Saturday, March 29, 2014

संस्मरणों कि पंक्तियाँ !!

गमछे से,
कोहनियों तक,
पोछता पसीना,
मूर्तिकार,
दिन भर, रात भर,
मूर्तियाँ बनाते हुए !

पूजा पंडालों में,
कल भगवान् ,
हो जाएंगी !
दूर हो जाएँगी,
दर्शनाथियों कि,
लम्बी पंक्तियों कि सी !

जैसे ,
दूर हो जाते हैं,
रात भर ,
दिन भर,
पाले पोसे,
मासूम चहरे,
हमारे घरों से !

फिर ,
बंध  जाती हैं,
संस्मरणों कि पंक्तियाँ,
आँखों से ,
पिघलती हुई !

Wednesday, March 26, 2014

एक कहानी : " टॉयट्रेन "

        " स्कूल के प्रिंसिपल सर ने सुबह कि प्रार्थना के  ख़तम होने के बाद घोषणा करी के अगले हफ्ते सिलीगुड़ी के कान्वेंट स्कूल के 12th क्लास के दस बच्चों कि टीम हमारे स्कूल के बच्चों के साथ २ दिन के जॉइंट टूर पर चलेंगे !"आप सभी बारहवीं के बच्चे मुझ से असेंबली के बाद  ऑफिस में मिलिए !
         १४ से १६ साल के बच्चों को उड़ने को बड़ा आकाश मिलने को था ! नए साथियों के साथ , नयी उमीदों के साथ !
         जैसे पतझड़ के बाद आयी नयी कोपलों को ओस कि बूंदों के स्पर्श से बनते संबंधों और भविष्य कि आशाओं को मूर्त रूप दे लेने के मौके मिलने को हों और रास्ता सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के  बीच दौड़ती टॉय ट्रेन कि उस कोच से जाता हो जो रिज़र्व किया गया था, इस यात्रा के लिए !
        " आतिश "  से  बिजॉय दादा ने अपने पुराने विजय सुपर स्कूटर को  सुबह ७:३० बजे सिलीगुड़ी स्टेशन कि  पार्किंग में खड़ा  कर के इग्निशन स्विच को ऑफ करते हुए पुछा :

कहाँ खोये हो बंधू ?

         आतिश तो जैसे बड़े से लस्सी कि ग्लास में तैरते मक्खन कि तरह दिन भर में मिलने वाले नए साथीयों के साथ कि सम्भावित गरमाहट से पिघलता जाता था और बिजॉय दादा कि आवाज़ उसे ऐसी लगती थी जैसे ठंडक देते बर्फ़ के टुकड़े !

बिजॉय दा : कि रे , भालो तो ? ( क्या , ठीक तो हो ? ).

आतिश के कंधों को छूते हुए बिजॉय दा ने पुछा ! आतिश मलमली घांस से जैसे खुरदरी सड़क पर नंगे पैर अचानक आ गया हो और बोला :

हाँ दादा , क्या हुआ ?

बिजॉय दा ने मुस्कुराते हुए आतिश को कहा कुछ नहीं चल तेरे कान्वेंट स्कूल के साथी अपनी स्कूल बस से आ गए है , देख तुझे किसका साथ मिलता है !

आतिश वेटिंग रूम कि तरफ बढ़ गया जहाँ प्रिंसिपल और स्कूल के दूसरे लड़के पहले से इकठ्ठा थे !

कान्वेंट स्कूल के बच्चों में लडके और लड़कियां दोनों थे , स्कूल ड्रेस में !

दिसंबर कि सर्द सुबह ! कोहरे से जूझती सूरज कि किरणें !

      बीच बीच में सर्द हवाएँ किशोर किशोरियों के खुश्क होते चेहरों को और खुश्की दे जाती थीं तो कोई मफ़लर कस लेता था तो किसी कि हथेलियाँ स्वेटर कि जेबों में और गेहरी जा कर कस जाती थी !

हैलो , तुम्हारे पास वैसलीन है ? विभूती ने आतिश से पुछा !

विभूति कॉन्वेंट स्कूल के एक लड़की !

आतिश : हाँ, ये लो लेकिन यूज़ करी हुई है , तुम अपनी उंगली पर ले लो  ! वैसलीन कि ट्यूब विभूति कि तरफ़ बढ़ाते हुए बोला !

विभूति : तो क्या हुआ ? लाओ दो ! केहते हुए विभूति ने बिना झिझक ट्यूब अपने होठों पर फेर ली !

आतिश के लिए ये लम्हा अनोखा था ! जिसमे विश्वास  एवं  अपनत्व था ,साथ में था अधिकार का उदघोष ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था ! सरकारी स्कूल के  संस्कारों कि धूप से बनती परछाइयों के सिमटने कि घडी थी ये , नए साथीयों के सानिध्य एवं सम्भावित सम्बन्धों के फैलते प्रकाश में !

        चलिए भाई ट्रेन के आने में देर है नाश्ता कर लेते हैं ! कौशल भाई जो हॉस्पिटालिटी के लिए जिम्मेद्दार है ने ,दोनों तरफ के बच्चों को आवाज़ लगायी !

        गरमागरम पकौड़ियों और चाय कि चुस्कियों के साथ किशोर किशोरियों के ठहाके और विचित्र से सामीप्य कि मर्यादित कोशिश में सब ने नाश्ता ख़तम किया !

सब ने अपने अपने साथी चुन लिए थे , आगे के सफ़र के लिए !

यहाँ आ जाओ आतिश , विभूति ने अपने बगल कि सीट पर उसे लगभग खींच लिया !

       ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरकने लगी थी ! दूर पहाड़ों पर उभरता हुआ सूरज अपनी किरणो से नई कोपलों को स्पर्श करता था तो दोनों स्कूल के प्रिंसिपल अपने साथियों के साथ सजग थे ! किशोरों के साथ एडुकेशनल टूर जो था , तमाम सम्भावनाएं लिए !

           छुक छुक करती ट्रेन करीब कि मार्किट से गुजर रही थे  ! बीच बीच में तामाम चीज़ों के बेचने वाले चढ़े और उतरे ! स्टेशन आते जाते रहे ! आतिश और विभूति खो गए थे !

बारिश कि फुहारों से ट्रेन कि रफ़्तार से तेज़ दौड़ते मन को विराम मिला !

आतिश : इस टूर से क्या हासिल होगा हमें ?

विभूति : मुझे तुम जैसा नया दोस्त हासिल हुआ !

