" गौरैया "
रेशमी धागों सी,
लहराती, फुदकती!
आंगन में,
दीवार पर,
पंखे के खोल में,
रोशनदान से,
उतरती,
कहती रहती,
जीवन तभी है,
जब समिप्प्य हो,
स्नेह हो,
सहयोग हो,
आदर हो !
अब,कम आती है,
थाली से,चावल
सब्जी, दाल,
चुगने को,
दूर हो गयी वो !
दीवारों ने कम
कर दिया,
आपसी सौहाद्र
एक परिवार में !!

No comments:
Post a Comment