... आग्रह करते दिन, परिपक्कव् होती रातें !!
कितनी भोरें,
कितनी शामें,
कितनी रातें,
कितने दिन,
और साथ,
रहेंगी !!
गुल्लक टूटी,
गुडिया छूटी,
संभव मन,
संबंधों में बदले !
बचपन से,
आग्रह करते दिन,
परिपक्कव् होती रातें,
सतत,
परिपूर्ण भोर,
निर्मित करती हैं !!
<>< Manish Singh ><>
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