आतिश ने हलके से मुस्कुराते हुए अपनी निगाहें नीचे लगभग सूख चुकी नदी कि तरफ कर ली !

विभूति : फ्यूचर का क्या प्लान है तुम्हारा करियर का ?

आतिश : तुम बताओ !

विभूति : 12th के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला ! 3rd इयर में कैम्पस सिलेक्शन फिर पॉकेट और स्टडी के लिए कमाऊंगी और आय ए एस कि तय्यारी करुँगी , और फिर शादी वादी !

      बड़ी सहजता से बोल  गयी विभूति ! जैसे कलकल करता पानी रस्ते में पड़ने वाले सभी पेड़ पौधों को सींचता जाता है , आतिश कितने दिनों बाद आज तर हुआ था किसी कि मन कि बात में अपने को पा कर !

विभूति ने कुछ देर रुक कर पुछा : अब तुम बताओ !

      आतिश अभी कुछ बोल पाता कि ट्ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई ! विभूति ने अपना चश्मा उतारते हुए आतिश कि तरफ देखा और मुस्कुरा दी फिर अपने गले के मफलर से चश्मे के शीशे साफ़ करने लगी ! मफलर कंधे से कुछ ज़यादा नीचे सरक गया था  !  आतिश सम्भलते हुए अपनी निगाहें एक तरफ कर ली , अनदेखा करते हुए वो पल !

चाय चलेगी दोस्तों ? कौशल भाई ने पुकारा !

हाँ , सब के सब एक सुर में बोले !

प्रिंसिपल सर : अभी तक हमने आधा रास्ता तय कर लिया है , यहाँ से ट्रेन कुछ दूर पीछे चलेगी और फिर आगे ये एक अनोखा मोड़ है इस रस्ते का !

     आतिश और विभूति एक दूसरे को देखते हुए सोच रहे थे ! कहाँ अभी आधा रास्ता तय हुआ ! ठीक से पहचान भी नहीं हुई अभी तो ! दोंनो अपने इस सफ़र में एक नए सफ़र कि तलाश में थे !

       ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली थी ! हिचकोले खाती , घुमावदार रास्तों पर कन्धों से कंधे टकराती मस्ती करती टॉय ट्रेन दार्जीलिंग कि तरफ बढ़ रही थी कि सब के हाथो में कुल्हड़ में गरमा गरम चाय आ गयी साथ में गरमा गरमा समोसे अभी - अभी गुजरे " घूम स्टेशन " से दो लड़कों ने ये व्य्वस्था करी थी !

विभूति और आतिश ने अपनी सीट के बीच के हिस्से में समोसों कि प्लेट रखी और बतियाने लगे !

आतिश : तुम मेरे फ्यूचर प्लान के बारे में पूछ रही थी न ? वैसे मैंने अभी ज़यादा कुछ सोचा नहीं है ! बस अच्छे परसेंटेज से 12th पास हो जाये तो फिर दादा आय टी आय में दाखला दिलवाने कि बोल रहे थे ! तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिए ?

विभूति : तुम्हारे स्कूल में करियर गाइडेंस नहीं देते ?

आतिश : ये क्या होता है ?

विभूति ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ आतिश कि तरफ देखा !

      गाढ़े गेहुंए रंग के आतिश के चहरे पर हलके हलके उभार लेती रोओं कि कतारें , सख्त होने को थीं  ! ऊपरी होठो पर घने होते मूछों के बाल हलके हरे रंग कि आभा दे रहे थे ! यौवन दस्तक देता था , हर तरफ से ! 

    आतिश ने विभूति को हलके से ज़ोर देर कर पुछा : क्या हुआ बोलती क्यों नहीं ? एकटक क्या देखे जा रही हो ?

विभूति ऐसे में क्या बोलती , कई बार शब्द नहीं मिलते कुछ हालातों को व्यक्त करने के लिए ! किन्तु मन सब समझता है और आसानी से  समझा भी देता है !

आतिश तुम मेरी मानो तो स्पोर्ट्स में अपना करियर बनाओ !

     विभूति ने चुप्पी तोड़ते हुए आतिश से कहा कहा !तुम्हारी सोलिड बॉडी और हाइट सब ठीक ठाक है ,और एक स्पोर्टसमैन मुझे पसंद भी है ! तुम फ़ुटबाल खेलना शुरू करो !  

आतिश : फुटबॉल तो मैं खेलता ही हूँ ! एक बार गिरा तो घुटनो पर चोट लगी , चार टांके लगे थे उसके बाद से नहीं खेला !

ट्रेन अगले स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी !

ये लो , बड़े से पेड़ से एक गुलाबी और चटक लाल रंग एक बड़ा सा फूल ला कर आतिश ने विभूति को दिया !

थैंक यू : विभूति !

आतिश : क्या मुझे इंजीनियरिंग नहीं करनी चाहिए !

आतिश ने अपने मन में दबे हुए प्रश्न को शब्द दिए !

विभूति : क्यों नहीं , लेकिन तुम स्पोर्ट्स में अच्छा कर सकते हो !

आतिश : लेकिन में इंजीनियरिंग में भी अच्छा कर लूँगा !

ओके फिर ठीक है , जो मन करे करो कहती हुए विभूति सीट पर बैठ गयी लगभग रूठते हुए ! पीछे पीछे आतिश भी आ गया और दोनों हाथों से विभूति के कन्धों को सम्भालता हुआ बोला , ठीक है मैं फूटबाल ही खेलूंगा : अब खुश !

विभूति के होठों पर आती मुस्कुराहट के साथ ट्रेन ने लम्बी सीटी लगायी जैसे अपने होने का परिचय देती हो !

      दो अनजान युवा बरसों मन के भीतर सैकड़ों अनछुए विषयों कि जिज्ञासा संजोय कितने समीप आ चुके थे कि एक दूसरे कि मुस्कुराहटों कि चिन्ता होने लगी थी दोनों को , सिर्फ चार घंटों के सफ़र में !

धीरे - धीरे आतिश और विभूति दोस्त थे !

सफ़र बड़ा हो चला था , रस्ते छोटे पड़ेंगे दोनों को एहसास था ! 

     चिनार के पत्तों से झरती बारिश कि बूँदें ट्रेन के शीशे पर हवाओं कि तूलिका से आड़े टेढ़े चित्र उकेरती थीं जिनके अर्थ सिर्फ आतिश और विभूति को पता थे !

