....आगंतुक चले गए !
आगंतुक चले गए,
शाम ,रात भी,
लौट गयी !
राख, बिलकुल,
शांत और ठंडी है,
जो जलती रही,
पूरी उम्र ,
भूख की आग,
बुझने तक !!
जलती-बुझती,
नई उमीदें,
उम्मीद से हैं !
अपनत्व भूला कर,
दिन में,
शाम को ,
रात के साथ ,
स्वयं के लिए ही,
चलते हैं वो,
जो आगंतुक थे !!
<><>< मनीष सिंह ><><>
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