Saturday, June 15, 2024

एक कहानी : टी टेस्टर - Tea Taster.

            घुमावदार अंधियारी सीढ़ियों से जैसे जैसे " पुलकित " कमरे की तरफ बढ़ रहा था उसके कानो में टेप रिकॉर्डर पर बजते गाने के शब्द साफ़ साफ़ सुनाई पड़ रहे थे !

धीमी आवाज़ में एक ग़ज़ल बज रही थी ;

                        दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं,
                            शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है !
                                 हम भी पागल हो जाएंगे ऐसा , लगता है !
                                     दीवारों से मिल का रोना      ............. !

विपुल दा , विपुल दा कहाँ हैं आप ?
 
तबियत  तो ठीक है ना ?
 
दो दिनों से आये नहीं चाय दुकान पर !

चिंता भरी आवाज़ से  विपुल पुकारता हुआ कमरे के करीब पहुंच गया !
 
चौखट पर गहरे हरे रंग का पर्दा टगा था !
 
     अंदर से सिर्फ धीमी आवाज़ में बजती ग़ज़ल सुनाई देती थी कोई दूसरी हलचल नहीं ! पुलकित ने धीरे धीरे पर्दा उठाया और भीतर झांकने की कोशिश करी ! अंदर सिर्फ अँधेरा था और एक आवाज़ !
 
" आ जाओ पुलकित मैं यहीं हूँ ! " 
 
कोने की आराम कुर्सी पर आगे की तरफ झुके हुए एक ७० - ८० बसंत देख चुके बुजुर्ग बैठे थे और "पुलकित" को बुला रहे थे !
 
ये " पुलकित " के विपुल दा थे !

       अजब दोस्ती थी  दोनों में  , उम्र का कोई बंधन नहीं जहाँ पुलकित सोलह - सत्रह साल का लड़का और वहीँ विपुल दा उम्र के अंतिम पड़ाव पर ! अच्छी जमती थी दोनों में. अभी कुछ महीनो पहले की तो बात है , दोनों की मुलाक़ात हुए ! पुलकित स्कूल से लौट रहा था की चाय पीने की इच्छा हुई तो चौराहे की गुमटी में रुक गया, विपुल दा वहां पहले से बैठे चाय पी रहे थे !

पुलकित लकड़ी से स्टूल पर बैठते हुए विपुल दा से कहा : दादा , अखबार देंगे ?

विपुल दा : हाँ , हाँ ,लो भाई ! क्या कोई एग्जाम का रिजल्ट आया है ?

पुलकित ने अपने नज़र अखबार में गड़ाए हुए बंगला में कहा : ना , एम्नि देख्छी नूतन छोबी , कोथाए के आछे !

विपुल दा ने चाय की चुस्की लेते हुए जवाब दिया : किन्तु घर से तो बोल के आये होगे की स्कूल जा रहा हूँ ?

पुलकित ने सर उठा कर देखा और कहा : हाँ , वो तो है , किन्तु अपने आस पास की घटनाओ पर हम युवाओं को अपडेट  भी तो  रहना चाहिए !

चायवाले ने चाय पुलकित की तरफ बढ़ा दी , चाय विपुल दा के हाथो से होते हुए पुलकित तक पहुंची !

आप कुछ अलग है ! पुलकित ने विपुल दा की तरफ देखते हुआ कहा !

विपुल दा मुस्कुराये और बोले , हाँ , किन्तु तुम बिलकुल मेरे जैसे हो , ज़रा से भी अलग नहीं !

अंजाना बंधन दोनों को एक दूसरे से बाँध रहा था !

विपुल दा : कितना हुआ बेनर्जी ?

बेनर्जी ( चाय वाला ) : ५ रुपया !

वपुल दा ने दस रूपये का नोट चाय वाले की तरफ बढ़ाते हुआ कहा , आज मेरे नए बंधू का भी पैसा मैं दूंगा !

पुलकित औपचारिक भी मना नहीं कर सका !

विपुल दा ने पुलकित के सर पर हाथ रखते हुआ पुछा : बंधू नाम तो बताइये , मुझे भी अपडेट रहने की आदत है !