         दार्जिलिंग कि सड़कों पर सब अपने अपने प्रोजेक्ट के लिए सामान इकठ्ठा करने में लग गए , ये दोनों भी  ! होटल के कमरों में चेंज कर के सब रेस्टोरेंट में इक्कठा हुए , स्कूल ड्रेस में नहीं , नॉर्मल पहरावे में ! किशोरों के मन और इच्छाओं का वातावरण जिसे प्रिंसिपल सर और दूसरे अधिकारी अपनी पैनी निगाहों से नियंत्रित करते जाते थे फिर भी खुश्बुएं और रोशनी कहाँ बंधती हैं  बंधन में ! 

आज वापस लौटने का दिन है ! 

कहीं उत्साह तो कहीं कुछ समय और साथ रह पाने कि लालसा चहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई देती थी !

ट्रेन के इंजन ने लम्बी सीटी दी !

भाप से पूरा इंजन लगभग छुप सा गया जैसे मन में उफनते कामनाओं के तूफ़ान में वापसी का समय इतनी 

तपिश दे रहा हो कि भविष्य भाप सरीखा उड़ ही जाएगा जो उसे अगर आज न समेटा तो , समय रहते !

        वापसी के सफ़र में भी आतिश और विभूति पास  पास ही रहे ! आते जाते स्टेशन पर उतरते चढ़ते लोगो कि चहल पहल रही ! लोकल मिलने वाले रंग बिरंगे फूलों कि डालियाँ तो कभी नाश्ते के  लिए चाय पकोडों के साथ सर्द हवाओं के झोके !

      एक दो बार आतिश ए सी कम्पार्टमेंट में भी झाँक आता था ! इंग्लिश न्यूज़ पेपर पढते सूटेड बूटेड लोग ! चीनी मिटटी के कप में चाय और नाश्ता !  देख कर सोच लेता मैं भी ये सब करूंगा ठीक से पढ़ लिख कर !

      चलो बस में बैठो बच्चों हमें अभी २० मिनट और चलना है ! अँधेरा होने को था ! सर्दी पल पल बढ़ती जाती थी !

विभूति और आतिश अभी प्लेटफॉर्म पर ही थे !

कॉन्टैक्ट नम्बर दे ले रहे थे ! 

२० - २५  सालों बाद ! 

एक कप चाय तो पिला दो मैडम !

नहीं सुबह से दो कप पी चुके हो अब लंच के बाद मिलेगी ! विभूति ने मेज पर पड़ी प्याली उठाते हुए कहा !

आतिश : ठीक है में थोड़ी देर में आता हूँ !  करुणा और सचिन कहाँ है , सुबह से देखा नहीं दोनों को ?

विभूति : आज स्कूल का एडुकेशनल टूर है , दोनों वहीँ गए हैं रात हो जाएगी ऐसा कहा था प्रिंसिपल ने मुझे !

आतिश : चलो उठो  कहीं चलना है !

विभूति : कहाँ ?

दार्जिलिंग , टॉय ट्रेन से  !

हाँ , वेसलीन साथ रख लेना तुम्हारे होठ सूख जाते हैं : आतिश ने मुस्कुराते हुए कहा !

ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया था !

 आतिश ने अपनी सरकारी गाड़ी के ड्राईवर से शाम को आने का इशारा करते हुए विभूति को ट्रेन में खीच लिया !

आपका टिकट तो ए सी का है , तो आप यहाँ क्यों बैठे हैं ?

विभूति ने आतिश को और आतिश ने विभूति को देखा और मुस्कुरा दिए !

ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई !  टी टी कुछ समझता हुआ आगे बढ़ गया , जैसे आप सब समझ चुके हैं !

                                       ~~~~~~        एक कहानी : " टॉयट्रेन "  ~~~~~~ 
::: ~~ ::: आपका मनीष 


Saturday, March 15, 2014

मैं तो महका, तुम भी महको, हो, अबीर, चन्दन - चन्दन !!

सडकों-सड़कों, जली होलिका,
गलियों-गलियों मिलन मिलन,
आँगन-आँगन ,छलके मटके ,
नुक्कड़-नुक्कड़   रंग - तरंग ! "

इससे दूरी, उससे दूरी,
कब तक  रखें , उलझे मन,
गुझियाँ महकीं, पापड़ चहके,
घोलो रंग - खोलो बंधन !

चुटकी- चुटकी चली सुगंधें,
माथे माथे सजी सजीं ,
सन्नाटों कि रातें गुजरीं,
प्रेम घंटियाँ बजी - बजी !

मैं तो महका, तुम भी महको,
हो , अबीर , चन्दन चन्दन !

सड़कों सड़कों जली होलिका,
गलियों-गलियों मिलन मिलन !
आँगन-आंगन छलके मटके,
नुक्कड़ नुक्क्ड़ , रंग-तरंग ! 

                ~~~~~ :  मनीष सिंह

Wednesday, March 12, 2014

एक कहानी : " छावनी " .

           ऑफिसर्स मेस से जल्दी जल्दी रात का खाना खा कर विक्रम विशेष परमिशन पर  छावनी के बाहर अपने एक और साथी के साथ निकला ही था कि हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी और उन्हें बेग़म पुल के दूसरे छोर पर एक चाय कि दूकान पर रुकना पड़ा !

निशांत वर्मा : चाय लोगे केप्टन ?

विक्रम : मैं रात को चाय नहीं पीता !

निशांत : ये भी कोई स्कूल कि घंटी है जो रात में नहीं बजती , चल आज पी कर देख !

विक्रम : यार कुछ चीज़ों में मुझे जबरदस्ती पसंद नहीं और तू ये जनता है !

निशांत : ठीक है दोस्त , चाय के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाती , सोचा था !

विक्रम स्टूल को अपनी और खीचते हुए चाय वाले से बोला : भैया जी , दो कप अच्छी चाय बनाइये !

चायवाला : अदरक दाल दूं सर ?

विक्रम और निशांत ने एक दूसरे कि तरफ देखते हुए जैसे कुछ याद किया और गले मिले !

चायवाले ने अदरक वाली अच्छी सी चाय बनाई   मिटटी के कुल्हड़ में को सेना के नोजवान अधिकारियों कि तरफ बढ़ा दी !

            छत  पर पड़ी नीले रंग कि तिरपाल बार बार हलकी हवा से उड जाती थी और बारिश कि बूंदे दूकान के भीतर झाँक लेती थी ! कभी विक्रम कि पलकों पर तो कभी निशांत के बाँहों पर !

सड़क पूरी भीग चुकी थी !

बेग़म पुल पर एक किनारे से दूसरे किनारे पर सायकल , रिक्शा , बस , ट्रक और ठेले सब आते जाते थे !

