जैसे ,गरम कुल्हहड़ के किनारों से
चिपकते होठ !
आस्था की गोंद से चिपकती,
अथाह भीड़ !
आनंदित, समर्पित आत्माएं ,
चलती रहती हैं ,
साँसों के रुकने तक !
हर बार व्यवस्थाओं की अग्नि में,
आहुति ले कर ,
जीवित रहता है ;
आस्था का हवनकुंड !
जिसे , पुनः शुद्ध कर देते हैं ,
ऐसे कुंभ !!
:::::::::: मनीष सिंह ::::::::::::
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