Wednesday, February 27, 2013

....आगंतुक चले गए !

आगंतुक चले गए,
शाम ,रात भी, 
लौट गयी  !
राख, बिलकुल,
शांत और  ठंडी है,
जो जलती रही,
पूरी उम्र ,
भूख की आग,
बुझने तक !!

जलती-बुझती,
नई उमीदें,
उम्मीद से हैं !
अपनत्व भूला  कर,
दिन में,
शाम को ,
रात के साथ ,
स्वयं के लिए ही,
चलते  हैं वो,
जो आगंतुक थे !! 
<><>< मनीष सिंह ><><>

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