विक्रम और निशांत के लिए नया नहीं था ये सब देखना हाँ समय और उम्र ज़यादा हो गयी थी ये नज़ारा देखे !

विक्रम तूने देखा वो गवर्नेंट कॉलेज के पीछे वाले गेट का नीम का पेड़ कितना घना हो गया है ! : निशांत ने ट्रक कि मैं लाइट से रोशन हुए नीम के पेड़ कि तरफ इशारा करते हुए कहा !

निशांत भाई सब कोलगेट जो करने लगे हैं , हमारे बचपन जैसे दातुन करते तो देखते इतना घना कैसे होता ये ! विक्रम ने चाय कि आखरी घुट लेते हुए जवाब दिया

चल भाई देर होने को आई , परमिट भी ओवर होने वाली है !

दोनों लौट आये छावनी में , अपने अपने कमरों में !

       बारिश रात भर होती रही ! हवाएँ शहर के इस कोने से उस कोने तक तेज़ चाल से टहलती रहीं ! छावनी के कोने कोने पर जवान अपने अधिकारियों कि रक्षा में रात भर पहरा देते रहे !  रात भर बेगम पुल से धीमे , तेज़ हॉर्न कि आवाज़ें आती रहीं ! फिर रोज़ कि तरह ये रात भी बीत गयी जैसे पास कि काली नदी कि गहराइयों में बारिश का पानी समां गया  , अगली बारिश के आने तक !

गुड मॉर्निंग निशांत : विक्रम ने कैम्पस के ग्राउंड में बड़े से झूले पर सर के पसीने को सफ़ेद तौलिये से पोछते हुए कहा !

निशांत : गुड मॉर्निंग दोस्त , कैसी लगी कैंटोनमेंट में पहली रात ?

विक्रम : रात भर सो न सका !

निशांत : क्यों भाई ?

विक्रम : तुम अगर आज फिर मेरे साथ उसी चायवाले भैया के पास चलो तो बताऊंगा !!

निशांत : नॉट ए बिग डील , ठीक है फिर शाम को छेः बजे शार्प मैं गेट पर मिलो !

विक्रम : ओ के !

मेन गेट से कुछ कदम कि दूरी पर के चोराहे से होते हुए बेगम पुल कि तरफ निशांत और विक्रम बढे ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगायी !

साब एक बात पूछूं ? करीब १५ - १६ साल का लड़का हाथों में रजनीगंधा के फूलों के गुलदस्ते लिए खड़ा पूछ रहा था !

सेना कि वर्दी में रौबीले दो अधिकारीयों से एक आम लड़का ऐसे कैसे कुछ पूछ सकता है ! सामान्यतः ऐसा हो होता है ! पुलिस , सेना ही आम आदमी से सवाल करते हैं , पर आज कुछ उल्टा था !

विक्रम ने अपनी चाल कुछ कम करते हुए लडके के पुछा :  तुमने हमसे कुछ कहा ?

लड़का : जी  , मैं आपसे ही कुछ पूछना चाहता हूँ !

निशांत : हाँ बोलो, क्या बात है ?

लड़का पहले आप ज़रा किनारे हो जाइये , यहाँ पुल पर कम जगह है तो इस लिए गाड़ियों से बचना पड़ता है !

निशांत  , विक्रम : तुम जल्दी पूछो क्या काम है हमसे ?

लड़का : साब आप दोनों मेरठ कि ही हैं ना ?

निशांत और विक्रम : हाँ , तो ?

लड़का : साब ये आपके १०० रूपये बाबा बाबा ने दिए थे और कहा था कि अगर कभी आप लोग मिले तो लौटने को !

निशांत , विक्रम ने एक दूसरे को जैसे सवाल करते हुए देखा और बोले : ये क्या है भाई ?

लड़का : साब , अब मैं चलता हूँ !

विक्रम ने थोडा भारी  आवाज़ में लड़के से पुछा : देखो लड़के हम  तुम्हे नहीं जानते और ये कैसे रूपये है हमें नहीं पता लो ये वापस लो और हमें जाने दो !

लड़का : नहीं साब ये आपके ही रुपये है और ये काग़ज़ भी है मेरे पास जिसमे आपने बाबा को इस के बारे में कुछ लिखा था !

कहते हुए लड़के ने एक पीले पड़ चुके लिफाफे को विक्रम कि तरफ बढ़ा दिया !

            लिफाफे को देखते ही जैसे विक्रम और निशान्त अपने आप में नहीं रहे ! किनारे कि दीवार का सहारा ले कर कुछ देर खड़े रहे ! आँखे दब डबडबा रहीं थी और उनमे १० सालों पहले कि यादें काग़ज़ कि नावों कि तरह हिचकोले खा रहीं थी ! मन था कि कहता था कि सब अनोखा है और सच नहीं है लेकिन आखें थीं कि कहती थीं कि सब सच है और यथार्थ है !

       हम असमय मिली चीज़ों के लिए उतने उत्साहित नहीं होते जितना समय से पहले मिल जाने  वाली चीजो के लिए रहते हैं , किन्तु सहेजने कि आदत जब तक आती है तब तक समय निकल जाता है और प्राप्त चीज़ों का अर्थ सामयिक एवं तर्कसंगत नहीं रेह जाता !

दस साल पहले !

     नौचंदी में इस बार नई सर्कस आई है तू चलेगा  , निशांत ने विक्रम से कॉलेज से वापस लौटते हुए पुछा !

विक्रम सायकल से उतर गया और निशांत भी क्यों कि घर पास में ही था और रास्ता सायकल से जल्दी कट जाता फिर मौका कहाँ मिलता है इन सब बातों का !

विक्रम : हाँ , जाने का मन तो है लेकिन पैसे कहाँ हैं !

निशांत : ये ही तो परेशानी है !

विक्रम : फिर नौचंदी और सर्कस भूल जा , चल घर चल !

बेटा अगर तुम मेरा एक काम करो तो मैं तुम्हारे लिए नौचंदी का इंतेजाम कर सकता हूँ ! पास के चायवाले ने दोनों कि बातें सुन कर कहा !

वो कैसे ? : निशांत और विक्रम दोनों एक साथ बोले !

        दो दिन बाद जो इलेक्शन है ना उसमे अधिकारीयों को चाय देने का काम है सिर्फ एक दिन का काम है और वो भी चार फेरों का , तुम दोनों उस दिन मेरा या काम करो तो मैं दोनों को ५० ५० रुपए दूंगा !

