रास्ते , पड़ाव,
भीड़ और एंकाकीपन,
रंगमंच, सूनापन,
सब ,हमसे ही तो है,
वैसे ही,
जैसे समुद्र का,
लहर खता पानी,
झील में सुना,
रहता है और,
नदियों , नेहरों में,
अटखेलियाँ लेता,
अनगिनत भावों में,
रचनाएँ रचता हुआ,
फिर समुद्र
में जा मिलता है,
फिर से कुछ
कर गुजरने को ,
भाप होकर !!
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