Thursday, October 4, 2012

...... और जंतर-मंतर मर गया !!

                              ....मित्रों मैं जिस रास्ते से अपने दफ्तर जाता और आता हूँ आज भी उस पर कुछ खेत मिलते हैं ... जिनमे मौसमों के आधार पर कुछ न कुछ फसल लगी रहती है .....आज कल धान लगी है , सुर्ख हरे रंगों की घान की ऊपर की और उठती एक एक पौध और उसमे अंगडाई लेती हलके पीले रंगों की बालियाँ ....जी हैं अभी बाद बनना ही शुरू हुआ है ...शाम के लगभग पौने सात बजे में उन खेतों के बीच से हो कर गुजरती हुई सड़क से गुजरता हूँ ...बस सुगन्धित बालियों से निकली हुई खुशबू मेरी नासिका को इस कदर अपनी और आकर्षित कर लेती है की बस कभी कभी तो रुक कर उस का आनंद लेता हूँ ! मुझे मालूम है की खुच महीनो के बाद से सब ख़तम हो जायेगा , बालियाँ पाक जाएंगी और खेत सूने हो जाएँगे ,,,,तेज़ लू चलेगी और सुखी धुल उड़ेगी , लेकिनं ये भी आशा है की फिर से इसमें धान लगे जाएगी इस लिए आज के होने और कल न होकर फिर से होने के मध्य का काल इतना दुःख नहीं देता जितना आज एक खबर ने दिया !!

            आइये उस खबर पर चर्चा करते हैं !! वैसे तो अखबार के माध्यम से किसी खबर पर चर्चा करना कितना उचित और न्यायसंगत है ये आपने कुछ दिनों पूर्व एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक प्रगतिशील संगठन के मध्य होते विवाद को देख और सुन लिया ही होगा !! फिर भी हम ये हिम्मत करेंगे की उस खबर के आधार पर चर्चा करैं और दुःख प्रकट करैं जो हमने आज पढ़ी , और साथ में जा कर उस खबर का सच भी जाना ...जो अक्षर अक्षर सच निकला ....!!
           एक अखबार में पढ़ा की दिल्ली के जंतर मंतर को वो दर्जा देने से मना कर दिया गया है जिसका वो हक़दार है !! अन्तराष्ट्रीय धरोहर का !! क्यों की उस अन्तराष्ट्रीय संस्था ने पाया की जिस विशेषता के लिए जंतर मंतर जान और पहचाना जाता है ....मौके पर उसको वैसा नहीं पाया जा सका , अतः अन्तराष्ट्रीय धरोहर नहीं कहा जा सकता !!  एक बात साफ़ कर दें की जंतर मंतर में स्वयं एसा कुछ नहीं हुआ की उसकी पहचान कम हो गयी है .... उस को जबरदस्ती ...धीरे धीरे मारा गया !! आज जंतर मंतर उस फूल की तरह हो गया है जो खिला हुआ है ...जिसमे चटक रंग भी है ...जिसमे मकरंद भी है ...परागकण भी हैं ....किन्तु उसको एक शीशे के घर में क़ैद कर दिया है जिस पर कभी तितलियाँ नहीं बैठ सकती , जिस पर कभी परागकण ले कर मधुमखियाँ अपनी मिठास की गगरी में उसका योगदान नहीं ले सकती !!
           हुआ क्या ? जैसा की हम सब जानते हैं की जंतर मंतर एक यन्त्र है जो की सूरज की किरणों के आधार पर करता है ...और गड्नाओं के आधार पर समय का पता लगाया जाता है ! भारतीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों !! सतरहवी शताब्दी में इस का निर्माण करवाया गया था जब घड़ियाँ नहीं थी !! सूरज की किरणों के आधार पर सटीक समय की गद्नाये की जाती थी !! आज इस के यंत्रों के ऊपर सूरज की किरणे ही नहीं पहुच पाती ....चारो और ऊँची ऊँची इमारतें कड़ी हो गयी है ....जिसके करने जंतर मंतर में प्राण तो हैं किन्तु वो स्वयं संवादहीन हो गया है !!
           बचपन से सुनते आ रहे हैं ...दिल्ली में एक जंतर मंतर है ! कई बार वहां गए भी ! आनंद लिया ...उस इमारत का जिसको कितने मन से बनवाया गया है !! आज उसका गला घोट दिया गया ! कितने ही आन्दोलनों की जन्स्थाली आज स्वयं निर्जीव सी हो कर पड़ी है !! कितने ही आन्दोलनों को जीवित रखने वाला जंतर मंतर आज स्वयं मरित्श्य्या पर है !! कितने की आन्दोलनकारियों की आवाज बन्ने वाला जंतर मंतर स्वयं अपने लिए एक आवाज खोज रहा है !! 1982 के एशियाड खेलों का शुभंकर रह चूका ये ...आज अपने अशुभ समय को कोस रहा है !! आज भी कितने आन्दोलन हो रहे हैं इसकी दीवारों के इर्दगिर्द ! कितने लोगो का घर बन चुकी इस की दीवारें अपने लिए एक अदद सहर ढूंढ रही है जो इसकी आवाज़ बन कर कुछ कहे सरकार से की कुछ करिए ...मैं ही था जब समय घड़ियों में बही था ...! एसा लगता है सच में समय आगे निकल गया है ...तेज़ रफ़्तार से चली ज़िन्दगी में कहीं पीछे छूट गया है ...हमारा जंतर मंतर ....लिकिन है तो !! नै पीढ़ी जिसको इसके मायने नहीं पता ...क्या सोचेंगे इस ईमारत के बारे में ....क्या बनाया था लोगो ने टेढ़ा मेधा ...दीवंरें पूरी भी नहीं बनवाइय ....!! उनको कुछ दिशा देने वाले दिशानिर्देश क्या उम्मीद तब तक वहां रहेंगे भी की नहीं !!!!

