके कंधे पर अपना उल्टा हाथ रख दिया और कोशिश करी की उसके सर को सहारा दूं .....एसा लगा जैसे उसको कुछ मिल गया हो जैसे मृग मरीचिका .... वो मेरे कंधे और छाती से लगभग चिपक कर रोने लगा ..... ये कहते हुए ...." कोई अपना नहीं है साब ....देख लिया मैंने " !! मैंने उसको अपने दुसरे हाथ से सहारा दिया और उठने के लिए कहा ....और हम चल दिये महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास ....समुद्र में सम्भावनाये समेटने !!
              वो दिन आज़ादी का दिन था ...15 अगस्त , कुछ बच्चे छोटे छोटे तिरंगे बेच रहे थे ,,,,मैंने मुरुगन से पुछा लोगे ? हामी में सर हिला दिया उसने !! मैंने कुछ झंडे खरीदे ! मुरुगन से पुछा अब बताओ क्या बात हैं क्यों उदास हो ? वो बोला " साब में पढना चाहता हूँ पर मुझे स्कूल में एड्मिसन नहीं मिला ...और कोरास्पोंदेंस - पत्राचार की पढ़ाई के लिए एक मुश्त पैसे हैं नहीं मेरे पास ...और इस चाय की दूकान पर काम करते करते अगर पढ़ना चाहूं तो मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती की मैं समय पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूंगा !! .... अच्छा तो तुमने कोई हल तो ढूँढा होगा इस समस्या का ...? मैंने पुछा ! वो बोला हाँ साब ...अगर मुझे कहीं स 2500 रूपये मिल जाएँ तो मैं एक मुश्त फीस भर कर अपनी पढ़ाई जारी रखूंगा और धीरे धीरे पैसे भी चुकता कर दूंगा काम करके ...लेकिन कोई देता नहीं ना ...सब जान पहचान की बात करते हैं की कोई गारंटी दे दे ...जब की मैं इसी शहर का हूँ ...सब मुझे जानते हैं ....मेरे पिताजी और माता जी जब तक सुनामी में नहीं गुजरे थे सब मुझे पहचानते थे अब मेरे पास कुछ नहीं ...तो ये लोग भी नहीं पहचानते ....!!  अच्छा तो तुम इस लिए परेशान हो मैंने मुरुगन की टीशर्ट का कालर ठीक करते हुए कहा ? चलो मूंगफली खाते हैं ....!!  दक्षिण भारत में मूंगफलियाँ सडक पर मिलती हैं ! हा हा हा ....भाई ये तो कोई बाद ना हुई ...मूंगफलियाँ उत्तर भारत के शहरों में भी सड़कों पर मिलती हैं और लोग तो इसको " गरीबों का मेवा " कहते हैं !! खैर दक्षिण में मूंगफलियों को पानी में उबाल कर सडकों पर बेचा जाता है ....मैंने और मुरुगन ने कुछ मूंगफलियाँ खरीदीं और समुद्र की तरफ मुह कर के दीवार पर बैठ गए !!
                 अब मुरुगन के चहरे पर मुस्कान थे ....उमीदों भरी ...पर मैं अब उलझन में था !! मुझे नहीं याद की मैंने उस की क्या मदद करी थी किन्तु इस बात को सोच कर उलझ गया था की .... क्या विचित्र सी बात है की स्वयं के  शहर में व्यक्ति परिचय ढूँढने को बाध्य हो जाता है और अपरिचित शहर में कैसे परिचित होने की सम्भावनाये जन्म लेती हैं !! मुरुगन मुझे मिलता है विभिन्न रूपों में आज भी सपनों में और यदाकदा उन्ही गलियों में मिटटी के दिए बेचते हुए , सुगन्धित अगरबत्ती बेचते हुए , सुन्दर से मुरझा जाने वाली मालाएं बेचते हुए ...अपने ही लोगो के बीच अपरिचित सा ...बस उसी समय जब वो स्वयं के बारे में सोचता है ....अन्यथा सब के समीप है ...सबका अपना है वो , चाय की मीठास रूंधे हुए गले के कसैलेपन को कम नहीं कर सकती !!
                हमें , स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें और उनमे खुद को तलाशना चाहिए ...तब जब आपको परिचय की दरकार ना हो ....ताकि जब आप अजनबियों के बीच हों तो कम से कम स्वयं को तो स्वयं का परिचय ना देना पड़े !!  मुरुगन आज बारहवीं कर चुका है , स्वयं को स्थापित कर रहा है और मुरुगनो से परिचित होने के लिए !!!  ये तो सफ़र है , चलता ही रहेगा कभी आपसे मुआकात हो तो कृपया पहचान लीजियेगा , बिना परिचय दिए श्रीमान !! 

