उजाले और अँधेरे,
अनंत रास्तों पर,
समुद्र किनारे,
रेत घुले पानी में,
हौले हौले बतियाते हैं,
छण भर को ही !!
सब कुछ भूल कर,
जैसे मिलते हैं,
दोस्त और दुश्मन,
छणिक,
उजाले खोजते,
अंधेरों में,
मधुशाला के !
रास्ते , पड़ाव,
भीड़ और एंकाकीपन,
रंगमंच, सूनापन,
सब ,हमसे ही तो है,
वैसे ही,
जैसे समुद्र का,
लहर खता पानी,
झील में सुना,
रहता है और,
नदियों , नेहरों में,
अटखेलियाँ लेता,
अनगिनत भावों में,
रचनाएँ रचता हुआ,
फिर समुद्र
में जा मिलता है,
फिर से कुछ
कर गुजरने को ,
भाप होकर !!