शालीनता और संस्कारीकता दो प्रथक प्रथक व्यवहार हैं ! दोनो को जोड़ कर नही देखा जाना चाहिए !! एक होता है और एक अपनाना पड़ता है !! जो होता है उसपर क्या कहिए किंतु अपनाए जाने वाले के पीछे के कारण , कई बार उसका अर्थ बदल देते हैं !! आप किस परिवार से आते है ये आहें नही किंतु आप कैसा परिवार बनाते हैं ......महत्वपूर्ण है !! आपसे जुड़ने वाले को यदि ये एहसाह हो गया की आप अपने हित साधने हेतु शालीन होने का ढोंग कर रहे है तो वो पल आपके संस्कार पर भी भारी पड़ सकता है ...... व्यावहारिक रहिए , हर वक़्त तिज़रत अछी नई होती भाई .....!!"
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