Friday, October 12, 2012

...... कम्पित , पत्ते पीपल से !!

मेरा मन ,तुम्हारा मन,


उमीदें , सपने कल के !

नयनों में ही पलते, या

अश्रु होते , अविरल से !!


स्थिरता स्वाति बूंदों की,

परिवर्तन की आस लिए,

भावावेश की आंधी में ,

कम्पित , पत्ते पीपल से !!



Sunday, October 7, 2012

...रेडियो पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है, सुन कर देखिएगा, अच्छा लगता है !!

                आज बहुत दिनों के बाद एक कहानी सुनी ...जी हाँ ठीक पढ़ा अपने " सुनी " पढ़ी नहीं !! 

               अब देखिये ना आजकल के इन्टरनेट के ज़माने में हम सब कुछ पढ़ लेते हैं ...सब कुछ , कुछ भी नहीं छूटता ; कोई पर्दा नहीं हाँ वोही पर्दा टाट का ,जो कभी इंटर में पढ़ी एक मिर्जा साहब के दरवाजे पर पड़ा होता था ...सब इज्ज़त को घर की चौखट के भीतर समेटे हुए .... और वो भी पर्दा जिसके होने पर सब है जिसके ना होने का ग़म उस से पूछिए जिसके पास अदद चौखट भी नसीब नहीं , और वो पर्दा भी जो कभी कभी कुछ लोगो की अक्ल पर पड़ जाता है तो मुश्किल होती है पर्देवालों के लिए !!
               खैर ,हम कहानी के सुननाने और सुनने की चर्चा कर रहे थे ...आइये उसी विषय पर ही सफ़र करते हैं ...कहाँ परदे वालों के बीच फंस  गए ....हमारे आप के बीच क्या पर्दा , सब अपना और जाना पहचाना है !!
             मेरे घर का टेलिविज़न अचानक ख़राब हो गया है ! हम अक्सर घर में शाम की चाय के  साथ में और मेरी प्यारी सी पत्नी " रीना " टेलिविज़न पर हो रही किसी देश से जुड़े दिन के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा को देखते हुए पीते हैं !! आजकल मेरी अर्धांगिनी ओने मायके में हैं ....तो शाम की चाय कुछ फीकी लगती है और उसका फीकापन कुछ तब से और बढ़ गया है जब से वो कुछ दिनों के लिए अपने मायके में है ...जबतक वो वापस आये उसकी यादों के सहारे ही चाय पीता था की टी वी भी खराब हो गया !! फिर एक सहारा मिला ...इन्टरनेट का ...फेसबुक का , ब्लॉग का , जीमेल का , याहू का , ऑनलाइन अखबारों का ....ये सब आँख गडा कर देखना होता है !! कब तक एक टक 14 इंच के लेपटोप पर मन बहलाते रहेंगे ....अब टी वी की बात कुछ और है ....वहां तो द्रश्य बदलते रहते हैं ...और यहाँ खुद तय करना होता की क्या देखना है !! कुछ  देर में मन ऊब गया ! फिर ध्यान गया अपने घर के कोने में रखे एक ऍफ़ एम् , रेडिओ , सी दी , केसेट प्लेअर पर ....रीना जब अक्सर घर में उसी को चला कर पुराने , नए गानों को सुनते हुए अपना घर का सब काम निबटती है .... उसे साफ़ सफाई खूब पसंद है और में उसके उलट ... ! सोफे के कपडे को करीने से सजा कर जाती है और में उस पर बैठ कर उसको बेतरतीब कर देता  हूँ ....! वो फिर ठीक करती है !
                     आज मैंने भी उस ऍफ़ एम् रेडियो की ओर अपना  बढाया और उस पर रखे कपडे हो हटा कर चला दिया ....थोडा वक़्त लगा किसी चेनल को  सर्च करने में ...फिर एक गाना सुनाई दिया ..." आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ इक इसे गगन के तले  " ये तो बस मेरे मन की बात हो गयी ...मुझे कुछ अच्छा सा सुंनं था और ये गाना सुनाई दिया जैसे मुझे सही में उस दिशा की ओर ले जा रहा था जहाँ की सब सूनापन और खालीपन काफूर हो जाये ! दर असल ये एक कहानी का हिस्स्सा था जो उस चेनल पर सिलसिलेवार सुने जा रही थी .... !!
