Friday, February 21, 2014

एक कहानी : " अलविदा "

          अपने साथी डाक्टर्स के साथ हॉस्पिटल के केफेटेरिया से  " प्राचीर "  जल्दी जल्दी लॉबी से होता हुआ मेन गेट कि तरफ बढ़ रहा था ! बीच-बीच में नीचे कि तरफ बाकी डाक्टर्स कि तरफ भी देखता जाता था जो सुबह से सांकेतिक हड़ताल पर थे  और मेन गेट पर इक्कट्ठा थे !
      
अरे , आप यहाँ ?

प्राचीर ने एक ४०-४५ साल कि महिला से पुछा जो लॉबी में पड़े सरकारी लम्बे से लकड़ी के तखत पर बैठी थी !

कोई जवाब नहीं मिलने पर प्राचीर ने फिर से पुछा :

आभा दी आप यहाँ क्या कर रही हैं ? क्या हुआ है आपको ?

कोई जवाब नहीं मिला तो प्राचीर के बाकि साथियों ने भी उस महिला के पास आ कर पुछा आपको क्या तकलीफ है मैडम ?

सर , ये बोल नहीं सकती और सुनाई भी कम देता है ! पानी कि बोतल में सरकारी ठन्डे पानी को भर कर लाता हुआ एक १२ - १३ साल का लड़का बोला जो जल्दी जल्दी उनकी तरफ चला आ रहा था !

प्राचीर : तुम कौन हो ? क्या नाम ?

जी मेरा नाम अतुल है और मैं मौसी कि सहेली का बेटा हूँ ! मेरी माँ और मौसी दोनों एक ही एन जी ओ में काम करते हैं !

प्राचीर : कब से बीमार हैं आभा दी ?

अतुल : पता नहीं , मुझे तो आज माँ ने कहा कि ले जाओ हॉस्पिटल ! पर सर आप कैसे जानते हैं इनको ? क्या ये पहले भी आपके पास इलाज कर चुकी हैं ?

प्राचीर ने कुछ सम्भलते हुए अपने दूसरे साथियों से कहा : स्ट्रेचेर मगवाओ जल्दी !

अतुल और बाकि साथियों ने प्राचीर कि आभा दी को आई सी यू में पहुँचाया ! ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने जब एडमिशन फॉर्म भरने के लिए आभा जी डिटेल्स जाननी चाही तो अतुल वहाँ नहीं था ! रुपेश ने बताया कि अतुल बोल कर गया है कि आभा दी का दुनिया में कोई नहीं है और वो अतुल और माँ  के साथ ही वो रहती थी अब वो वापस जा रहा है सुबह आएगा !

नर्स : सर आपने  बिना  किसी  इनफार्मेशन  के  इस  पेशेंट  को  एडमिट  कर  लिया  और  बेस्ट  ट्रीटमेंट भी शुरू करवा दिए हैं अब में कैसे बाकि कि फॉर्मलिटीज़ पूरी करू ?

प्राचीर : लाइए एडमिशन फॉर्म और बाकि के पेपर्स मुझे दीजिये , थोड़ी देर में मुझ से ले लीजियेगा !

शाम के ७ बज रहे थे !

सूरज कि किरणे चन्द्रमा के लिए रास्ता बुहार रहीं थी !

बाहर हवायें हलकी ठंडी हो चली थी  लेकिन आभा दी का माथा अभी भी आग उगलता था ! 

नर्स ने ब्लैक कलर का पेन प्राचीर कि तरफ बढ़ाते हुए कहा : कॉफी लेंगे सर ?

प्राचीर ने पेन लेते हुए हल्की सी मुस्कराहट से हामी भरी !

सुबह के ११ बजे से शाम के ७ बजे तक वो लगातार अपनी आभा दी के साथ था ! जहाँ जरूरत पड़ती थी स्पेशलिस्ट को बुला लेता था !

थोड़ी देर में नर्स ने दो कप कॉफी ले कर दरवाज़े पर दस्तक दी !

प्राचीर : अंदर आजाइए !

नर्स : लोजिये सर !

