" सर्द रातों मैं झरती हुई, पंखुरी,
डाली-डाली पवन हो रही, बांसुरी !
ओस के सब दिए, आँखे मूंदे हुए,
शब्द गढ़ते हुए, कर रहे आरती !!
समय हैं , निशा है, निशानों को जोड़ें,
दिन की कठिनता , को विश्राम दें !!
एकांकी नुक्कड़, सड़कें, गलियाँ वीरानी,
हम भी अपनी आंखें मूंदें, सो जाएँ !!
***** शुभरात्री *****
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