                 याद शहर के नाम से एक शहर काल्पनिक जगह के इर्दगिर्द उद्घोषक रोज़ एक कहानी सुनाता है और उसको सिलसिलेवार क्रमशः रखने के लिए हर विराम पर उस विराम की भावनाओं से जुड़ता हुआ कोई गाना सुनाता है ....वो ही था ....!!
            अब तो घर पर नया टी वी भी आ गया है किन्तु मैं अब भी उस दिन के बाद से कोशिश करता हूँ की 9 बजे से 10 बजे के बीच उस चेनल को सुनु और कहानी सुनु ....नानी और दादी से तो स्वयं कोई कहानी सुनी नहीं ....हाँ ये सुना है की नानी और दादियाँ कहियां सुनती हैं .... !! अब तक जो भी कहानी सुनी सब उत्तम हैं !! हर कहानी के साथ हम जुड़ते चले जाते हैं ...और कभी कभी तो उद्घोषक के स्वर के उतार चढ़ाव, बोली में मिठास से एसा लगता है की सब कुछ अपने ही साथ गुजरा बीता हो ...अपने ही जीवन की बात हो ....अब देखिये ना सबसे पहली कहानी जो सुनी उसका नाम थे ...." भगत जी " ....एक ऐसे इंसान की कहानी जिसके जीवन में शादी के 30 सालों के बाद भी औलाद का सुख नहीं था ....बाढ़ में सब ख़तम हो गया था ...गाँव के ही प्राथमिक स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे , और शाम को घर के पास के मंदिर में देवी देवताओं की सेवा करते थे ...रिश्ते नातेदार थे तो 30  सालों से कोई  आया नहीं उनकी सुध लेने ...वो सब गाँव के घरों में जा जा कर उनके काम में बिना मांगे मदद करते थे ...और दिन बिता लेते थे ..जब एक दिन उनको पता चला की उनके भतीजे की शादी उनके ही गाँव के एक बड़े सेठ के घर तय हुई तो ये सोच कर शायद उनको बुलावा आएगा उन्होंने उधार ले कर नए कपडे , चाही के लिए साडी और जुटे खरीद ली ...पर कोई बुलावा नहीं आया ....मन मार कर घर में बैठे थे की उनको एक तरकीब सूझी ....उठे बाज़ार गए कुछ मिठाई लाये और अपनी पतनी संग मिठाई खाते हुए बोले ...पतनी जी ..कोई बुलाये ना बुलाये हम अपने घर पर तो अपने भतीजे की शादी की ख़ुशी मना  ही सकते हैं ....! सही है ...दुखी और खुश होना अपने ही हाथ में हैं !! गरीबी रिश्तो की मजबूती और अमीरी उनके ढीलेपन को परखती है !!
               दूसरी कहानी थी एक इसी लड़की की जिसने अपने परिवार के खिलाफ प्रेम विवाह किया था ....जिसको 10 साल हो गए थे ...मायके की याद आती थी ...अब उसकी बेटी भी   ननिहाल क्या होता है  पूछती थी और वो निरुत्तर हो कर रह जाती थी ! एक दिन एक पोस्ट कार्ड आया ..उसके नाम उसकी माँ का ...लिखा था ...तुझे कभी हमारी याद नहीं आती ....एक बार मिलने की कोशिश तो की होती !! ...कल तेरे पिताजी शहर आ रहे हैं !! बस इतना पढना था की वो सोचने लगी की क्या करून घर को कैसे ठीक करून की पिताजी को अच्छा लगे ...घर के खर्चे की लिए बचे 
पैसों में सिर्फ 300 रूपये बचे और बेटी के जुटे लेने थे और 5 दिन बाकी थे ....इस  उधेड़बुन में थे की शाम हुई और पिताजी नहीं आये ...बेटी का जो मन उसने मारा था उसको जुटे नहीं दिला कर ..
उसको जुटे दिलानी चल पड़ी ..क्यों की उसके पिता ने अपने परिवार को चुना था और उसको भुला दिया था ...तो आज की घटना की बाद उसने भी ठान लिए की मैं भी अपने परिवार पर ध्यान दूंगी ...ये ही मेरा परिवार है !!