               विदेशों में सुनते हैं की पूरी की पूरी इमारत को एक स्थान से दुसरे स्थान पर विस्थापित कर दिया जाता है !! हमरे नेता और नौकरशाह तो पूरी दुनिया में घुमते हैं ....शायद किसी को ये तरकीब सूझे जंतर मंतर के बाबत , ऐसी हैं उम्मीद करते है !!  दिल्ली के जंतर मंतर सरीखा के और जंतर मंतर है ...जयपुर में ....मैंने देखा है ...हवामहल से साफ़ साफ़ दिखाई देता है ! जी हैं अभी उसके चारो और सब साफ़ है ! ऊँची दीवारें नहीं बनी !! किसने कहा की इमारतें ऊँची हों तो ही तरक्की होती है !! एक बड़े देश की सबसे ऊँची इमारतो को गिरते देखा है हमने ,  दुनिया का सबसे विक्सित देश है ...फिर भी इमारतें गिर गयी !! धरोहर सम्हालानी चाहिए !! हमें कुछ तो मिला है पूर्वजों से , कुछ नया अपनी आने वाली पीढ़ी को दे नहीं सकते तो पाया हुआ ही संभाल कर हस्तांतरित कर दिया जाये !! 
                  अपनी विशेष पहचान और मनमोहक कलाकृति के कारण हमेशा याद किया जाता रहेगा ...किन्तु आज भी उसमे वो सब है जिसके लिए वो जाना जाता है ...बस उस तक सूरज की किरणों के  आने का इन्तेजाम करना होगा , वैसे ही जैसे हम अपने घरों में आगंतुक के लिए द्वार खोल देते हैं ....और अपनी निगाहें  द्वार पर लगा कर टकटकी कगाये उसके आने का इंतज़ार करते हैं ....आज जंतर मंतर उसी इंतज़ार में हैं ....
और सूरज की किरणे उस से दूर हो चली हैं ...बहुत दूर व्यापारिक संस्थाओं की इमारतों के पीछे ...जहाँ व्यापार
आ जाता है वहां अपनापन ...........मर ही जाता है ........ और जंतर - मंतर मर गया !!
                                                                                                                 आपका अपना - मनीष

आपकी सुविधा के लिए उस अखबार का लिंक दे रहा हूँ ....  



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