Wednesday, October 17, 2012

.. स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें, खुद की तलाश के लिए !!

                   अनमने मन से उठा और बाहर की तरफ देखा छोटे से परदे को बड़ी सी खिड़की से हटा कर ....तो खुला सा समुन्दर अपने पूरे जोश में सब को संभावनाएं बाँट रहा था , रोज़ की तरह ...लेकिन मेरे होटल के किनारे एक छोटी सी दूकान पर उस नन्ही सी जान के लिए कुछ भी नया नहीं था आज ....  उसके लिए बस एक दिन था जिसमे दिन में गर्मी रहती है और शाम को हल्का अँधेरा और शाम को खाना मिला मिला ना मिला लेकिन खुले आसमान की चादर और ठंडी धरती का बिस्तर ज़रूर नसीब में था !!

                बात उन दिनों की है जब हमने नया नया उड़ना / घूमना सीखा था और शहर शहर घूम रहे थे , अधिकारिक यात्रा पर !!  उत्तर के शहर इतने करीब से देखें हैं की कुछ गूढ़ नहीं दीखता ..किन्तु वहीँ दक्षिण के शहर कभी देखे नहीं तो वहां की गलियां तक विशेष लगती हैं ! पोंडिचेरी की गलियों की सैर कर रहे थे अकेले ....पैदल !!  हाथ में डाभ ( कच्चा नारियल , पानी से भरा हुआ ) ले कर , गटकते हुए !! गवर्नर के बंगले से होते हुए जैसे ही गाँधी जी के पुतले की ओर बढ़ते हैं तो कुछ दूरी पर एक रेत से भरा हुआ रास्ता मिलता है  बिलकुल एसा लगता है जैसे की वहां की सरकारी आँखें इस टूकडे को देख नहीं सकीं नहीं तो इसको भी पुरे प्रयास से पथरीला कर देतीं या फिर ये भी लगता है की शायद इस को इस लिए उसके मूल स्वरूप में छोड़ा गया हो की आने वाले लोगों की कुछ सामीप्य लगे ...अपनी ज़मीन से इन पथरीले रास्तों में !!
              उसी रेतीली ज़मीन पर सुबह और शाम को छोटा सा बाज़ार लगता है , अपने शहर और आगंतुकों दोनों के लिए !! वहां दक्षिण के पारंपरिक पकवान के सिवा ,,,उत्तर भारत के भी पकवान मिलते हैं ....जैसे आलू की टिक्की , गोलगप्पे किन्तु उनमे आपको दक्षिण की खुशबू ज़रूर मिलेगी ताकि आपको स्मरण रहे की आप मूल स्थान से हट कर आनंदित हो रहे हैं !!
             चाय भी मिलती है !! मुरुगन उसी चाय की दूकान पर रहता था ! मेरा रोज़ का साथी ! आज कुछ उदास था , चाय भी कुछ फीकी बनी थी ....न चीनी तो उतने ही चम्मच डाली थी ज़रूरी पानी में बस स्वाद आया ही नहीं !! चाय की छन्नी में रखे बारीक कपडे के ऊपर पूरी की पूरी चाय उधेल दी थी उसने कुछ बहार छलक कर उसके हाथ पर आ गिरी तो उसे ख़याल आया की कुछ गलत जो रहा है !!... मैंने पुछा " क्या बात है मनु ? " कुछ नहीं साब .. ठेठ दक्षिण भारतीय हिंदी में जवाब मिला !! कुछ तो है बोल तो मन हल्का होगा ......मैंने इतना कहते हुए उसके कंधे पर अपना उल्टा हाथ रख दिया और कोशिश करी की उसके सर को सहारा दूं .....एसा लगा जैसे उसको कुछ मिल गया हो जैसे मृग मरीचिका .... वो मेरे कंधे और छाती से लगभग चिपक कर रोने लगा ..... ये कहते हुए ...." कोई अपना नहीं है साब ....देख लिया मैंने " !! मैंने उसको अपने दुसरे हाथ से सहारा दिया और उठने के लिए कहा ....और हम चल दिये महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास ....समुद्र में सम्भावनाये समेटने !!
