Saturday, March 29, 2014

संस्मरणों कि पंक्तियाँ !!

गमछे से,
कोहनियों तक,
पोछता पसीना,
मूर्तिकार,
दिन भर, रात भर,
मूर्तियाँ बनाते हुए !

पूजा पंडालों में,
कल भगवान् ,
हो जाएंगी !
दूर हो जाएँगी,
दर्शनाथियों कि,
लम्बी पंक्तियों कि सी !

जैसे ,
दूर हो जाते हैं,
रात भर ,
दिन भर,
पाले पोसे,
मासूम चहरे,
हमारे घरों से !

फिर ,
बंध  जाती हैं,
संस्मरणों कि पंक्तियाँ,
आँखों से ,
पिघलती हुई !

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