प्राचीर : अरे , आ खुद ले आयीं !!

नर्स ने पास पड़े एडमिशन फॉर्म और बाकि परमिशन फॉर्म्स देखे सब प्राचीर ने भर दिए थे ! 

आभा दी को अपनी बड़ी दीदी और खुद को उनका छोटा भाई बताया था ! पता अपने घर का दिया था !
रिफरेन्स में अपने पिता का नाम लिखा था ! परमिशन फॉर्म पर खुद सिग्नेचर कर थे !

प्राचीर : कुछ बाकि है सिस्टर ?

नर्स ने एक नज़र प्राचीर कि तरफ देखा और कहा नहीं सर !

दी ठीक हो जायें सब को सब बता दूंगा सिस्टर !

प्राचीर ने एक अद्र्श्य प्रश्न का उत्तर दिया !

नर्स ने अपराधबोध से अपनी गर्दन बाईं तरफ हलके से मोड़ दी !

तुम आज घर नहीं आओगे ?

प्राचीर : नहीं माँ , आभा दी को अभी होश नहीं आया है ?

आभा ? तुम कहाँ हो ? प्राचीर कि माँ ने फोन पर पुछा !

माँ अपने हॉस्पिटल में ही हूँ और आभा दी के पास ही हूँ !

ठीक है हम आते हैं , प्राचीर कि माँ बोली !

प्राचीर के आँखे डबडबाई हुई थी ! आभा दी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी अभी भी !

सर आप भी थोडा आराम कर लीजिये हम हैं यहाँ ! प्राचीर के साथी रुपेश और जलज ने प्राचीर के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा !

     बस , ऑखें छलक गयी प्राचीर कि , वाशरूम कि तरफ बढ़ता हुआ लगभग रोने लगा था वो !
कुछ देर में बाहर आया तो बाकि साथी भी आ चुके थे !

जलज : सर, अभी डाक्टर बेनेर्जी आये थे और कहा है कि अगले १ घंटे में अगर कुछ डेवलपमेंट नहीं हुआ तो ट्रीटमेंट चेंज करंगे !

प्राचीर ठीक है कहता हुआ आभा के सिरहाने जा कर बैठ गया ! आभा दी का हाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला सिस्टर कमरे कि सारी लाइट्स ऑन कर दीजिये प्लीज़ !

डॉ.रुपेश , डॉ.जलज , डॉ.नयन , डॉ.कुणाल और सिस्टर नंदिता सब प्राचीर को देख रहे थे !

बाहर अँधेरा गहराता जाता था और कमरे के भीतर सन्नाटा !

       जब कोई ५ साल का था तब आभा दी से पहली बार मिला था मैं ! अपने घर के सामने वाले पार्क में दो ग्रे रंग के बॉक्स ले कर बैठी थी वो और पार्क के किनारे पर पीले रंग का एक कपडे का बेंनर लगा था " पल्स पोलियो रविवार " दो बूँद ज़िदगी कि !

प्राचीर अपनी आभा दी का हाथ पकडे पकडे बोलता जा रहा था !

       माँ ने मुझे और मेरे चचेरे भाई को आभा दी के पास से दो बूँद दवा पिलवाई थी  ! दीदी ने मेरी नन्ही सी छोटी उंगली पर एक नीला सा निशान लगाया था और हम दोनों को एक एक प्लास्टिक कि सीटियाँ दी थी ! दिन भर उछलते फिरे थे हम सीटियां बजाते हुए !

कमरे के सन्नाटे को जैसे हलकी सी चपेट पड़ी हो , सब के चेहरे मुस्कुरा रहे थे !

