Wednesday, March 12, 2014

एक कहानी : " छावनी " .

           ऑफिसर्स मेस से जल्दी जल्दी रात का खाना खा कर विक्रम विशेष परमिशन पर  छावनी के बाहर अपने एक और साथी के साथ निकला ही था कि हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी और उन्हें बेग़म पुल के दूसरे छोर पर एक चाय कि दूकान पर रुकना पड़ा !

निशांत वर्मा : चाय लोगे केप्टन ?

विक्रम : मैं रात को चाय नहीं पीता !

निशांत : ये भी कोई स्कूल कि घंटी है जो रात में नहीं बजती , चल आज पी कर देख !

विक्रम : यार कुछ चीज़ों में मुझे जबरदस्ती पसंद नहीं और तू ये जनता है !

निशांत : ठीक है दोस्त , चाय के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाती , सोचा था !

विक्रम स्टूल को अपनी और खीचते हुए चाय वाले से बोला : भैया जी , दो कप अच्छी चाय बनाइये !

चायवाला : अदरक दाल दूं सर ?

विक्रम और निशांत ने एक दूसरे कि तरफ देखते हुए जैसे कुछ याद किया और गले मिले !

चायवाले ने अदरक वाली अच्छी सी चाय बनाई   मिटटी के कुल्हड़ में को सेना के नोजवान अधिकारियों कि तरफ बढ़ा दी !

            छत  पर पड़ी नीले रंग कि तिरपाल बार बार हलकी हवा से उड जाती थी और बारिश कि बूंदे दूकान के भीतर झाँक लेती थी ! कभी विक्रम कि पलकों पर तो कभी निशांत के बाँहों पर !

सड़क पूरी भीग चुकी थी !

बेग़म पुल पर एक किनारे से दूसरे किनारे पर सायकल , रिक्शा , बस , ट्रक और ठेले सब आते जाते थे !

विक्रम और निशांत के लिए नया नहीं था ये सब देखना हाँ समय और उम्र ज़यादा हो गयी थी ये नज़ारा देखे !

विक्रम तूने देखा वो गवर्नेंट कॉलेज के पीछे वाले गेट का नीम का पेड़ कितना घना हो गया है ! : निशांत ने ट्रक कि मैं लाइट से रोशन हुए नीम के पेड़ कि तरफ इशारा करते हुए कहा !

निशांत भाई सब कोलगेट जो करने लगे हैं , हमारे बचपन जैसे दातुन करते तो देखते इतना घना कैसे होता ये ! विक्रम ने चाय कि आखरी घुट लेते हुए जवाब दिया

चल भाई देर होने को आई , परमिट भी ओवर होने वाली है !

दोनों लौट आये छावनी में , अपने अपने कमरों में !

       बारिश रात भर होती रही ! हवाएँ शहर के इस कोने से उस कोने तक तेज़ चाल से टहलती रहीं ! छावनी के कोने कोने पर जवान अपने अधिकारियों कि रक्षा में रात भर पहरा देते रहे !  रात भर बेगम पुल से धीमे , तेज़ हॉर्न कि आवाज़ें आती रहीं ! फिर रोज़ कि तरह ये रात भी बीत गयी जैसे पास कि काली नदी कि गहराइयों में बारिश का पानी समां गया  , अगली बारिश के आने तक !

गुड मॉर्निंग निशांत : विक्रम ने कैम्पस के ग्राउंड में बड़े से झूले पर सर के पसीने को सफ़ेद तौलिये से पोछते हुए कहा !

निशांत : गुड मॉर्निंग दोस्त , कैसी लगी कैंटोनमेंट में पहली रात ?

विक्रम : रात भर सो न सका !

निशांत : क्यों भाई ?

विक्रम : तुम अगर आज फिर मेरे साथ उसी चायवाले भैया के पास चलो तो बताऊंगा !!

निशांत : नॉट ए बिग डील , ठीक है फिर शाम को छेः बजे शार्प मैं गेट पर मिलो !

विक्रम : ओ के !

मेन गेट से कुछ कदम कि दूरी पर के चोराहे से होते हुए बेगम पुल कि तरफ निशांत और विक्रम बढे ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगायी !

साब एक बात पूछूं ? करीब १५ - १६ साल का लड़का हाथों में रजनीगंधा के फूलों के गुलदस्ते लिए खड़ा पूछ रहा था !

सेना कि वर्दी में रौबीले दो अधिकारीयों से एक आम लड़का ऐसे कैसे कुछ पूछ सकता है ! सामान्यतः ऐसा हो होता है ! पुलिस , सेना ही आम आदमी से सवाल करते हैं , पर आज कुछ उल्टा था !

विक्रम ने अपनी चाल कुछ कम करते हुए लडके के पुछा :  तुमने हमसे कुछ कहा ?

लड़का : जी  , मैं आपसे ही कुछ पूछना चाहता हूँ !

निशांत : हाँ बोलो, क्या बात है ?

लड़का पहले आप ज़रा किनारे हो जाइये , यहाँ पुल पर कम जगह है तो इस लिए गाड़ियों से बचना पड़ता है !

निशांत  , विक्रम : तुम जल्दी पूछो क्या काम है हमसे ?

लड़का : साब आप दोनों मेरठ कि ही हैं ना ?

निशांत और विक्रम : हाँ , तो ?

लड़का : साब ये आपके १०० रूपये बाबा बाबा ने दिए थे और कहा था कि अगर कभी आप लोग मिले तो लौटने को !