पुलकित ने मुस्कुराते हुआ कहा : पुलकित घोष ! और आपका नाम दादा ?

विपुल दा बोले :  विपुल नाम है मेरा !

पुलकित ने पुछा : सरनमे ?

विपुल , कुछ कल की मुलाक़ात के लिए रखते है ! मिलना ज़रूर  .

हाथ हिलाते हुए विपुल दा आगे बढ़ गए, पुलकित ने कंधे पर रखे बैकपैक को अपनी जांघो पर रखा और चायवाले से पुछा , ये कौन हैं बेनर्जी दा ?  कहाँ रहते हैं ?

चायवाला : बाबू ज़्यादा तो मैं भी नहीं जानता किन्तु , बड़ी चाय कंपनी में काम करते थे ! बहुत बड़े आदमी है ! सुना है परिवार भी है किन्तु देखा नहीं मैंने कभी ! वो अगली गली में सुन्दरपड़ा के कोने के मकान की दूसरी मंजिल पर रहते है ! अपना मकान है ! सुबह शाम आ जाते है मेरे पास चाय पीने के लिए ! मुझे बहुत कुछ सिखाया इन्होने की चाय कैसे पकाते हैं , चाय कंपनी में थे ना !

अच्छा बेनर्जी दा चलता हूँ , शाम को मौका  मिला तो आऊंगा !

और पुलकित बढ़ चला सरकारी अनाथालय की तरफ अपनी पहचान तलाशने !

कोथाए छिलेन बाबू ? दरवाज़े पर घुसते ही वार्डन ने सवाल किया !

पुलकित : चाय पीने लगा था , इस लिए देरी हुई !

वार्डेन : ठीक अच्छे, तडातडी आशो , खेये नाओ !

पुलकित : आश्चि !

अगले दिन फिर से उसी चाय की दुकान पर दोनों मिले !

और पुलकित कैसे हो ? चाय का घूँट भरते हुए विपुल दा ने पुछा !

अच्छा हूँ विपुल दा ! पुलकित ने सधा सा उत्तर दिया !

पुलकित का उत्तर  सुनकर चायवाले बनर्जी और विपुल दा एक दूसरे की और देखा और समझ गए कुछ सामान्य नहीं है !

बनर्जी ने कुल्हड़ में इलायची और अदरक वाली चाय पुलकित की तरफ़ बढ़ा दी !

पुलकित की आँखें डबडबाई सी थीं , बस कोई  पूछे और छलक जाएँ !

क्या हुआ बंधू ? विपुल  दा   पूछ लिया !

      रूंधे गले से कुछ आवाज़ और आँखों से पानी बहता हुआ पुलकित लिपट गया विपुल दा से , चाय का कुल्लहड बनर्जी ने थाम लिया और पुलकित को विपुल दा ने !

दो ,तीन ,चार ,पाँच मिनट पुलकित लिपटा हुआ रोता रहा ! जैसे कोई सागर अचानक कहीं से बह निकले किनारों को तोड़ते हुए !

दोनों संभले !

मुझे बताओ  क्या बात है ! - विपुल दा ने पुछा !

बस याद आ गया  की कोई नहीं है मेरे आगे और पीछे ! पुलकित बोला !

अरे बस इतनी सी बात ! विपुल दा पुलकित के माथे को अपने कंधे से सीधा करते हुए बोले !

लो चाय पियो और आंखे साफ़ करो ! विपुल दा ने अपनी बात पूरी की !

बनर्जी को दस रूपये का नोट देते हुए विपुल दा पुलकित को उठाते हुए अपने घर की और चल पड़े पुलकित का हाथ थामे !

आओ बैठो यहाँ ! आराम कुर्सी की और इशारा करते हुए विपुल दा ने कहा !

नहीं आप बैठिये ! पुलकित बोला !

अच्छा ठीक है मैं बैठता हूँ , तुम ज़रा वो रुमाल मुझे दे दो और बैठ जाओ ! विपुल दा बोले !

अब बताओ क्या बात है , तुम क्यो परेशान हो ? विपुल दा  बोले !