           हर महीने , दो महीने में आभा दी आ जाती थीं पार्क में और मेरी माँ मुझे हर बार दवा पिला कर लाती थी ! जब में बड़ा हुआ तो तो मैं छोटे बच्चो को दी के पास ला कर दवा पिला देता था और सीटियां बांटता था ! वैसे तो दी अपने साथ अपना लंच लाती थी लेकिन कभी कभी में माँ या चाची कभी चाय और नाश्ता मुझे देती थी दीदी को देने के लिए ! घर पर भी आकर बैठ जाया करती थी दी ! एक बार दी को मैंने साड़ी पहने देखा हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ , मांग भरी हुई - शादी हो गयी थी दीदी कि !
         जब मैं छोटा था तब वो शायद स्कूल में पढ़ती थी तो सूट सलवार में आती थी ! फिर मेरे इंटरमीडिएट कर लेने के बाद एक रोज़ पता चला  कि आभा दी के पति का रोड एक्ससीडेंट में देहांत हो गया , दूसरी वाली आंटी ( अतुल कि माँ ) मेरी माँ से बता रही थी ! फिर उसके बाद कभी नहीं देखा दी को बस अचानक आज यहाँ मिला हूँ !

कैसी है आभा अब ? प्राचीर कि माँ ने अंदर आते हुए पुछा !

      प्राचीर सिरहाने से उठकर माँ के पास जाने लगा तो आभा कि हलकी पकड़ से वो अपना हाथ छुड़ा नहीं सका !

      जैसे गीली हो चुकी अपनेपन कि मिटटी से दूरियों का पानी निचुड़ चूका था और बंधन अपनी आभा पर था , आस यथार्थ में परिवर्तन होना चाहती थी !

डॉ.बेनेर्जी को बुलाओ दी को होश आ रहा है  : प्राचीर ने कहा !

दी आप मुझे सुन सकती हो ? प्राचीर ने आभा से पुछा !

आभा ने सर हिलाया और जैसे कहा कि तुमने जो भी कहा मैंने सब सुना बेटा !

कमरे में  चेहरों पर ख़ुशी थी !

        आभा ने सबसे पहले प्राचीर  को अपना माथा नीचे करने का इशारा किया और चूम लिया !

असीम संतोष ,  अलौकिक आनंद ,  प्रगाढ़ स्नेह ,  निःस्वार्थ समर्पण दोनों तरफ से !

    सब आनंद मूर्तियों से खड़े निःशब्द कमरे में हो रहे मंचन को देख रहे थे , जिस जीवन नाट्य के वो खुद भी पात्र थे !

आभा दी अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी और फिर हमारे साथ ही रहेंगी !

         प्राचीर कि माँ सोफे पर बैठे बैठे सब देखती जाती थी , सोचती जाती थी उन्होंने तो सिर्फ एक प्राचीर को अपने पैरों पर  खड़ा किया लेकिन आभा ने तो अनगिनत बच्चो को उनके पैरों पर खड़े
रह सकने लायक बनाया और आज वो खुद सहारे कि मोहताज है ! किस ले लिए जिन्दा रही वो अब तक और आगे किस ले लिए रहेगी ?

आभा ने  प्राचीर कि माँ से मिलने के लिए इशारा किया , माँ के हाथो में हाथ ले कर रो पड़ी दोनों !

डॉ.बेनर्जी कमरे में आ चुके थे और बोले :  अब सबको बाहर जाना होगा , प्राचीर तुम अंदर ही रुको !

सब बाहर पड़े सरकारी लकड़ी के तख़्त पर बैठे थे ,कोई खड़ा था !

सब अपने को प्राचीर और आभा दी कि कहानी का एक पात्र मान खुशनुमा अंत कि और बढ़ रहे थे !

रुपेश कि नज़र कमरे के अंदर गयी और चहरे से सारी ख़ुशी काफूर !

            प्राचीर कि आभा दी जा चुकी थी और प्राचीर अपने बचपन ,किशोरावस्था की अनेकानेक
घटनाओं कि खुलती बंधती गाठों में यादों कि खुशबूओं को जीता जाता था ताकि उनकी आभा और बढे अपनी आभा दी को अलविदा कहता हुआ  !

       सही है ज़िन्दगी सिर्फ दो बूंदों कि सी ही है , जीने वाले इसे सागर में तब्दील कर लेते है, जीने के कारण तलाश कर !!

एक कहानी : अलविदा , आभा दीदी !!

No comments:

Post a Comment