विक्रम ने एक पल में हाँ केह दी निशांत ने अगले दिन अपनी माँ से पूछ कर हामी भरी !

         अगले दिन चाय वाले ने दोनों से एक सादे पेज़ पर लिखवाया कि " चाय के गिलास के टूटने पर कीमत हमारे तय मेहताने ५० रुपयों में से काट ली जाये ! "

इलेक्शन के दिन के बाद अगले दिन आने को कहा था चायवाले ने पर दुकान पर नहीं मिला , गाँव चला गया था शायद !

कॉलेज और फिर सेना कि भर्ती परीक्षा दोनों अच्छे से पास करी दोनों ने ! जीवन में कुछ बन जाने कि धुन में कुछ याद नहीं रहा !

सेना में भर्ती , फिर ट्रैनिंग , फिर दूर दूर कि पोस्टिंग्स !

मेरठ जैसे ख्याल में ही नहीं आया ! 
विक्रम  का तो कोई था नहीं खून के रिश्ते में मेरठ में ,अनाथाश्रम के मालिक और इंचार्ज से बीच बीच 
में ख़त लिख कर हाल ले लेता था और निशांत के माँ के देहांत के बाद उसने भी मेरठ से मुह मोड़ लिया था !

लेकिन आज सब कुछ अपना अपना सा लगने लगा था !

मेरठ कि छावनी में पोस्टिंग के दो दिन के समय में दोनों को कभी अपने बचपन कि याद नहीं आयी , पर सब आखों के सामने था ! दोनों दोबारा जी लेना चाहते थे वो ज़िन्दगी !

किन्तु , बीता समय नहीं आता ! 

कहाँ हैं तुम्हारे बाबा : निशांत ने  रूंधे गले से कहाँ !   

लड़का : वो तो बेगम पुल के उस किनारे पर ही तो दूकान है हमारी चाय कि !

निशांत और विक्रम चल दिए अपने पहले मालिक के पास जिसने

कर्मठ नौजवानो का मेहनताना सम्भाल कर रखा और उम्मीद 

जगाई अपने बेटे कि आँखों में कि

   संपर्क निशचल किन्तु भावपूर्ण होने चाहिए ताकि उनके गर्भ में स्वस्थ एवं सम्मानीय भविष्य पल सके !

छावनी के गेट पर हूटर ने आवाज़ लगायी !

निशांत और विक्रम तेज़ कदमो से वापस लौट चले !

एक दम निशब्द !  दोनों के मन बातें करते थे !

मानस अशब्द संवाद समझते थे और आखें भविष्य देखती थी !

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एक कहानी : छावनी  !!             ~~   मनीष सिंह

Tuesday, March 11, 2014

पुराना बूढा पेड़ , सूख गया !

मोहल्ले का,
एक और ,
पुराना बूढा पेड़,
सूख गया !

नगरनिगम के ,
टूटे नल से ,लगातार,
पानी मिलता था ,
फिर भी सूख गया !

कभी-कभी ,
ज़यादा एवं असमय,
कि गयी देखभाल,
ज़हर सरीखी,
हो जाती है !

देखिये ना ,
पानी मिला ,
फिर भी ,
बूढा पेड़ ,
सूख गया !
  

Wednesday, February 26, 2014

एक कहानी : " अबीर "

सर , शुगर कितनी लेंगे ?  

होटल के कमरा नंबर ४०१ में घुटने के बल बैठते हुए वेटर ने पुछा !  

आप ऐसे ही रख दीजिये मैं खुद ले लूंगा  !  

                     शिखित ने खिड़की से आती धुप से आँखे बचाते हुए कहा ,फिर सफ़ेद दूधिया रंग कि मलमली जयपुरी रजाई कंधों तक खीच ली !

       अरे उठिए सर साढ़े आठ बज गए हैं ! चाय भी ठंडी हो गयी आज , रोज़ तो ६ बजे से अब तक २ कप हो जाती थी आपकी ! नहा कर निकले शिखित के जूनियर कुमार ने अपने बालों पर सफ़ेद तौलिया मलते हुए शिखित को उठाने कि असफल कोशिश करी !

       शिखित में कोई हलचल नहीं , बिस्तर पर औंधा पड़ा बाँहों में चेहरा छुपाये सोता रहा !  कुमार ब्रेकफास्ट करने के लिए दूसरे आर्टिकल्स के साथ होटल के बड़े हॉल कि तरफ बढ़ गया जहाँ होटल कि तरफ से कम्प्लीमेंट्री ब्रेकफास्ट अरेंज्ड था ! जाते-जाते वंशिका ने दरवाजे कि आड़ से जल्दी से शिखित को सोते हुए  एक नज़र देख लिया था , जिसे कुमार ने नोटिस किया था !

       दो दिनों पहले ही दिल्ली कि एक बड़ी चार्टेड ऑकउंटेंसी कि कंपनी कि तरफ से शिखित अपने तीन जूनियर्स के साथ यहाँ जयपुर में एक बड़ी कंपनी के ऑडिट पर आया था !उसका ये लास्ट सेमिस्टर था ,इस लिए वो इस टीम का टीमलीडर था !  उसकी इस  टीम में आर्टिकल कुमार ,वंशिका और अरुणिमा थे !

आज तो मेरा फ़ास्ट है , फ़ास्ट का कुछ मिलेगा यहाँ ! वंशिका ने कुमार से बड़ी असहजता से पुछा !

कुमार : हाँ , रुको पुछ लेता हूँ कहता हुआ कुमार मेनेजर कि तरफ बढ़ गया !

तभी वंशिका कि फ़ोन कि बेल बजी !

अरे , शिखित सर कि कॉल : हाँ सर गुड मॉर्निंग ! : वंशिका बोली !

शिखित : वंशिका ,मैंने तुम्हारे आज के फ़ास्ट के लिए मेनेजर से कल ही बोल दिया था , उसने अरेंजमेंट किया है तुम उसके पास चले जाना या कुमार को भेज दो !

वंशिका : ओ , थैंक यू सो मच सर , कुमार मेनेजर के पास ही गया है ! वैसे आपको कैसे पता कि मेरा आज फ़ास्ट है ?

शिखित : ठीक फिर मैं थोड़ी देर में आता हूँ फ्रेश हो कर  , कुछ अच्छी चीज़ हो तो बचा कर रख लेना मेरे लिए ! बाय !

वंशिका ने मुस्कुराते हुए बाय कहा !

कुमार : अरे वंशिका जी आपके लिए तो विशेष वयवस्था है , शिखित सर ने होटल वालों से कल ही बोल दिया था और लो ये देखो सब फ़ास्ट वालों का खाना आ गया ! तुम्हारा खास ध्यान रख रहे हैं इस बार शिखित सर !