           बस इस तरह से और भी दिल को छु लेनें वाली ना जाने कितनी कहानियां , जिसमे अपने  जीवन की सब झलक दिखाई देती हैं ... नेट पर काम करते हुए ये कहानी सुनता रहता हूँ ...साथ साथ में चलते गानों को भी सुनते रहता हूँ !   आजकल कहाँ समय है किसी के पास किसी की बात सुनने का ...पर जब बात कुछ ऐसी हो जो अपनी ही हो और अपने ही तरफ से कही जा रही हो तो ...ज़रूर सुनने की इक्षा होती है ...आनंद तब और बढ़ जाता है जब आप डूब जाते हैं ...शब्दों और भाव में ...
जिसका पता तब चलता है जब किसी कह जा रही बात से आप के मन के भाव आपके नयन के प्याले भर देते हैं किन्तु उनको छलकने नहीं दते ...और गला भर आता है ...और आपके  से मुह से कुछ नहीं निकलता !! स्वयं से जुड़ना कठिन है किन्तु नामुमकिन नहीं ... सहारा कहानी सुनने का लिया जा सकता है !! आगे की कहानियां अपनी पत्नी के साथ सुनूंगा जल्दी ही !!

       रेडियो  पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है ,  सुन कर देखिएगा ...अच्छा लगता है !!  

Thursday, October 4, 2012

...... और जंतर-मंतर मर गया !!

                              ....मित्रों मैं जिस रास्ते से अपने दफ्तर जाता और आता हूँ आज भी उस पर कुछ खेत मिलते हैं ... जिनमे मौसमों के आधार पर कुछ न कुछ फसल लगी रहती है .....आज कल धान लगी है , सुर्ख हरे रंगों की घान की ऊपर की और उठती एक एक पौध और उसमे अंगडाई लेती हलके पीले रंगों की बालियाँ ....जी हैं अभी बाद बनना ही शुरू हुआ है ...शाम के लगभग पौने सात बजे में उन खेतों के बीच से हो कर गुजरती हुई सड़क से गुजरता हूँ ...बस सुगन्धित बालियों से निकली हुई खुशबू मेरी नासिका को इस कदर अपनी और आकर्षित कर लेती है की बस कभी कभी तो रुक कर उस का आनंद लेता हूँ ! मुझे मालूम है की खुच महीनो के बाद से सब ख़तम हो जायेगा , बालियाँ पाक जाएंगी और खेत सूने हो जाएँगे ,,,,तेज़ लू चलेगी और सुखी धुल उड़ेगी , लेकिनं ये भी आशा है की फिर से इसमें धान लगे जाएगी इस लिए आज के होने और कल न होकर फिर से होने के मध्य का काल इतना दुःख नहीं देता जितना आज एक खबर ने दिया !!

