हस्ताक्षर करती कपास,
भीग कर,
वजनी लगती है !
जैसे दीख जाती है,
मारीचिका,
प्रगाढ़ - रिश्तों की ;
उत्सवों , समारोहों में !!
समयांतर में सूख कर,
पुनः , सफ़र पर,
निकल पड़ते हैं,
कपास से,
हम और आप ,
यथार्थ के साथ !!
::::::::::::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::::::::
भीग कर,
वजनी लगती है !
जैसे दीख जाती है,
मारीचिका,
प्रगाढ़ - रिश्तों की ;
उत्सवों , समारोहों में !!
समयांतर में सूख कर,
पुनः , सफ़र पर,
निकल पड़ते हैं,
कपास से,
हम और आप ,
यथार्थ के साथ !!
::::::::::::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::::::::
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