वंशिका : अच्छा जी , वैसे भी शिखित सर सब का ख्याल रखते हैं !

कुमार : पांच साल से तो मैं उनके साथ हूँ , तो तुम ज़यादा जानती हो कि मैं , लड़कियों के बारे में तो कभी इतना ख्याली नहीं देखा उनको जितना तेरे बारे में हैं !

      सब गोल टेबल पर रखी नास्ते कि प्लेटों पर पकौड़ियों कि खुश्बुओं के साथ अनोखे आनंद से सराबोर हो चले थे जिसमे मानसिक तौर पर शामिल कोई और होता है और आनंद किसी और के हिस्से में आता है !

दोस्तों , आप समझ रहे हैं ना ? मैं समझ रह हूँ कि आब सब अच्छे से समझ रहे हैं !

कुछ बचा है कि सब ख़तम कर दिया ! शिखित ने कुमार के कंधे पर हाथ रखते हुए पुछा !

आइये सर , सब कुछ है ! अरुणिमा ने कहा !

सर, ये फ़ास्ट वाली चीज़ें तो इतनी सारी हैं थोड़ी शेयर कीजिये मेरे साथ ! वंशिका बोली !

अच्छा जी हम दोनों को तो छूने भी नहीं दिया था और शिखित सर को शेयर वहा वाह भाई वाह : कुमार ने चुटकी ली !

शिखित और वंशिका ने कोई ज़वाब नहीं दिया मुस्कुराते हुए नाश्ता फिनिश किया फिर सब चल दिए काम पर !

दिन भर काम का सिलसिला चलता रहा ! बीच बीच में सब ने नोटिस किया कि शिखित वंशिका के प्रति ज़यादा सचेत था  ! खाने में , पीने में , ऑडिट के लिए जाते समय वो किस के साथ है , कहाँ क्या देखना है का ख़याल खुद रख रहा था ! 

       ऑफिस ले लौटते समय देर शाम को हवाएं सर्द हो चली थीं ! कंपनी कि टैक्सी से सब होटल कि तरफ चल दिए रस्ते में वंशिका ने बताया इस चोराहे के दूसरी तरफ कि गली में मेरे ताऊ जी का मकान है !

कुमार : ओह, छुपी रुस्तम तीन दिन से हमारे साथ जयपुर में है यहीं से आती जाती है और आज बता रही है कि तेरे ताऊ जी रहते हैं यहाँ !

अरुणिमा : ये ठीक नहीं है वंशिका !

कुमार : चलो आज इसके ताऊ जी को सरप्राइज़ देते हैं !

वंशिखा : नहीं !

शिखित : क्यों ?

वंशिखा : पापा को अच्छा नहीं लगेगा !

अरुणिमा : क्यों क्या हुआ ?

शिखित : ठीक है , चलो जाने दो फॅमिली इशू होगा हमें नहीं डिस्टरब करना चाहिए !

ओके : कुमार और अरुणिमा ने अपनी सहमति दी !

वंशिखा शायद चाहती थी कि इस  सब्जेक्ट पर आगे बात बढे पर अपने सिनिअर के सामने कुछ मौका नहीं था !

टैक्सी होटल के आगे रुकी शिखित  और कुमार ने उतरते हुए वंशिखा और अरुणिमा से   पुछा  तुम्हारे लिए कुछ लाना है हम  ज़रा अभी आते हैं सामने वाली शॉप से !

नहीं आप हो आइये ! अरुणिमा बोली और रेसेप्शन कि तरफ बढ़ गयी !

डिनर के लिए एक ही टेबल पर इकठ्ठा हुए फॉर्मल ड्रेस में  चारो होटल के बेसमेंट में बने बड़े से हॉल में !

हलकी आवाज़ में पियानो कि धुन बज रही थी ! सब एकदम शांत शांत ! नीली रौशनी में नहाते चमचमते शीशे के गिलास ! सलीके से रखी चम्मच और फोर्क !

यहाँ बैठते हैं एक कोने कि टेबल कि तरफ इशारा करते हुए वंशिका बोली !

हाँ हाँ जहाँ बोलो ! अरुणिमा और कुमार एक तरफ और वंशिखा और शिखित एक तरफ बैठे !

हलके फुल्के मौहोल में खाना ख़तम हुआ !

सौफ खाते हुए सब रेसेप्शन कि तरफ बढ़ रहे थे कि होटल मेनेजर ने आ कर रिक्वेस्ट करी :

सर मैडम कल होली है ! क्योकि कल हम होटल बंद रखते है लेकिन आप सब गेस्ट के लिए हम में से कुछ लोगों को आना होगा लेकिन जो नहीं आ सकेंगे उनके लिए हमने छोटा सा प्रोग्राम रख है आप लोग भी इनवाइटेड हैं , प्लीज़ १० मिनिट्स का समय दीजिये !

वंशिखा ने सब कि तरफ देखा और सब कि हाँ थी !

दर असल ऑफिस में शिखित टीम लीडर होता था पर बाकि समय वंशिखा क्यों ? ये आप खूब समझ रहे हैं !

होली का माहौल ! सुन्दर सुन्दर लोग ! साफ़ साफ़ कपड़ों में बैठे थे  !

इन मौकों पर रिश्ते जिन पर कोई रंग नहीं चढ़ा होता , सुर्ख रहते हैं उनको अवसर मिलता है !

रंगीन हो जाने का , तृप्त हो जाने का !

रिश्तों के बंधन का और सुलझन का भी !

दो टेबल्स पर अबीर और गुलाल काँच कि प्लेट्स में सजा कर रखे थे !

मेनेजर ने सब के माथे पर अबीर  लगा कर होली कि शुभकामना दी !

कुमार और अरुणिमा ने एक दूसरे को अबीर लगाया शिखित को वंशिखा ने अबीर लगाया !

रिश्तों अनाम , अनकहे शब्द में  रंगीन हो चले ! 

             दूरियों के द्वार पर करीबियत गुलाल और अबीर के माध्यम से आवाज़ लगाती थी , दूसरी तरफ दोनों के भीतर बैठा आगंतुक रास्ता तकता था कि कब निमंत्रण मिले !

        होली के गुलाबी अबीर कि खुशबू और कोमल सपर्श ने सब कितना  आसान कर दिया, सम्माननीय और विनयपूर्ण तरीके से !