    पुलकित  कुछ देर तक ऐसे ही बैठा रहा , स्टूल के कोने को अपने उलटे हाथ के अंगूठे से दबाते हुए  , शांत ! किन्तु उसकी आँखों से आंसू बहते जाते थे जो बूँद बूँद होकर उसके गालों से होते हुए अखबार पर टपक रहे थे !

विपुल दा बोले - कुछ बताओगे की क्या हुआ है ?

पुलकित ने अपने को संभालते हुए कहा - विपुल दा मुझे जाना होगा यहाँ से , आप सब से दूर बहुत दूर !

कहाँ जा रहे हो पुलकित ?  विपुल दा ने भरे गले से पुछा। 

मैंने टाटानगर के एक कॉलेज में अप्लाई किया था आगे की पढाई के लिए स्कालरशिप के साथ , वहाँ से कॉल आगयी है ! पुलकित बोला। 

अरे ये तो खुश होने वाली बात है और तुम रोते हो।  विपुल दा चायवाले बनर्जी को देखते हुए बोले। 

पर वहीँ से कैंपस सिलेक्शन हो गया तो , नौकरी भी लग जाएगी और ये ज़रूरी हो नहीं नौकरी कोलकत्ता में ही मिले , तब कहाँ मिलोगे आप दोनों ? पुलकित ने रोआँसे गले से कहा अपनी नज़रें झुका के !

         वपुल दा ने उठ के पुलकित को अपने से चिपका लिया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोले।  आगे बढ़ने का ही नाम ज़िन्दगी है बेटा और हम कहाँ जाते है  यहीं मिलेंगे जब तुम बाबूजी बन कर लौटोगे , क्यों बनर्जी ?

         बनर्जी चायवाला तब तक चाय बना चूका तक और दो कुल्हड़ उनकी और बढ़ाते हुए बोला - चाय लीजिये और आज मठरी भी खाना होगा किन्तु पैसा नहीं लगेगा  , मेरी तरफ से छोटा पार्टी।

   भर्राई आँखों से विपुल और पुलकित ने चाय के कुल्हड़ पकड़ लिए , माहौल खुशनुमा हो चूका था।  हलकी बारिश की फुहार आने लगी थी  / कच्चे कोयले के धुएं की महक ने विपुल दा और पुलकित को दूर होने के लिए तैयार कर दिया था। 

हावड़ा रेलवे स्टेशन पर विपुल दा ने पुलकित को ट्रेन में टाटा जाने के लिए बैठा दिया  जैसे एक पिता विदा करता है  . कुछ समझाते हुए , ध्यान से जाना , पहुंच कर ख़बर करना , खाते पीते रहना , ठंडक में ज़यादा देर तक बहार मत रहना वगैरह वगैरह। 

समय अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता गया , पुलकित पढता गया , बढ़ता गया साल दर साल , साल दर साल। 

कॉलेज में जॉब के लिए कैंपस आर्गनाइज्ड था , पुलकित ने भी रजिस्ट्रशन किया था / 

दार्जीलिंग से कुछ लोग आये थे किसी बड़ी चाय की कंपनी से, उन्हें तलाश थी एक " टी टेस्टर " की  . 

पुलकित ने कुछ सोचा और दार्जिलिंग के लिए हामी भर दी !

            समय बीतता रहा और पुलकित बड़ा होता गया  , एक बड़ा अधिकारी , एक सफल टी टेस्टर जिसने जीवन में ना जाने कियाने स्वाद चखे थे , अनाथ होने का , अकेले होने का , हर पल कमियों का , अच्छे दोस्तों का , समझोतो का , विपुल दा के साथ का और बनर्जी चायवाले की अदरकवाली चाय का और ना जाने कितने ही स्वाद जिनकी उनको याद भी नहीं।  

वैसे तो दार्जलिंग से कोलकत्ता आता जाता रहता था पुलकित किन्तु आधिकारिक यात्रा पर , सुबह आना और शाम को वापस पर उस दिन उसे पिली टैक्सी वाले से कहा - दादा आज एयरपोर्ट नहीं सरकारी अनाथालय चलिए किछु काज आछे.

किंतु देरी होये जबा बाबू , आपनार फ्लाइट मिस होये जाबे बोलो तो - टैक्सी वाला बोला  . 

