Friday, February 15, 2013

मारीचिका, प्रगाढ़ - रिश्तों की !!

हस्ताक्षर करती कपास,


भीग कर,

वजनी लगती है !

जैसे दीख जाती है,

मारीचिका,

प्रगाढ़ - रिश्तों की ;

उत्सवों , समारोहों में !!

समयांतर में सूख कर,

पुनः , सफ़र पर,

निकल पड़ते हैं,

कपास से,

हम और आप ,

यथार्थ के साथ !!

::::::::::::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::::::::

No comments:

Post a Comment