कल ताउजी के घर चलेंगे हम सब : वंशिखा ने कहा , शिखित जैसे उछल पड़ा !

बहुत कठिन है मन मुताबिक चित्र उतार पाना जीवन के सफ़ेद कैनवास पर , होली के गुलाल और अबीर कभी कभी साथ दे जाते हैं , रंगीन रहने के संदेशे के साथ !

सब एक रंग के अबीर में रंगे दूरियाँ मिटाती होली में मशगूल थे !

            दिन कि बढती मलमली धूप में शिखित जीवन के नये रंगों के आनंद में था और उसके हाथों पर लगा अबीर सुर्ख होकर रिश्तों में तरलता ढूँढ रहा था ,तो  वंशिखा  गुलाल - अबीर में लिपटी अपनी अंगुलियों से  दो दिनों के अनुभवों में दोनों का रंगीन भविष्य तलाशती  थी !!

अबीर और गुलाल चेहरों से दूरियों के नक़ाब हटाने में मशगुल थे , हाथों हाथ सफ़र करते हुए   !!


आपका : मनीष सिंह

Friday, February 21, 2014

एक कहानी : " अलविदा "

          अपने साथी डाक्टर्स के साथ हॉस्पिटल के केफेटेरिया से  " प्राचीर "  जल्दी जल्दी लॉबी से होता हुआ मेन गेट कि तरफ बढ़ रहा था ! बीच-बीच में नीचे कि तरफ बाकी डाक्टर्स कि तरफ भी देखता जाता था जो सुबह से सांकेतिक हड़ताल पर थे  और मेन गेट पर इक्कट्ठा थे !
      
अरे , आप यहाँ ?

प्राचीर ने एक ४०-४५ साल कि महिला से पुछा जो लॉबी में पड़े सरकारी लम्बे से लकड़ी के तखत पर बैठी थी !

कोई जवाब नहीं मिलने पर प्राचीर ने फिर से पुछा :

आभा दी आप यहाँ क्या कर रही हैं ? क्या हुआ है आपको ?

कोई जवाब नहीं मिला तो प्राचीर के बाकि साथियों ने भी उस महिला के पास आ कर पुछा आपको क्या तकलीफ है मैडम ?

सर , ये बोल नहीं सकती और सुनाई भी कम देता है ! पानी कि बोतल में सरकारी ठन्डे पानी को भर कर लाता हुआ एक १२ - १३ साल का लड़का बोला जो जल्दी जल्दी उनकी तरफ चला आ रहा था !

प्राचीर : तुम कौन हो ? क्या नाम ?

जी मेरा नाम अतुल है और मैं मौसी कि सहेली का बेटा हूँ ! मेरी माँ और मौसी दोनों एक ही एन जी ओ में काम करते हैं !

प्राचीर : कब से बीमार हैं आभा दी ?

अतुल : पता नहीं , मुझे तो आज माँ ने कहा कि ले जाओ हॉस्पिटल ! पर सर आप कैसे जानते हैं इनको ? क्या ये पहले भी आपके पास इलाज कर चुकी हैं ?

प्राचीर ने कुछ सम्भलते हुए अपने दूसरे साथियों से कहा : स्ट्रेचेर मगवाओ जल्दी !

अतुल और बाकि साथियों ने प्राचीर कि आभा दी को आई सी यू में पहुँचाया ! ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने जब एडमिशन फॉर्म भरने के लिए आभा जी डिटेल्स जाननी चाही तो अतुल वहाँ नहीं था ! रुपेश ने बताया कि अतुल बोल कर गया है कि आभा दी का दुनिया में कोई नहीं है और वो अतुल और माँ  के साथ ही वो रहती थी अब वो वापस जा रहा है सुबह आएगा !

नर्स : सर आपने  बिना  किसी  इनफार्मेशन  के  इस  पेशेंट  को  एडमिट  कर  लिया  और  बेस्ट  ट्रीटमेंट भी शुरू करवा दिए हैं अब में कैसे बाकि कि फॉर्मलिटीज़ पूरी करू ?

प्राचीर : लाइए एडमिशन फॉर्म और बाकि के पेपर्स मुझे दीजिये , थोड़ी देर में मुझ से ले लीजियेगा !

शाम के ७ बज रहे थे !

सूरज कि किरणे चन्द्रमा के लिए रास्ता बुहार रहीं थी !

बाहर हवायें हलकी ठंडी हो चली थी  लेकिन आभा दी का माथा अभी भी आग उगलता था ! 

नर्स ने ब्लैक कलर का पेन प्राचीर कि तरफ बढ़ाते हुए कहा : कॉफी लेंगे सर ?

प्राचीर ने पेन लेते हुए हल्की सी मुस्कराहट से हामी भरी !

सुबह के ११ बजे से शाम के ७ बजे तक वो लगातार अपनी आभा दी के साथ था ! जहाँ जरूरत पड़ती थी स्पेशलिस्ट को बुला लेता था !

थोड़ी देर में नर्स ने दो कप कॉफी ले कर दरवाज़े पर दस्तक दी !

प्राचीर : अंदर आजाइए !

नर्स : लोजिये सर !

प्राचीर : अरे , आ खुद ले आयीं !!

नर्स ने पास पड़े एडमिशन फॉर्म और बाकि परमिशन फॉर्म्स देखे सब प्राचीर ने भर दिए थे ! 

आभा दी को अपनी बड़ी दीदी और खुद को उनका छोटा भाई बताया था ! पता अपने घर का दिया था !
रिफरेन्स में अपने पिता का नाम लिखा था ! परमिशन फॉर्म पर खुद सिग्नेचर कर थे !

प्राचीर : कुछ बाकि है सिस्टर ?

नर्स ने एक नज़र प्राचीर कि तरफ देखा और कहा नहीं सर !

दी ठीक हो जायें सब को सब बता दूंगा सिस्टर !

प्राचीर ने एक अद्र्श्य प्रश्न का उत्तर दिया !

नर्स ने अपराधबोध से अपनी गर्दन बाईं तरफ हलके से मोड़ दी !

तुम आज घर नहीं आओगे ?

प्राचीर : नहीं माँ , आभा दी को अभी होश नहीं आया है ?

आभा ? तुम कहाँ हो ? प्राचीर कि माँ ने फोन पर पुछा !

माँ अपने हॉस्पिटल में ही हूँ और आभा दी के पास ही हूँ !

ठीक है हम आते हैं , प्राचीर कि माँ बोली !

प्राचीर के आँखे डबडबाई हुई थी ! आभा दी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी अभी भी !