ना आजके आमा के जेते होबे , खूब देरी होये गयेछे - पुलकित बोला अपने रुमाल से डबडबाई आखों को पोंछते हुए। 

टैक्सी वाला ख़ामोशी से अनाथालय की और चल दिया !

अनाथालय वैसा था   ... कुछ नए पुलकित खेलते हुए दिखे पुलकित को. 

टैक्सी को वहीँ रोक कर पुलकित कुछ ढूंढ रहा था , इधर उधर बेचैनी से देखता हुआ पर वो दोनों ही नहीं दिखाई दे रहे थे   - वो चाय की गुमटी जहाँ वो आता था अपने विपुल दा के पास  !

कोई था दूर जो बड़े हो चुके पुलकित को देख रहा था बैचैन !

क्या बाबू बहुत बड़े हो गए हो - किसी ने पुलकित को पीछे से सहलाते हुए कहा वैसे ही जैसे विपुल दा प्यार करते थे  . 

अनुभवों की झुर्रियों के साथ नीली पाड़ वाली सफ़ेद सदी में दादी माँ खड़ी थी पुलकित के पीछे , ये वही थीं जिनसे बनर्जी चाय वाला अख़बार लेता था और पुलकित के साथ विपुल दा मिटटी के कुल्हड़ में चाय पीते हुए उसको पढ़ते थे  .. 

माँ ओ दो जनि कोथाये आछें - पुलकित ने दादी माँ से पुछा   . 

वो दोनो अब नहीं हैं  इस दुनिया में  !

विपुल दा कुछ दिन पहले ही चले गए ! उनका मकान सरकार के पास है तुम्हारे नाम से  ... 

एक किताब है जो मेरे पास है जो उन्होंने मुझे दी थी   .. ऐशो तुमाके दिए दिछि !

दादी माँ ने एक किताब पुलकित के हाथो में रखी जो विपुल दा ने लिखी थी  शीर्षक था " टी टेस्टर " जिसमे कुछ पन्ने पुलकित के नाम भी थे  .. 

शाम ढल रही थी , खड़खड़ करती ट्राम पुलकित से पास से गुजरी और विटोरिया मेमोरियल की सफ़ेद मीनारों से डूबता हुआ सूरज कल आऊंगा कहता हुआ जा रहा था। . 

पीली टैक्सी में ड्राइवर ने गियर बदला और चल पड़ा   ....पुलकित विपुल दा की किताब को पृष्ट पृष्ठ पढ़ता जा रहा था   .... 

एक कहानी : टी टेस्टर 

:: मनीष सिंह ::













   


















 

Saturday, February 11, 2017

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

" बेटियाँ गिलहरियों सी "

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फ़ुदकती फ़िरती ,
गालियारों में,
आँगन में,
खिलखिलाती , मुस्कुराती !

हथेलियों पर,
चित्र उकेरती,
उम्मीदों के,
आशाओं के, जीवन के !
दो हाथो से सहेजती ,
बिख़रे कपडे,
बेतरतीब बर्तन,
और खिलौने !

बेटियाँ गिलहरियों सी,
फुदकती फिरती ,
अपनी स्कूल ड्रेस में,
पहले प्राइज में,
पहले सर्टिफिकेट में,
पिता के गोद में,
भर देती हैं,
अनमोल खजाना ,
उम्रभर के लिए !

एक दिन,
शादी के जोड़े में,
सजी  उम्मीदों सी,
चली जाती है,
फुदकने , खिलखिलाने ,
किसी और गलियारे ,
किसी और आँगन में,
फिर से ,
लौटती है , यादों की ,
गिलहरियां बन कर,
बिखरे बर्तोनो में,
चादर की सलवटों में,
और खिलौने में,
पिता के घर !

बेटियाँ गिलहरीयों  सी !!

                                      :: मनीष सिंह ::




 

Wednesday, December 14, 2016

निर्भया .... वो तुम ही थी .... !!

निर्भया   .... वो तुम ही थी  .... !!
दिल्ली की सड़कों पर !!
                
