Saturday, October 26, 2013

अंधेरों में !!

उजाले और अँधेरे,
अनंत रास्तों पर,
समुद्र किनारे,
रेत घुले पानी में,
हौले हौले बतियाते हैं,
छण भर को ही !!

सब कुछ भूल कर,
जैसे मिलते हैं,
दोस्त और दुश्मन,
छणिक,
उजाले खोजते,
अंधेरों में,
मधुशाला के !

Sunday, October 20, 2013

अक्सर तो नहीं !!

अक्सर तो नहीं,
लेकिन होता ये,
कभी कभार,
जुड़ने की कोशिशें,
खाई पटाने के प्रयास,
अपनत्व तलाशते  मन,
दबडबी आँखें लिए ,
सो  जाते हैं  !!

रिश्तों की,
अप्रत्याशित चुभन भरे,
बिस्तर पर ,
शेष बची साँसों से ,
उम्मीदों और जीवन को  
जोड़ कर दूरियां ,
कम करने की ,
कोशिश में !!
अथक , अनंत,
 क्योकि,
साथ नहीं मिलता ,
और,
अकेले कुछ नहीं होता ,
ना हारना और ना जीतना !!

Wednesday, October 16, 2013

भीड़ और एंकाकीपन !

रास्ते , पड़ाव,

भीड़ और एंकाकीपन,

रंगमंच, सूनापन,

सब ,हमसे ही तो है,

वैसे ही,

जैसे समुद्र का,

लहर खता पानी,

झील में सुना,

रहता है और,

नदियों , नेहरों में,

अटखेलियाँ लेता,

अनगिनत भावों में,

रचनाएँ रचता हुआ,

फिर समुद्र

में जा मिलता है,

फिर से कुछ

कर गुजरने को ,
भाप होकर !!

Sunday, October 13, 2013

उलझे - उलझे फिरते हैं हम, पूरे साल झमेलों में !!

उलझे - उलझे फिरते हैं हम,
पूरे साल झमेलों में !
कंधे - कंधे टकराते हैं,
सडकों - सड़को ,रेलों में !

नुक्कड़ - नुक्कड़ मिलकर बैठें,
सुलझी - सुलझी बात करें ,
माथे -माथे, चन्दन - चन्दन,
हाथों -हाथों स्नेह मलें,

झूठ ,कपट के रावण फूकें,
आओ , शहर के मेले मैं !!

                                           दशहरे और विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !!



                                                                     by : Manish Singh

Friday, October 11, 2013

युक्तियों का केक्टस, हथिलियों पर !!


पानी सी, 

सरक जाती हैं !
जीवन की ,
अंजुली से !

सम्वेंदनाएं,
भावनाएं तथा ,
संबंधों की कलियाँ,
फूल होने तक , 
तब, 
जब ,
आकार लेता है ,
युक्तियों का केक्टस,
हथिलियों पर !!


                                      : मनीष सिंह  

Monday, October 7, 2013

व्यवस्थाएं , आकाशगंगा सी !!


व्यवस्थाएं,
और हम,
तलाशते है ,
एक दुसरे को,
सतत जीवन की,
पहचान यात्रा में,
सांसों की डोर ,
के थमने तक !

परिधि,
सरकारी,
सामाजिक,
पारिवारिक,
व्यवस्थाओं की,
बढती ही जाती है,
आकाशगंगा सी,
खोज यात्रा में,
इन सब की !

Monday, September 30, 2013

घोंसले खाली हैं !


घोंसले खाली हैं !

टिकटघर,
डाकघर,
प्लेटफोर्म,
बारातघर,
क्लासरूम,
सिनेमा घर ! 
यहाँ , 
घोंसले खाली हैं! 

आज भी,
रेलें दौड़ती हैं,
पत्र आते हैं,
डेस्क कुर्सियां,
भरी रहती हैं !
रोज़, छुट्टी तक !

किन्तु यहाँ ,
घोंसले खाली हैं !
नहीं चेहचहाते,
नन्हे बच्चे !
विकास से 
विकसित दूरियां ,
अस्तित्व से,
प्रतिउत्तर की आस में,
रोज़ पूछती हैं,
क्यों खाली 
हो रहे हैं,
घोंसलों सरीखे हम !!!!!