" जब मैं बी कॉम कर रहा था उस वक़्त मेरा एक दोस्त रुड़की से अभियांत्रिकी की पढ़ाई कर रहा था.... " उन दिनों मोबाइल फोन नही थे ...! हम उन दिनों एक दुसरे को पोस्ट कार्ड लिखा करते थे ! अनोखा समय था ... ! रोज़ एक दुसरे को आशा होती थे की कोई कार्ड आया हो ...! "
वो इन्तेजार और उसका जव्वाब देने की जल्दी ... बस बयान नहीं किये जा सकते ! हम घंटो बैठ कर के सोचते रहते की १० पंक्तियों मैं काया कुछ लिख दें की एक महीने का काम चल जाए !!
वो सब अनोखा था ... आज कल एस एम् एस और फ़ोन कॉल से काम चल जाता है .... हां काम ही चलता है ......
चिट्ठियां जहाँ से चली और उसके अपने गंतव्य तक पहुँचने के बीच के समय का आनंद ... जी आनंद आज कल के एस एम् एस मैं नहीं ... कुछ और है जो कल नहीं था... समय है ...और समय के साथ चलना चाहिए .... उसको पकड़ने को कोशिश हमेशा आपको पीछे ही रखती है ... ! समय के साथ चलिए ...! पत्र के लिखने का आनंद तो अपनी डायरी लिखेने से भी प्राप्त किया जा सकता है !!..
" चिट्ठी लिखना और उसको गंभीरता से पढना दोनों ही आसान नहीं ! "
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