Sunday, October 7, 2012

...रेडियो पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है, सुन कर देखिएगा, अच्छा लगता है !!

                आज बहुत दिनों के बाद एक कहानी सुनी ...जी हाँ ठीक पढ़ा अपने " सुनी " पढ़ी नहीं !! 

               अब देखिये ना आजकल के इन्टरनेट के ज़माने में हम सब कुछ पढ़ लेते हैं ...सब कुछ , कुछ भी नहीं छूटता ; कोई पर्दा नहीं हाँ वोही पर्दा टाट का ,जो कभी इंटर में पढ़ी एक मिर्जा साहब के दरवाजे पर पड़ा होता था ...सब इज्ज़त को घर की चौखट के भीतर समेटे हुए .... और वो भी पर्दा जिसके होने पर सब है जिसके ना होने का ग़म उस से पूछिए जिसके पास अदद चौखट भी नसीब नहीं , और वो पर्दा भी जो कभी कभी कुछ लोगो की अक्ल पर पड़ जाता है तो मुश्किल होती है पर्देवालों के लिए !!
               खैर ,हम कहानी के सुननाने और सुनने की चर्चा कर रहे थे ...आइये उसी विषय पर ही सफ़र करते हैं ...कहाँ परदे वालों के बीच फंस  गए ....हमारे आप के बीच क्या पर्दा , सब अपना और जाना पहचाना है !!
             मेरे घर का टेलिविज़न अचानक ख़राब हो गया है ! हम अक्सर घर में शाम की चाय के  साथ में और मेरी प्यारी सी पत्नी " रीना " टेलिविज़न पर हो रही किसी देश से जुड़े दिन के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा को देखते हुए पीते हैं !! आजकल मेरी अर्धांगिनी ओने मायके में हैं ....तो शाम की चाय कुछ फीकी लगती है और उसका फीकापन कुछ तब से और बढ़ गया है जब से वो कुछ दिनों के लिए अपने मायके में है ...जबतक वो वापस आये उसकी यादों के सहारे ही चाय पीता था की टी वी भी खराब हो गया !! फिर एक सहारा मिला ...इन्टरनेट का ...फेसबुक का , ब्लॉग का , जीमेल का , याहू का , ऑनलाइन अखबारों का ....ये सब आँख गडा कर देखना होता है !! कब तक एक टक 14 इंच के लेपटोप पर मन बहलाते रहेंगे ....अब टी वी की बात कुछ और है ....वहां तो द्रश्य बदलते रहते हैं ...और यहाँ खुद तय करना होता की क्या देखना है !! कुछ  देर में मन ऊब गया ! फिर ध्यान गया अपने घर के कोने में रखे एक ऍफ़ एम् , रेडिओ , सी दी , केसेट प्लेअर पर ....रीना जब अक्सर घर में उसी को चला कर पुराने , नए गानों को सुनते हुए अपना घर का सब काम निबटती है .... उसे साफ़ सफाई खूब पसंद है और में उसके उलट ... ! सोफे के कपडे को करीने से सजा कर जाती है और में उस पर बैठ कर उसको बेतरतीब कर देता  हूँ ....! वो फिर ठीक करती है !
                     आज मैंने भी उस ऍफ़ एम् रेडियो की ओर अपना  बढाया और उस पर रखे कपडे हो हटा कर चला दिया ....थोडा वक़्त लगा किसी चेनल को  सर्च करने में ...फिर एक गाना सुनाई दिया ..." आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ इक इसे गगन के तले  " ये तो बस मेरे मन की बात हो गयी ...मुझे कुछ अच्छा सा सुंनं था और ये गाना सुनाई दिया जैसे मुझे सही में उस दिशा की ओर ले जा रहा था जहाँ की सब सूनापन और खालीपन काफूर हो जाये ! दर असल ये एक कहानी का हिस्स्सा था जो उस चेनल पर सिलसिलेवार सुने जा रही थी .... !!
                 याद शहर के नाम से एक शहर काल्पनिक जगह के इर्दगिर्द उद्घोषक रोज़ एक कहानी सुनाता है और उसको सिलसिलेवार क्रमशः रखने के लिए हर विराम पर उस विराम की भावनाओं से जुड़ता हुआ कोई गाना सुनाता है ....वो ही था ....!!
            अब तो घर पर नया टी वी भी आ गया है किन्तु मैं अब भी उस दिन के बाद से कोशिश करता हूँ की 9 बजे से 10 बजे के बीच उस चेनल को सुनु और कहानी सुनु ....नानी और दादी से तो स्वयं कोई कहानी सुनी नहीं ....हाँ ये सुना है की नानी और दादियाँ कहियां सुनती हैं .... !! अब तक जो भी कहानी सुनी सब उत्तम हैं !! हर कहानी के साथ हम जुड़ते चले जाते हैं ...और कभी कभी तो उद्घोषक के स्वर के उतार चढ़ाव, बोली में मिठास से एसा लगता है की सब कुछ अपने ही साथ गुजरा बीता हो ...अपने ही जीवन की बात हो ....अब देखिये ना सबसे पहली कहानी जो सुनी उसका नाम थे ...." भगत जी " ....एक ऐसे इंसान की कहानी जिसके जीवन में शादी के 30 सालों के बाद भी औलाद का सुख नहीं था ....बाढ़ में सब ख़तम हो गया था ...गाँव के ही प्राथमिक स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे , और शाम को घर के पास के मंदिर में देवी देवताओं की सेवा करते थे ...रिश्ते नातेदार थे तो 30  सालों से कोई  आया नहीं उनकी सुध लेने ...वो सब गाँव के घरों में जा जा कर उनके काम में बिना मांगे मदद करते थे ...और दिन बिता लेते थे ..जब एक दिन उनको पता चला की उनके भतीजे की शादी उनके ही गाँव के एक बड़े सेठ के घर तय हुई तो ये सोच कर शायद उनको बुलावा आएगा उन्होंने उधार ले कर नए कपडे , चाही के लिए साडी और जुटे खरीद ली ...पर कोई बुलावा नहीं आया ....मन मार कर घर में बैठे थे की उनको एक तरकीब सूझी ....उठे बाज़ार गए कुछ मिठाई लाये और अपनी पतनी संग मिठाई खाते हुए बोले ...पतनी जी ..कोई बुलाये ना बुलाये हम अपने घर पर तो अपने भतीजे की शादी की ख़ुशी मना  ही सकते हैं ....! सही है ...दुखी और खुश होना अपने ही हाथ में हैं !! गरीबी रिश्तो की मजबूती और अमीरी उनके ढीलेपन को परखती है !!
               दूसरी कहानी थी एक इसी लड़की की जिसने अपने परिवार के खिलाफ प्रेम विवाह किया था ....जिसको 10 साल हो गए थे ...मायके की याद आती थी ...अब उसकी बेटी भी   ननिहाल क्या होता है  पूछती थी और वो निरुत्तर हो कर रह जाती थी ! एक दिन एक पोस्ट कार्ड आया ..उसके नाम उसकी माँ का ...लिखा था ...तुझे कभी हमारी याद नहीं आती ....एक बार मिलने की कोशिश तो की होती !! ...कल तेरे पिताजी शहर आ रहे हैं !! बस इतना पढना था की वो सोचने लगी की क्या करून घर को कैसे ठीक करून की पिताजी को अच्छा लगे ...घर के खर्चे की लिए बचे 
पैसों में सिर्फ 300 रूपये बचे और बेटी के जुटे लेने थे और 5 दिन बाकी थे ....इस  उधेड़बुन में थे की शाम हुई और पिताजी नहीं आये ...बेटी का जो मन उसने मारा था उसको जुटे नहीं दिला कर ..
उसको जुटे दिलानी चल पड़ी ..क्यों की उसके पिता ने अपने परिवार को चुना था और उसको भुला दिया था ...तो आज की घटना की बाद उसने भी ठान लिए की मैं भी अपने परिवार पर ध्यान दूंगी ...ये ही मेरा परिवार है !!