            आइये उस खबर पर चर्चा करते हैं !! वैसे तो अखबार के माध्यम से किसी खबर पर चर्चा करना कितना उचित और न्यायसंगत है ये आपने कुछ दिनों पूर्व एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक प्रगतिशील संगठन के मध्य होते विवाद को देख और सुन लिया ही होगा !! फिर भी हम ये हिम्मत करेंगे की उस खबर के आधार पर चर्चा करैं और दुःख प्रकट करैं जो हमने आज पढ़ी , और साथ में जा कर उस खबर का सच भी जाना ...जो अक्षर अक्षर सच निकला ....!!
           एक अखबार में पढ़ा की दिल्ली के जंतर मंतर को वो दर्जा देने से मना कर दिया गया है जिसका वो हक़दार है !! अन्तराष्ट्रीय धरोहर का !! क्यों की उस अन्तराष्ट्रीय संस्था ने पाया की जिस विशेषता के लिए जंतर मंतर जान और पहचाना जाता है ....मौके पर उसको वैसा नहीं पाया जा सका , अतः अन्तराष्ट्रीय धरोहर नहीं कहा जा सकता !!  एक बात साफ़ कर दें की जंतर मंतर में स्वयं एसा कुछ नहीं हुआ की उसकी पहचान कम हो गयी है .... उस को जबरदस्ती ...धीरे धीरे मारा गया !! आज जंतर मंतर उस फूल की तरह हो गया है जो खिला हुआ है ...जिसमे चटक रंग भी है ...जिसमे मकरंद भी है ...परागकण भी हैं ....किन्तु उसको एक शीशे के घर में क़ैद कर दिया है जिस पर कभी तितलियाँ नहीं बैठ सकती , जिस पर कभी परागकण ले कर मधुमखियाँ अपनी मिठास की गगरी में उसका योगदान नहीं ले सकती !!
           हुआ क्या ? जैसा की हम सब जानते हैं की जंतर मंतर एक यन्त्र है जो की सूरज की किरणों के आधार पर करता है ...और गड्नाओं के आधार पर समय का पता लगाया जाता है ! भारतीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों !! सतरहवी शताब्दी में इस का निर्माण करवाया गया था जब घड़ियाँ नहीं थी !! सूरज की किरणों के आधार पर सटीक समय की गद्नाये की जाती थी !! आज इस के यंत्रों के ऊपर सूरज की किरणे ही नहीं पहुच पाती ....चारो और ऊँची ऊँची इमारतें कड़ी हो गयी है ....जिसके करने जंतर मंतर में प्राण तो हैं किन्तु वो स्वयं संवादहीन हो गया है !!
           बचपन से सुनते आ रहे हैं ...दिल्ली में एक जंतर मंतर है ! कई बार वहां गए भी ! आनंद लिया ...उस इमारत का जिसको कितने मन से बनवाया गया है !! आज उसका गला घोट दिया गया ! कितने ही आन्दोलनों की जन्स्थाली आज स्वयं निर्जीव सी हो कर पड़ी है !! कितने ही आन्दोलनों को जीवित रखने वाला जंतर मंतर आज स्वयं मरित्श्य्या पर है !! कितने की आन्दोलनकारियों की आवाज बन्ने वाला जंतर मंतर स्वयं अपने लिए एक आवाज खोज रहा है !! 1982 के एशियाड खेलों का शुभंकर रह चूका ये ...आज अपने अशुभ समय को कोस रहा है !! आज भी कितने आन्दोलन हो रहे हैं इसकी दीवारों के इर्दगिर्द ! कितने लोगो का घर बन चुकी इस की दीवारें अपने लिए एक अदद सहर ढूंढ रही है जो इसकी आवाज़ बन कर कुछ कहे सरकार से की कुछ करिए ...मैं ही था जब समय घड़ियों में बही था ...! एसा लगता है सच में समय आगे निकल गया है ...तेज़ रफ़्तार से चली ज़िन्दगी में कहीं पीछे छूट गया है ...हमारा जंतर मंतर ....लिकिन है तो !! नै पीढ़ी जिसको इसके मायने नहीं पता ...क्या सोचेंगे इस ईमारत के बारे में ....क्या बनाया था लोगो ने टेढ़ा मेधा ...दीवंरें पूरी भी नहीं बनवाइय ....!! उनको कुछ दिशा देने वाले दिशानिर्देश क्या उम्मीद तब तक वहां रहेंगे भी की नहीं !!!!

               विदेशों में सुनते हैं की पूरी की पूरी इमारत को एक स्थान से दुसरे स्थान पर विस्थापित कर दिया जाता है !! हमरे नेता और नौकरशाह तो पूरी दुनिया में घुमते हैं ....शायद किसी को ये तरकीब सूझे जंतर मंतर के बाबत , ऐसी हैं उम्मीद करते है !!  दिल्ली के जंतर मंतर सरीखा के और जंतर मंतर है ...जयपुर में ....मैंने देखा है ...हवामहल से साफ़ साफ़ दिखाई देता है ! जी हैं अभी उसके चारो और सब साफ़ है ! ऊँची दीवारें नहीं बनी !! किसने कहा की इमारतें ऊँची हों तो ही तरक्की होती है !! एक बड़े देश की सबसे ऊँची इमारतो को गिरते देखा है हमने ,  दुनिया का सबसे विक्सित देश है ...फिर भी इमारतें गिर गयी !! धरोहर सम्हालानी चाहिए !! हमें कुछ तो मिला है पूर्वजों से , कुछ नया अपनी आने वाली पीढ़ी को दे नहीं सकते तो पाया हुआ ही संभाल कर हस्तांतरित कर दिया जाये !! 
                  अपनी विशेष पहचान और मनमोहक कलाकृति के कारण हमेशा याद किया जाता रहेगा ...किन्तु आज भी उसमे वो सब है जिसके लिए वो जाना जाता है ...बस उस तक सूरज की किरणों के  आने का इन्तेजाम करना होगा , वैसे ही जैसे हम अपने घरों में आगंतुक के लिए द्वार खोल देते हैं ....और अपनी निगाहें  द्वार पर लगा कर टकटकी कगाये उसके आने का इंतज़ार करते हैं ....आज जंतर मंतर उसी इंतज़ार में हैं ....
और सूरज की किरणे उस से दूर हो चली हैं ...बहुत दूर व्यापारिक संस्थाओं की इमारतों के पीछे ...जहाँ व्यापार
आ जाता है वहां अपनापन ...........मर ही जाता है ........ और जंतर - मंतर मर गया !!
                                                                                                                 आपका अपना - मनीष