नाजाने कितना मोम , पिघला ,
दिल्ली की सड़कों पर,
न्याय दिलाने का आक्रोश, पिघला ,
दिल्ली की सड़कों पर,
तंत्र के विद्रोह में , हम सब उठे, बैठे,घूमे ,
दिल्ली की सड़कों पर,
तखितयां लिए , ढपलियाँ लिए,
खुद को जगाया ,
दिल्ली की सड़कों पर !

कल के बाद ,
फिर एक बरस बीतेगा,
तुम, याद आओगी,
दिल्ली की सड़कों पर ,
हम अब , भी घुमते हैं,
सहमे से, खबरों से,
कहीं फिर , कोई तारिख,
१६ दिसंबर न हो जाये,
दिल्ली की सड़कों पर

हमें निर्भय और ,एकजुट कर देती हो ,
कम से कम ,एक दिन तो ,
दिल्ली की सड़कों पर
निर्भया वो तुम ही थी,
निर्भया ,वो तुम ही हो.........

हम मोम सरीख़े ,
पिघलते हैं आक्रोश की तपिश से ,
रात भर ,
किन्तु, भोर तक ज़िम्मेदारियाँ बंटाते हुए,
फिर मोम हो जाते हैं ,
दिल्ली की सड़कों पर !!
                                  :: मनीष सिंह ::


             

Saturday, November 26, 2016

अनुभव जैसे शंख ध्वनि ,
        मन  एकांकी होने  पर !           
             जिज्ञासाएँ तितलियाँ,
                     तन हो जाता यायावर !!
इसका , उसका साथ रहे,
     आशाओं के जमघट में ,           
         अपनों का घट रीते न ,
            पलकों के नम होने से  !

अंगारों सी उम्मीदे ,
    रिश्ते , बर्फ खिलोनो से !
   
                                              :: मनीष सिंह ::
          

            
     
           



 

Thursday, April 30, 2015

आ गई है " काश्वी " !!

श्वेत पत्रों पर चमकती,
    आस की किरणों सरीखी !
         मौन शब्दों की निशा में ,
             गुनगुनाते जुगनुओं सी !!
                रिश्तों के इस शांत जल में,
                      बन  तरंगें  बन्धनों  की ,
                           भर  रही  है  ज़िन्दगी ,
                                 आ गई है   " काश्वी "  !!

काश्वी = Shining, Beautiful"

Wednesday, October 22, 2014

एक दिन !

आस के दीपक,
सिन्दूरी से,
जल कर,
ढूंढ लेंगे मार्ग,
किरणें बन,
ख्याति का,
सबलता का !
एक दिन !

आइयें,
बनकर जलें 
दीपक, 
दीपोत्सव पर,
जो , शेष कर दे,
भेद एवं अहंकार,
प्रबलता से,
एक दिन !

दीपावली की शुभकामनाएँ !

::~~ :: मनीष सिंह 


Saturday, October 18, 2014

एक कहानी : पूर्णिमा !!

           बाहर हल्की बूंदा बांदी थी !  रात ९ बजकर २५ मिनट की फ्रंटियर मेल गुजर चुकी थी ! स्टेशन से कुछ पहले पड़ने वाले रेलवे फाटक के गेटमैन " रमेश भाई " अपने केबिन में निवाड़ की कुर्सी पर बैठे लॉग बुक में एन्ट्री कर रहे थे ! 

रमेश भाई चाय मंगवाऊ या छत्तीसग़ढ एक्सप्रेस के बाद पियेंगे ? 

केबिन के बाहर खड़े फल वाले आदिल ने पुछा !
लॉग बुक में एंट्री कर के पेन को कान के ऊपर खोंसते हुए रमेश भाई बोले :  आदिल , आज अभी ही मंगा लो !

ठीक है कहते हुए आदिल ने पास के चाय वाले को दो चाय का इशारा किया !

       छोटे से केबिन के बाहर दो चार सदाबहार के पौधे ! जिनपर गहरे गुलाबी रंग के फूल ! एक तुलसी का पौधा ! जिस पर रोज़ घर से लाये ताम्बे के लोटे से रमेश भाई जल चढ़ाते थे ! हलकी बारिश की फुहारों से भीग चुके थे और ट्यूबलाइट की रौशनी से चमक रहे थे !
रमेश भाई : आदिल ये तुलसी का गमला ज़रा अंदर सरका दो , बारिश धीरे धीरे तेज़ हो रही है मैं फाटक बंद कर रहा हूँ , छत्तीसगढ़ का सिग्नल मिल गया है ! 