सर आप भी थोडा आराम कर लीजिये हम हैं यहाँ ! प्राचीर के साथी रुपेश और जलज ने प्राचीर के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा !

     बस , ऑखें छलक गयी प्राचीर कि , वाशरूम कि तरफ बढ़ता हुआ लगभग रोने लगा था वो !
कुछ देर में बाहर आया तो बाकि साथी भी आ चुके थे !

जलज : सर, अभी डाक्टर बेनेर्जी आये थे और कहा है कि अगले १ घंटे में अगर कुछ डेवलपमेंट नहीं हुआ तो ट्रीटमेंट चेंज करंगे !

प्राचीर ठीक है कहता हुआ आभा के सिरहाने जा कर बैठ गया ! आभा दी का हाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला सिस्टर कमरे कि सारी लाइट्स ऑन कर दीजिये प्लीज़ !

डॉ.रुपेश , डॉ.जलज , डॉ.नयन , डॉ.कुणाल और सिस्टर नंदिता सब प्राचीर को देख रहे थे !

बाहर अँधेरा गहराता जाता था और कमरे के भीतर सन्नाटा !

       जब कोई ५ साल का था तब आभा दी से पहली बार मिला था मैं ! अपने घर के सामने वाले पार्क में दो ग्रे रंग के बॉक्स ले कर बैठी थी वो और पार्क के किनारे पर पीले रंग का एक कपडे का बेंनर लगा था " पल्स पोलियो रविवार " दो बूँद ज़िदगी कि !

प्राचीर अपनी आभा दी का हाथ पकडे पकडे बोलता जा रहा था !

       माँ ने मुझे और मेरे चचेरे भाई को आभा दी के पास से दो बूँद दवा पिलवाई थी  ! दीदी ने मेरी नन्ही सी छोटी उंगली पर एक नीला सा निशान लगाया था और हम दोनों को एक एक प्लास्टिक कि सीटियाँ दी थी ! दिन भर उछलते फिरे थे हम सीटियां बजाते हुए !

कमरे के सन्नाटे को जैसे हलकी सी चपेट पड़ी हो , सब के चेहरे मुस्कुरा रहे थे !

           हर महीने , दो महीने में आभा दी आ जाती थीं पार्क में और मेरी माँ मुझे हर बार दवा पिला कर लाती थी ! जब में बड़ा हुआ तो तो मैं छोटे बच्चो को दी के पास ला कर दवा पिला देता था और सीटियां बांटता था ! वैसे तो दी अपने साथ अपना लंच लाती थी लेकिन कभी कभी में माँ या चाची कभी चाय और नाश्ता मुझे देती थी दीदी को देने के लिए ! घर पर भी आकर बैठ जाया करती थी दी ! एक बार दी को मैंने साड़ी पहने देखा हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ , मांग भरी हुई - शादी हो गयी थी दीदी कि !
         जब मैं छोटा था तब वो शायद स्कूल में पढ़ती थी तो सूट सलवार में आती थी ! फिर मेरे इंटरमीडिएट कर लेने के बाद एक रोज़ पता चला  कि आभा दी के पति का रोड एक्ससीडेंट में देहांत हो गया , दूसरी वाली आंटी ( अतुल कि माँ ) मेरी माँ से बता रही थी ! फिर उसके बाद कभी नहीं देखा दी को बस अचानक आज यहाँ मिला हूँ !

कैसी है आभा अब ? प्राचीर कि माँ ने अंदर आते हुए पुछा !

      प्राचीर सिरहाने से उठकर माँ के पास जाने लगा तो आभा कि हलकी पकड़ से वो अपना हाथ छुड़ा नहीं सका !

      जैसे गीली हो चुकी अपनेपन कि मिटटी से दूरियों का पानी निचुड़ चूका था और बंधन अपनी आभा पर था , आस यथार्थ में परिवर्तन होना चाहती थी !

डॉ.बेनेर्जी को बुलाओ दी को होश आ रहा है  : प्राचीर ने कहा !

दी आप मुझे सुन सकती हो ? प्राचीर ने आभा से पुछा !

आभा ने सर हिलाया और जैसे कहा कि तुमने जो भी कहा मैंने सब सुना बेटा !

कमरे में  चेहरों पर ख़ुशी थी !

        आभा ने सबसे पहले प्राचीर  को अपना माथा नीचे करने का इशारा किया और चूम लिया !

असीम संतोष ,  अलौकिक आनंद ,  प्रगाढ़ स्नेह ,  निःस्वार्थ समर्पण दोनों तरफ से !

    सब आनंद मूर्तियों से खड़े निःशब्द कमरे में हो रहे मंचन को देख रहे थे , जिस जीवन नाट्य के वो खुद भी पात्र थे !

आभा दी अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी और फिर हमारे साथ ही रहेंगी !

         प्राचीर कि माँ सोफे पर बैठे बैठे सब देखती जाती थी , सोचती जाती थी उन्होंने तो सिर्फ एक प्राचीर को अपने पैरों पर  खड़ा किया लेकिन आभा ने तो अनगिनत बच्चो को उनके पैरों पर खड़े
रह सकने लायक बनाया और आज वो खुद सहारे कि मोहताज है ! किस ले लिए जिन्दा रही वो अब तक और आगे किस ले लिए रहेगी ?

आभा ने  प्राचीर कि माँ से मिलने के लिए इशारा किया , माँ के हाथो में हाथ ले कर रो पड़ी दोनों !

डॉ.बेनर्जी कमरे में आ चुके थे और बोले :  अब सबको बाहर जाना होगा , प्राचीर तुम अंदर ही रुको !

सब बाहर पड़े सरकारी लकड़ी के तख़्त पर बैठे थे ,कोई खड़ा था !

सब अपने को प्राचीर और आभा दी कि कहानी का एक पात्र मान खुशनुमा अंत कि और बढ़ रहे थे !

रुपेश कि नज़र कमरे के अंदर गयी और चहरे से सारी ख़ुशी काफूर !

            प्राचीर कि आभा दी जा चुकी थी और प्राचीर अपने बचपन ,किशोरावस्था की अनेकानेक
घटनाओं कि खुलती बंधती गाठों में यादों कि खुशबूओं को जीता जाता था ताकि उनकी आभा और बढे अपनी आभा दी को अलविदा कहता हुआ  !

       सही है ज़िन्दगी सिर्फ दो बूंदों कि सी ही है , जीने वाले इसे सागर में तब्दील कर लेते है, जीने के कारण तलाश कर !!

एक कहानी : अलविदा , आभा दीदी !!