आपकी सुविधा के लिए उस अखबार का लिंक दे रहा हूँ ....  



Saturday, September 22, 2012

..... चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है !

             याद कीजिये अपनी क्लास 2 की उस हाफ पैंट को जिसपर की कोई भी क्रीज़ नहीं होती थी और बेल्ट स्कूल के ही बिल्ले के साथ इंतनी टाईट बंधी होती थी की सुबह सुबह के खाली पेट मे भी आधा पराठा ठीक से नहीं जा पता था और इतनी सलवटें की पैंट ...पैंट कम झोला ज्यादा लगती थी ....और हम उसी में खुश थे , चिंता थी तो बस इस्कूल में प्रार्थना के शुरू होने से पहले पहुच सकें ...वरना लेट आने वाले बच्चों की लाइन में लगना पड़ेगा ....और अगर एक बार भी एसा हुआ तो फिर पहले क्लास टीचर , फिर प्रिन्सिप्ल और अंत में पूरी क्लास में छुट्टी की घन्टी बजने तक पूरी कलास के दिन भर दिए जाने वाले ताने ....बाप रे बाप कितना जुल्म था उन दिनों ....!! ये ही चिंता थी बस लेनिन उन उन् दिनों !
           समय बीता अपने पास का ज्यमितिये बक्सा और उस में का सामान पूरा होने की चिंता ...एक दो चिली हुई पेन्सिल ज्यादा रख लेते थे ताकि पिरीअड में दिक्कत ना हो ! दसवीं से समय रात दिन की पढ़ाई ....और फिर इस्कूल के रस्ते में मिलने वाली कोई .....जिसको हमारे जन्नाने में हम खूब अछे लगते थे से भेंट ...बस निगाह भर .....! जूते मोज़े सजीले होते थे , अगर तै का चलन होता तो वो हमेशा सीधी होती / या होनी चाहिए ...! फिर परिणाम की चिंता और जल्दी से परिणाम आजाये तो फिर कुछ वोकेशनल कोर्स की तलाश ...अ फिर बारहवीं में एड्मिसन की चिंता ...क्या पता कम प्रतिशत में विज्ञान मिलेगा भी की नहीं ...भले हम विज्ञान केलायक ना हों किन्तु एक दोस्त ने वो विषये चुना हो तो हम भी वो ही लेंगे ....ना मिल्पाये तो कला से ही डिग्री पा लेंगे या सोच कर कम से कालेज में दाखिला तो मिले !! कुछ और बड़े हुए तो ...जूते छोटे होगये ...बदलने की चिंता किन्तु लकी होने के कारन उन्हें छोड़ने का मोह और नए कैसे होंगे की चिंता ....! गग्रेज़ुएत हो जाएँ तो बस कोई नौकरी मिल जाने की चिंता !! नुकरी मिली तो हम दिशाहीन !! क्या ये ही सही रहेगा अपने लिए ...की चिंता !! घर को खूब सजा देंगे ...के लिए कुछ नया खरीदें लिकिन हात में अपने पैसे न होने की चिंता ....कैसे कुछ ज़यादा कमाया जाए ...की चिंता !! चलिए अब जब नौकरी मिल जाये तो जहाँ हैं वहां से और ऊपर की और की तरक्की की चिंता , चलो तरक्कि भी हो गयी ...तो वंश की चिंता .... शादी ब्याह हो जाये उसका अपना आनंद जिम्मेदारिओं का और चिंता के स्तर का , उपलब्धियों का !