आदिल ने झिझकते हुए तुलसी के गमले को केबिन के भीतर रखा और बोला :

आदिल : आइये चाय पीते हैं !
रमेश  भाई : हाँ लाओ मुझे यही पकड़ा दो मेरा गिलास , मैं हरी झंडी लिए यहीं खड़ा हूँ , इसके गुजरने तक !
धधड़ाती हुई छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस गुजर गयी ! पौधों से बूँदें छिटक के ज़मीन पर बिखर गयी !
रमेश भाई ने फाटक खोल कर लॉग बुक में एंट्री करते हुए चाय की आखिरी घूँट ली और गिलास खिड़की पर बाहर की तरफ रख दिया !
आदिल : आज आप कुछ अलग लग रहे हैं आप ! क्या ख़ास है आज रमेश भाई ?
आदिल साल में एक दिन मैं ऐसे ही खुश रहता हूँ ! रमेश भाई ने तुलसी का गमला फिर बाहर रखते हुए जवाब दिया !
आदिल : साल में एक दिन ? वो कैसे ?
रमेश भाई : आओ ज़रा ये लकड़ी का टेबल बाहर रखवाओ , बारिश काम हो चली , यहीं बैठ कर बताता हूँ !

आदिल : ठीक है फिर दूकान बढ़ा कर बैठते हैं !
        फाटक ये उस पार यादव जी अपनी पान की दूकान बढ़ा कर चलने की तैयारी में थे ! आदिल भी फलों को करीने से सजाने में लगा था ! एस टी डी की विकलांग द्वारा संचालित दूकान कब की बंद हो चुकी थे ! दिन भर बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे पूरा संसार चहल कदमी करता दिखाई देता है और रात में सिर्फ फाटक पर रमेश भाई और पड़ोस की कालोनी के घुमते चौकीदार !
       लीजिये रमेश भाई आपके पान ! यादव जी ने अपनी सायकिल से उतरते हुए ४ जोड़ी पान रमेश भाई की तरफ बढ़ा दिए और राम राम कहते हुए घर की तरफ बढ़ गए !
        लीजिये रमेश भाई ये सेब खाइये आखिरी दो बचा रखे थे , यहीं मैं अपने और आपके लिए ले आया ! आदिल अपनी दूकान बंद कर के केबिन के करीब रखे लकड़ी के टेबल पर बैठ गया !
रमेश भाई भी निवाड़ की कुर्सी पर बैठ गए !
आदिल : हाँ , अब बताइये !
रमेश भाई ने केबिन के भीतर रखे एक बड़े से पैकेट को आदिल की तरफ बढ़ाते हुए कहा : लो , इसे खोलो तो !
आदिल : अरे , इसमें क्या है ?
रमेश भाई : तुम मेरी आज की ख़ुशी का राज जानना चाह रहे थे ना , तो खोलो इसे फिर बात करते हैं !

        आधी रात हो चली थी ! अब अगली ट्रेन कोई दो बजे के करीब गुजरने वाली थी ! आदिल और रमेश भाई हलकी बारिश से भीगी मिटटी की सौंधी खुशबू में करीब की मज़ार पर आने जाने वाले इक्का दुक्का नौकरीपेशा ज़ायरीन की इबादत से जलाई अगरबत्तियों की महक के बीच ख़ुशी का राज तलाश रहे थे !