           बस इस तरह से और भी दिल को छु लेनें वाली ना जाने कितनी कहानियां , जिसमे अपने  जीवन की सब झलक दिखाई देती हैं ... नेट पर काम करते हुए ये कहानी सुनता रहता हूँ ...साथ साथ में चलते गानों को भी सुनते रहता हूँ !   आजकल कहाँ समय है किसी के पास किसी की बात सुनने का ...पर जब बात कुछ ऐसी हो जो अपनी ही हो और अपने ही तरफ से कही जा रही हो तो ...ज़रूर सुनने की इक्षा होती है ...आनंद तब और बढ़ जाता है जब आप डूब जाते हैं ...शब्दों और भाव में ...
जिसका पता तब चलता है जब किसी कह जा रही बात से आप के मन के भाव आपके नयन के प्याले भर देते हैं किन्तु उनको छलकने नहीं दते ...और गला भर आता है ...और आपके  से मुह से कुछ नहीं निकलता !! स्वयं से जुड़ना कठिन है किन्तु नामुमकिन नहीं ... सहारा कहानी सुनने का लिया जा सकता है !! आगे की कहानियां अपनी पत्नी के साथ सुनूंगा जल्दी ही !!

       रेडियो  पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है ,  सुन कर देखिएगा ...अच्छा लगता है !!  

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