निशांत , विक्रम ने एक दूसरे को जैसे सवाल करते हुए देखा और बोले : ये क्या है भाई ?

लड़का : साब , अब मैं चलता हूँ !

विक्रम ने थोडा भारी  आवाज़ में लड़के से पुछा : देखो लड़के हम  तुम्हे नहीं जानते और ये कैसे रूपये है हमें नहीं पता लो ये वापस लो और हमें जाने दो !

लड़का : नहीं साब ये आपके ही रुपये है और ये काग़ज़ भी है मेरे पास जिसमे आपने बाबा को इस के बारे में कुछ लिखा था !

कहते हुए लड़के ने एक पीले पड़ चुके लिफाफे को विक्रम कि तरफ बढ़ा दिया !

            लिफाफे को देखते ही जैसे विक्रम और निशान्त अपने आप में नहीं रहे ! किनारे कि दीवार का सहारा ले कर कुछ देर खड़े रहे ! आँखे दब डबडबा रहीं थी और उनमे १० सालों पहले कि यादें काग़ज़ कि नावों कि तरह हिचकोले खा रहीं थी ! मन था कि कहता था कि सब अनोखा है और सच नहीं है लेकिन आखें थीं कि कहती थीं कि सब सच है और यथार्थ है !

       हम असमय मिली चीज़ों के लिए उतने उत्साहित नहीं होते जितना समय से पहले मिल जाने  वाली चीजो के लिए रहते हैं , किन्तु सहेजने कि आदत जब तक आती है तब तक समय निकल जाता है और प्राप्त चीज़ों का अर्थ सामयिक एवं तर्कसंगत नहीं रेह जाता !

दस साल पहले !

     नौचंदी में इस बार नई सर्कस आई है तू चलेगा  , निशांत ने विक्रम से कॉलेज से वापस लौटते हुए पुछा !

विक्रम सायकल से उतर गया और निशांत भी क्यों कि घर पास में ही था और रास्ता सायकल से जल्दी कट जाता फिर मौका कहाँ मिलता है इन सब बातों का !

विक्रम : हाँ , जाने का मन तो है लेकिन पैसे कहाँ हैं !

निशांत : ये ही तो परेशानी है !

विक्रम : फिर नौचंदी और सर्कस भूल जा , चल घर चल !

बेटा अगर तुम मेरा एक काम करो तो मैं तुम्हारे लिए नौचंदी का इंतेजाम कर सकता हूँ ! पास के चायवाले ने दोनों कि बातें सुन कर कहा !

वो कैसे ? : निशांत और विक्रम दोनों एक साथ बोले !

        दो दिन बाद जो इलेक्शन है ना उसमे अधिकारीयों को चाय देने का काम है सिर्फ एक दिन का काम है और वो भी चार फेरों का , तुम दोनों उस दिन मेरा या काम करो तो मैं दोनों को ५० ५० रुपए दूंगा !

विक्रम ने एक पल में हाँ केह दी निशांत ने अगले दिन अपनी माँ से पूछ कर हामी भरी !

         अगले दिन चाय वाले ने दोनों से एक सादे पेज़ पर लिखवाया कि " चाय के गिलास के टूटने पर कीमत हमारे तय मेहताने ५० रुपयों में से काट ली जाये ! "

इलेक्शन के दिन के बाद अगले दिन आने को कहा था चायवाले ने पर दुकान पर नहीं मिला , गाँव चला गया था शायद !

कॉलेज और फिर सेना कि भर्ती परीक्षा दोनों अच्छे से पास करी दोनों ने ! जीवन में कुछ बन जाने कि धुन में कुछ याद नहीं रहा !

सेना में भर्ती , फिर ट्रैनिंग , फिर दूर दूर कि पोस्टिंग्स !

मेरठ जैसे ख्याल में ही नहीं आया ! 
विक्रम  का तो कोई था नहीं खून के रिश्ते में मेरठ में ,अनाथाश्रम के मालिक और इंचार्ज से बीच बीच 
में ख़त लिख कर हाल ले लेता था और निशांत के माँ के देहांत के बाद उसने भी मेरठ से मुह मोड़ लिया था !

लेकिन आज सब कुछ अपना अपना सा लगने लगा था !

मेरठ कि छावनी में पोस्टिंग के दो दिन के समय में दोनों को कभी अपने बचपन कि याद नहीं आयी , पर सब आखों के सामने था ! दोनों दोबारा जी लेना चाहते थे वो ज़िन्दगी !

किन्तु , बीता समय नहीं आता ! 

कहाँ हैं तुम्हारे बाबा : निशांत ने  रूंधे गले से कहाँ !   

लड़का : वो तो बेगम पुल के उस किनारे पर ही तो दूकान है हमारी चाय कि !

निशांत और विक्रम चल दिए अपने पहले मालिक के पास जिसने

कर्मठ नौजवानो का मेहनताना सम्भाल कर रखा और उम्मीद 

जगाई अपने बेटे कि आँखों में कि

   संपर्क निशचल किन्तु भावपूर्ण होने चाहिए ताकि उनके गर्भ में स्वस्थ एवं सम्मानीय भविष्य पल सके !

छावनी के गेट पर हूटर ने आवाज़ लगायी !

निशांत और विक्रम तेज़ कदमो से वापस लौट चले !

एक दम निशब्द !  दोनों के मन बातें करते थे !

मानस अशब्द संवाद समझते थे और आखें भविष्य देखती थी !

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एक कहानी : छावनी  !!             ~~   मनीष सिंह

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