       आदिल ने बारी बारी से एक एक रीबन खोला और बड़े से पैकेट के अंदर से नायाब और बहुत महंगा, शानदार पश्मीना का दुशाला निकाला ! आश्चर्य से आदिल कुछ बोल ही नहीं पा रहा था ऐसा दुशाला उसने कश्मीर में देखा था जब वो दो साल पहले अपनी बुआ के घर गया था  ! दुशाले के नीचे करीने से महंगे सूखे मेवे सजे थे और साथ में कुछ रुपयों के लिफाफे के साथ एक चिट्ठी रखी थी , रमेश भाई के नाम ,

जिसपर लिखा था :

" दिवाली मुबारक़ हो दोस्त , साँसें रहीं तो अगली  " शरद पूर्णिमा " , फिर मिलेंगे ! "

आदिल एक हाथ में दुशाला , अपनी जांघों पर मेवों का डब्बा और दूसरे हाथ में लिफाफा लिए चिट्ठी पढता हुआ रमेश भाई की तरफ देख रहा था !

रमेश भाई गुम-सुम आँखों में अजीब से चमक लिए अतीत में जा चुके थे और बुदबुदा रहे थे :

           आज से कोई २० - २२ साल पहले मैंने इण्टर का एग्जाम " रौशन " के साथ दिया था ! आखिरी एग्जाम के दिन बहुत खुश थे हम दोनों ! आर से शुरू होने वाले नामो के कारण बचपन से ही साथ साथ एक ही बेंच पर बैठते थे और दोस्त थे ! हम दोनों के पिता रेलवे में थे तो हम रहते भी एक ही कॉलोनी में थे ! एग्जाम दे कर  घर पहुंचे तो मेरे घर के सामने भीड़ जमा थी ! मेरी धड़कन धीरे धीरे तेज़ होती जाती थी रौशन ने मुझे कस के पकड़ रखा था ! मेरे पिता का एक्सीडेंट हुआ था और वो नहीं रहे !

          में ही सबसे बड़ा था घर में ! दो छोटे भाई और एक बहन की ज़िम्मेदारी थी ! रौशन के पिता और दूसरे स्टाफ की मदद से मुझे पापा की जगह रेलवे में नौकरी मिल गयी पहले अस्सिटेंस और फिर गेटमेन की ! मुझे इंजीनियर बनना था लेकिन अगर मैं ये गेटमेन की नौकरी नहीं करता तो हम सब सड़क पर आ जाते ! घर रेलवे ले लेती और माँ को काम करना पड़ता ! अब घर भी वही पापा वाला हमारे पास है और छोटे भाई बहन पढ़ लिख गए ! सब अपने अपने घर खुश हैं ! मैंने शादी नहीं करी ! माँ मेरे ही साथ रहती है , एक नौकरानी है जो उनकी  ज़रूरतों का ख्याल रखती है ! भाई बहन आते हैं कभी कभी मिलने मुझे से लेकिन मुझे पूरे साल इंतज़ार रहता है कार्तिक की पूर्णिमा का जब रौशन मुझ से मिलने आता है , इस रेलवे फाटक पर !

रात गहराती जा रही थी रमेश भाई यादों और वर्तमान के गलियारों में घूम रहे थे  !

दोबारा होती बारिश के झोंके ने आदिल और रमेश भाई को टेबल थोड़ा भीतर सरकाने को मजबूर किया !

रमेश भाई ठण्ड बढ़ रही है मैं चाय बनता हूँ और आप ये दोशाला ओढिये !

अहमदाबाद मेल के गुज़र जाने के बाद लॉग बुक की एंट्री खत्म करी रमेश भाई ने और फिर खो गए अतीत में !

          वो रोज़ मुझ से मिलने आता था पहले कॉलेज जाते - आते समय और फिर जब उसने जज की परीक्षा पास कर ली फिर भी आता था ! ट्रेनिंग के बाद उसकी पोस्टिंग यहाँ से २०० मील दूर दूसरे जिले में हुई ! वो फिर भी आता  मिलने हफ्ते दो हफ्ते में एक बार ! ये सिलसिला कुछ १० साल ठीक ठाक चला और फिर बाद में बंद हो गया ! अगले ७ साल तक उसकी कोई खबर नहीं ! बड़ा इंसान था ! घर में सब ठीक ठाक था ! ना कभी मैंने उसके रहने का ठिकाना पुछा और ना कभी उसने बताया पर हम मिलते थे ! पर मेरा घर तो यही था जो उसे पता था !
             सुबह के ३ बज चुके थे ! आदिल की आँखों की नींद रमेश भाई के शब्दों के उडनखटोलों पर तैर रही थी ! हलके से इत्र की खुशबू ने रमेश भाई को गहरी सांस लेने को मजबूर किया ! करीब के हनुमान मंदिर के चौखट को धोने वाला पंडित जी का बेटा नल में पाइप लगाने की तैयारी कर रहा था ! इक्का दुक्का भारी सामान लिए ट्रक करीब के फलिओवेर से गुजर जाते थे !

