Thursday, February 28, 2013

...आँचल के किनारे , बंधती गांठें,

आँचल के किनारे,
बंधती गांठें,,
समृद्धि की,
संबंधों की,
भावों की,
आभावों की,
अपने हल,
अपने सवालों की !

जीवन अनुभव के,
तरल द्रव्य में,
घुलती जाती है,
सारी सघनता,
भावों की ,
आभावों में,
खुलती जाती हैं,
गांठे सभी !

जीवन सिमटता नहीं,
बहता रहता है ;
अतः बहिये ,
बंधिय  नहीं !!  
<>< मनीष सिंह ><>

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