" खुरदरे हाथों से सिकी रोटियां,
बारीक टूटते पठार ,
पसीने का चिकनापन ,
आसान कर देते हैं,
जीवित रहना,
ये सोच कर ...
कुछ बाकी है ...!
सो जाता है , वो रोज़
उन्ही हाथो का सिरहाना
बना कर..
पसीना पोछता हुआ ...
सिकी रोटियां पड़ी रहती हैं,
आस में , चिकनाहट की !!
:::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::
No comments:
Post a Comment