Thursday, March 21, 2013

... आग्रह करते दिन, परिपक्कव् होती रातें !!

कितनी भोरें,
कितनी शामें,
कितनी रातें,
कितने दिन,
और साथ,
     रहेंगी !!

गुल्लक टूटी,
गुडिया छूटी,
संभव मन,
संबंधों में बदले !
बचपन से,
आग्रह करते दिन,
परिपक्कव् होती रातें,
सतत,
परिपूर्ण भोर,
निर्मित करती हैं !!


                                 <>< Manish Singh ><>

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