योगेश का लिखा एक गीत है ....आनंद फिल्म का " कही दूर जब दिन ढल जाए..." इस गीत के आरंभ होने रे पहले एक ध्वनि सुनाई देती है .....बैलगाड़ी के पहियों की.... ...याद आया ? आज भी वो धुन ज़िंदा है हमारी यादों मैं जबकि हमारी खुद की आवाज़ आज कितनी बदल गयी है ....वैसे ही जैसे की हमारे कितने ही रिश्ते बने और ख़तम हो गये !! कुछ आखरी साँसे गिन रहे हैं .....कहीं पाताल पानी हो रहा है कुछ लोग अपनो को ज़िंदा रखने के लिए खुद की जान गावा बीते ! रिश्ते सिर्फ़ काम निकल लेने के लिए नही होते .. समर्पण के भी लिए होते हैं .....चलिए जाने दीजिए धीरे धीरे चलिए साथ साथ रहेंगे नही तो एकांकीपन तो सर्वथा साथ है ही ......!! नोच के लेने और सिर्फ़ पाने मैं अंतर है.... अंतर रखिए , आनंद रहेगा !!
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