" किताबों में मिलते गुलाब, अब कहाँ,
गुल्लक की टूटी हुई , पेंदियाँ !
दीवारों पे लिखी हुई कुछ ग़ज़ल ,
पन्नों मैं लिपटी हुई तितलियाँ !!
बचपन को जल्दी भुलाने की ज़िद,
अपने घरोंदों के होने की, लौ !
सभी कुछ मिले ,ये सोचा किये,
फिसलता गया सब, ज्यों मछलियाँ !! "
>>>> शुभ दिन <<<<<
गुल्लक की टूटी हुई , पेंदियाँ !
दीवारों पे लिखी हुई कुछ ग़ज़ल ,
पन्नों मैं लिपटी हुई तितलियाँ !!
बचपन को जल्दी भुलाने की ज़िद,
अपने घरोंदों के होने की, लौ !
सभी कुछ मिले ,ये सोचा किये,
फिसलता गया सब, ज्यों मछलियाँ !! "
>>>> शुभ दिन <<<<<
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