            मैं यहाँ एक विशेष समय को लेकर ज्यादा केन्द्रित हूँ की ये सही है की समय , आयु और संबंधों के साथ साथ आपकी चिंताएं बदलती और घटती और बढाती रहती हैं ....जिनको समझदारी से निभाया और पूरा किया जाता है ....फिर भी एक समय होता है आपके जीवन में जब आपको कोई चिंता नहीं होती और सब आपकी चिंता करते हैं ....पर उस समय को सब लोग नहीं जी पाते ....आइये उस पर बात करते हैं .....
        
          पिता जी , माँ सब ध्यान से आपके हर सामान को जुटाने में लगे होते हैं ...और आपके सामने आते ही आप किसी ना किसी बात पर उसमे नुक्स मिकल देते हैं ... रंग अच्छा नहीं है ड्रेस का , जूते इसे नहीं वैसे वाले चाहिए थे, कल टिफिन नहीं केक ले जाने का मन है ....आज दूध नहीं पियूँगा , सेब अच्छा नहीं लगता , घिया बाप रे ये किस चीज़ की सब्जी बना कर रख दी , दाल ओहो हो ..मुझे दाल नहीं खानी ..कढी में से खट्टी खट्टी बदबू आती है ....अनार इसके दाने आपने धोये क्यों नहीं ...? कल ही तो ये टी शर्ट पहनी थी आज दूसरी दो , आप ने मेरी चाकलेट तोड़ी क्यों ? मुझे साबुत खानी है ....! टेबल का लेम्प ज्यादा रौशनी देता है ...लो वोल्ट का बल्ब लगाइए तो पढूंगा !! पेंसिल छोटी हो गई है ....दूसरी दीजिये , रबर सफ़ेद होगी तो ही स्कूल जाऊंगा !! मेरे ग्लास से दीदी , भैया ने क्यों पानी पिया ....मुझे नया ला कर दो !! पहले टीवी पर कार्टून लगाओ तब डिन्नर खाऊंगा ! पहले बोलो की कल मुझे वहां ले चलोगे तो होमे वर्क करूँगा .....और अंत में आप घोडा बनो मुझ को घुमाओ नहीं तो में सोऊंगा नहीं .....और ना जाने क्या क्या ....!!
         जिन लोगो ने ये सब या इस से भी ज्यादा सुख और करीबियत का आनंद लिया है ...उनको बधाई ...! किन्तु सब लोग इस प्रकार के सुख लायक अपने को नहीं पाते .... जो है बस वो ही है ....विकल्प नहीं ....कोई !!
         चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है ...किन्तु अवय्श्क ये है की उनको जिया जाए उनके मूल स्वरुप में , निभाया जाये , संप्रेषित किया जाए उन तक जिनको आभास तक नहीं उनका ...किन्तु संवेदना के साथ , विनय के साथ , आभार के साथ ....समर्पण के साथ ....!!

Wednesday, September 19, 2012

..... हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !! ....यात्रा और मेरी भावनात्मक उपलब्धि !!

               हम सब ....जी हाँ ...हम सब अपनी अपनी सभी भौतिक उपलब्धियों के विषय में जब भी मौका मिलता है ज़रूर अपने अपनों के साथ चर्चा करते हैं !!

