राख होने को है अब ये चूल्हे की लौ ,
द्वार की कुण्डियाँ भी स्थिर हो चलीं !,
नल के बूंदों के स्वर भी शिथिल हो गए,
कम्पनों को भुला पुल हुआ मलमली !!
नयन तारों के गाँव में बसने चले ,
शोर थमने लगा , रात बढ़ने लगी ,
आओ तुम हम भी राहों को आसान करें ,
खुद को गुम कर चले , और खो जाएँ ,
.......................... धीरे धीरे सो जाएँ !!
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