             जब सात सालों तक वो नहीं आया मुझ से मिलने तो मैंने समझा की अब अंतर समझ लेना होगा मुझे उसमे  और खुद में जिस के कारण उसने दूरियाँ बना ली हैं फिर मैं अपने काम में अलग रहा ! छोटे भाइयों के बच्चे , बहन की शादी और माँ की सेहत और उनका ख्याल बस ये सब ही जीवन रह गया ! आपने कहने को कोई था तो वो माँ या फिर रौशन जिसने हर समय मेरा साथ दिया , हौसला दिया ! कभी मन खट्टा हुआ ये सोच कर की जीवन में क्या - क्या करने की चाहत थी और मैं रेलवे के फाटक पर काम पढ़ा लिखा गेटमैन बन कर रह गया !

       पिछले से पिछले साल मैं  इसी उधेड़बुन और खुद की किस्मत पर पर दिनभर सोचने के बाद स्टेशन पर रुकी फरंटियर मेल के गुजरने का इंतज़ार कर रहा था की आखिरी डब्बे के दरवाज़े से किसी ने पुकारा :

रमेश , रमेश !

रमेश भाई : कौन हो भाई ?

आवाज़े आई : अरे , मैं रौशन हूँ !

रमेश भाई : ओहह तुम इतने दिनों बाद !  नीचे आ जाओ  !

रौशन : नहीं , यहाँ कम देर का स्टॉपेज  है , अगले साल पूर्णिमा आऊंगा फिर मिलूंगा ! हर साल मैं अमृतसर अपनी बेटी के घर जाता हूँ शरद पूर्णिमा पर वहां से हम सब हरिद्धार गंगास्नान करने जाते हैं !

रमेश भाई : ठीक है , मैं इंतज़ार करूंगा दोस्त !

         फ्रंटियर मेल लम्बी सीटी देती हुई आगे बढ़ गयी लेकिन रमेश भाई का जीवन वहीँ घूमता रहा घर से फाटक और फिर घर अगले साल आने वाली " शरद पूर्णिमा " के लिए !

          अगले साल फिर वो रात आ गयी ! रौशन अपने कम्पार्टमेंट से ट्रैन के अंदर ही अंदर लास्ट कोच तक आ गए और इधर रमेश भाई भी उनसे मिलने को खड़े थे हाथों में हरी झंडी लिए !

         रमेश भाई ने चीनी मिटटी की बर्नी में कटहल का आचार रौशन की तरफ बढ़ा दिया माँ के संदेशे के साथ और रौशन ने एक गुलाबी पैकेट उनकी तरफ बढ़ा दिया गले लगाते हुए और वादा किया अगली पूर्णिमा फिर मिलेंगे !

पिछली रात भी फरंटियर मेल रुकी !

दो दोस्त मिले और दूर हो गए अगली शरद पूर्णिमा तक !

           सुबह के पांच बजने को थे ! आदिल की आँखों में नींद का नमो निशाँ नहीं था ! रमेश भाई और आदिल ने पूरी रात गुज़ार दी थी उस चाँदनी रात में ! 

           सुबह पांच चालीस की पसेंजेर ट्रेन की सवारियां प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने लगी थी !

         सवेरे से ही चाँद पूरा दिखाई दे रहा था और दिखाई दे रही थी रमेश भाई को अपने दोस्त की तरक्की और खुद का रुका हुआ समय जो रोज़ रात को फाटक पर जागता था फिर दिन में सो जाता था , सिर्फ और सिर्फ अपनेपन को तलाश में जो खत्म होती थी हर साल पूर्णिमा की रात फरंटियर मेल के आने और चले जाने पर  !



एक कहानी : " पूर्णिमा " 

:: मनीष सिंह ::