                  आइये में आज अपनी भवनात्मक और स्नेहात्मक उपलब्धि के विषय में आपसे बातें करता हूँ ......!! ये कोई 8 दिनों पहले की बात है ...दोपहर के कोई सवा तीन बजे का वक़्त हो रहा था मैं और मेरे एक सहयोगी अधिकारिक कार्य से कलकत्ता जाने की तय्यारी में थे ...वो ग्रेटर नॉएडा से और में गाज़ियाबाद से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तरराष्ट्रीये हवाई अड्डे पर पहुचे ! अपने उड़नखटोले में पहुचने तक जो भी नियमावली के अनुसार काम करना होता है हमने किया और लाइन लगा कर अपने उड़नखटोले में सवार हो गए ! 
               उड़ान थी इंडिगो की 6इ - 365 और हमारी सीट थे 2बी और 2सी , मैं किनारे वाली सीट पर बैठ गया ! एक एक कर के हमारे साथ कलकत्ता के लिए उड़ने वाले लोग आ रहे थे और अपने अपने नियत स्थान पर विराज रहे थे ! कितना अनोखा और नित नवीन नज़ारा होता है वो ....मैं तो हमेशा पूरी यात्रा का बस वो समय ही जीता हूँ जब मैं अपनी सीट पर बैठ कर आने वाले सब लोगो को देखता हूँ ....सच में अनोखा अनुभव होता है ! विभिन्नं प्रकार के पोषकों में , विभिन्न तरह के केश सवारे हुए , हर एक के चहरे पर अलग अलग तरह की भावनाए और गरिमा का मिश्रित तेज़ ....होता है ... वायुयान में सफ़र करना कम से कम भारत में तो अभी 2012 तक का सबसे महंगा सार्वजनिक सफ़र है ....इस लिए भी ...किन्तु जब आगंतुक दरवाज़े पर आ कर देखता है की उस से पहले से कई लोग वहां बैठे हैं तो वो नवीनता
और अपने को विशेष स्तर का समझने का भाव गुल होजाता है और चहरे पर कुछ मिश्रित भाव निर्मित होते हैं !!

            में अपनी सीट आर बैठ कर सब को देख रहा था की अचानक मुझे लगा की ये चेहरा मैंने पहले भी कभी देखा है .....मैं सोच में पड़ गया .....एक साधारण सी महिला ...सफ़ेद बालों की लम्बी चोटी बनाये हुए , माथे पर चन्दन का तिलक , हाथ में सोने का कंगन , और दुसरे हाथ में सुनहरी घडी , मुह में पान .... खाते हुए धीरे धीरे मेरी और बढ़ी ...और मेरे से अगली सीट पर बैठ गयीं ....उनके हाथ में एक पर्स भी था ...क्रीम रंग का ! उनके साथ एक और युवती थीं !
             मैं इस उधेड़बुन में लग गया की इनको कहाँ देखा है और मुझे वो याद क्यों नहीं आ रहा ...की अचानक याद आया ...मैंने अपने साथी से कहा ...ये मशहूर शाश्त्रीय गाइका श्रध्ये गिरिजा देवी जी हैं और में उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ ...! मैं अपने को रोक नहीं सक रहा था ! मैंने उनके साथ की युवती से आखिरकार पूछ ही लिया ...ये वो ही हैं ना ? उन्होंने मुस्कुराते हुए हां में अपना सर हिला दिया ....बस फिर क्या था ....मैंने  गिरिजा जी के चरण स्पर्श किये और आग्रह किया की उनके साथ एक चित्र लेना चाहता हूँ ....उन्होंने अनुमति दे दी ...और मैं उनके चरणों में बैठ गया ...और उस युवती से ही चित्र लेने को कहा ...और बस हो गया !! वो चित्र आपके लिए संलंग्न है इस ब्लॉग के साथ !! गिरिजा जी के विषये में बहुत सी जानकारियां नेट पर उपलब्ध हैं ! एक लिंक आप के लिए !  Girija Devi - Wikipedia, the free encyclopedia

           फिर वो 2.30 घंटो का सफ़र इतना उर्जा भरा रहा की ...थकान काफूर हो गयी और हैं उत्साहित होते गए ...गिरिजा जी का सानिध्य पा कर ! एक गरिमावान एवं आदरणीयों का साथ अपनों भी सही दिशा की और अग्रसर करता है , जैसे जो कुछ गंधी दे नहीं हो हूँ बास सू बास !! खुशबू रखने वाले का साथ भर हो तो भी आप स्वयं को खुशबू के वातावरण में ही पाते हैं !!

        ये मेरी भावनात्मक उपलब्धि थी !! यात्रा संस्मरण लिखता रहूँगा और यात्राएं करता रहूँगा .......हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !!
                                                                    -- ::  आपका मनीष

Sunday, September 2, 2012

मौन की बूंदों की आवाजें, सन्नाटों का हल्का शोर !

...................................   नमस्कार ......!!

कुछ दिनों के अंतराल के बाद फिर मुखातिब हूँ , नवीनतम के साथ ... ।

मौन की बूंदों की आवाजें,    सन्नाटों का हल्का शोर !


स्वयं से मिलना ऐसा जेसे, नदिया के दो अपने छोर !!

                                                                                      - मनीष