              वो दिन आज़ादी का दिन था ...15 अगस्त , कुछ बच्चे छोटे छोटे तिरंगे बेच रहे थे ,,,,मैंने मुरुगन से पुछा लोगे ? हामी में सर हिला दिया उसने !! मैंने कुछ झंडे खरीदे ! मुरुगन से पुछा अब बताओ क्या बात हैं क्यों उदास हो ? वो बोला " साब में पढना चाहता हूँ पर मुझे स्कूल में एड्मिसन नहीं मिला ...और कोरास्पोंदेंस - पत्राचार की पढ़ाई के लिए एक मुश्त पैसे हैं नहीं मेरे पास ...और इस चाय की दूकान पर काम करते करते अगर पढ़ना चाहूं तो मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती की मैं समय पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूंगा !! .... अच्छा तो तुमने कोई हल तो ढूँढा होगा इस समस्या का ...? मैंने पुछा ! वो बोला हाँ साब ...अगर मुझे कहीं स 2500 रूपये मिल जाएँ तो मैं एक मुश्त फीस भर कर अपनी पढ़ाई जारी रखूंगा और धीरे धीरे पैसे भी चुकता कर दूंगा काम करके ...लेकिन कोई देता नहीं ना ...सब जान पहचान की बात करते हैं की कोई गारंटी दे दे ...जब की मैं इसी शहर का हूँ ...सब मुझे जानते हैं ....मेरे पिताजी और माता जी जब तक सुनामी में नहीं गुजरे थे सब मुझे पहचानते थे अब मेरे पास कुछ नहीं ...तो ये लोग भी नहीं पहचानते ....!!  अच्छा तो तुम इस लिए परेशान हो मैंने मुरुगन की टीशर्ट का कालर ठीक करते हुए कहा ? चलो मूंगफली खाते हैं ....!!  दक्षिण भारत में मूंगफलियाँ सडक पर मिलती हैं ! हा हा हा ....भाई ये तो कोई बाद ना हुई ...मूंगफलियाँ उत्तर भारत के शहरों में भी सड़कों पर मिलती हैं और लोग तो इसको " गरीबों का मेवा " कहते हैं !! खैर दक्षिण में मूंगफलियों को पानी में उबाल कर सडकों पर बेचा जाता है ....मैंने और मुरुगन ने कुछ मूंगफलियाँ खरीदीं और समुद्र की तरफ मुह कर के दीवार पर बैठ गए !!
                 अब मुरुगन के चहरे पर मुस्कान थे ....उमीदों भरी ...पर मैं अब उलझन में था !! मुझे नहीं याद की मैंने उस की क्या मदद करी थी किन्तु इस बात को सोच कर उलझ गया था की .... क्या विचित्र सी बात है की स्वयं के  शहर में व्यक्ति परिचय ढूँढने को बाध्य हो जाता है और अपरिचित शहर में कैसे परिचित होने की सम्भावनाये जन्म लेती हैं !! मुरुगन मुझे मिलता है विभिन्न रूपों में आज भी सपनों में और यदाकदा उन्ही गलियों में मिटटी के दिए बेचते हुए , सुगन्धित अगरबत्ती बेचते हुए , सुन्दर से मुरझा जाने वाली मालाएं बेचते हुए ...अपने ही लोगो के बीच अपरिचित सा ...बस उसी समय जब वो स्वयं के बारे में सोचता है ....अन्यथा सब के समीप है ...सबका अपना है वो , चाय की मीठास रूंधे हुए गले के कसैलेपन को कम नहीं कर सकती !!
                हमें , स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें और उनमे खुद को तलाशना चाहिए ...तब जब आपको परिचय की दरकार ना हो ....ताकि जब आप अजनबियों के बीच हों तो कम से कम स्वयं को तो स्वयं का परिचय ना देना पड़े !!  मुरुगन आज बारहवीं कर चुका है , स्वयं को स्थापित कर रहा है और मुरुगनो से परिचित होने के लिए !!!  ये तो सफ़र है , चलता ही रहेगा कभी आपसे मुआकात हो तो कृपया पहचान लीजियेगा , बिना परिचय दिए श्रीमान !! 

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