Saturday, November 12, 2011

... मन कनेर के फूल सा, रंग हैं पर बिन सुगंध !

" जब चनारों पर  उमीदों  ने घर कर लिए ,
       मन कनेर के फूल सा, रंग हैं पर बिन सुगंध ! "

" उचाइयां ठीक है,  खुद के बूते की हों ,
     इक सहारे लिया तो , विकलांग  ही हुए !"
   

Thursday, November 3, 2011

...................किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है !

" किसी फास्टफूड के बड़े से होर्डिंग के नीचे खड़े होकर देखिये ...हाँ बगल मैं वो फास्ट फ़ूड की शॉप भी होनी चाहिए ....आप को कई तरह के नज़ारे देखने को मिलेंगे ...कुछ का शाब्दिक चित्रण मैं करता हूँ शायद कभी आप भी इस से रूबरू हुए हों ....:

" कोलर उचे , चिपकी हुई जींस , गले के बटन ऊपर से २ खुले हुए, हाथ पर एक बड़े नंबर  वाली रिस्त वाटच , कानो मैं आईपॉड के एअर्फोंन और कुछ एक के हाथों मैं जल रही श्वेत दंडिका ( सिगरेट ) भी .... और एक सलोनी सी विभिन लिंग की साथी ... किसी ठन्डे पे पदार्थ का सेवन करते हुए पता नहीं किस भविष्य के सपनो को साकार करते हुए बात करते दिखाई दे जायंगे ....नै पीढ़ी है ये ...हाँ बहुत तेज़ है ... सम्बन्ध बस अपने मतलब के हिसाब से बनती है ... ! "

अब दुसरा दृश्य : इसे ही आगे बढ़ाते हैं .... एक के बाद एक कुछ न कुछ ख्य अजा रहा है ...और खर्च शायद २ से ३ हज़ार की ऊपर चला गया है पर कोई चिंता नहीं ... ज़िन्दगी का आनंद अधिक महत्त्व रखता है ...ना की पैसा .... कल किस को नसीब या सब ...आज ही सब का लुत्फ़ उठा लेना चाहिए ....तब अचानक एक फटे पुराने कपड़ो मैं दो छोटे छोटे बच्चे आ कर हार फेला देते हैं ... ये nayi pedhi जो समाज बदलने की बात करती है ....मैं से २० रूपये निकल कर देती है ...तभी दूसरा बोलता है ...२० रूपये दोगे ? ये वही लोग हैं जो अपने ऊपर २ से ३ हज़ार खर्च करते हुए ....तनिक भी नहीं सोचते और जिसमें ९९ रुपे का एक बर्गर आता है ...और २० रुपे देते वक़्त इतना सोचते हैं की देश के लिए प्लानिंग करने वाले मोंटेक सिंह भी इनको अपने साथ रखने के लिए सोचे !! "
   " भविष्य वर्तमान के गर्भ मैं पलता है....सही है , किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है ! " 

     

Wednesday, November 2, 2011

............. हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा !

" यही कोई १९८५ की बात होगी ,हाँ छोटा ही था ...उन दिनों छपे हुए पर्चे बांटने का चलन कुछ ज्यादा ही था ... और हम स्कूल से आने के बाद कोशिश करते थे की जितने ज्यादा से ज़यादा इसे पर्चे इकट्ठे कर सके ! "
  
       तपती दोपहर में मैं और मेरे कुछ साथी जिनमे से कुछ के नाम याद हैं .... राजे , बबलू और भी कुछ निकल पड़ते थे अपने इस बहुमूल्य और उत्साहित कम को अंजाम देने के लिए .... !
       जब तक कोई माइक पर आवाज नहीं आती थी पता नहीं चलता था की कोई रिक्शे पर पर्चे बाँट रहा है की नहीं ....और इस बीच हम एक और महत्वपूर्ण काम किया करते थे ...पड़ोस की आंटी जी के क्यारी मैं एक अमरुद का पेड़ था उस पर अमरुद तो कम ही लगा करते थे फिर भी आंटी जी को उसकी चिंता खूब रहती थी.... साथ मैं और भी बहुत से फल के पेड़ थे ...पर फल कम ही लगते थे उनपर.... हाँ एक वैज्ञानिक उपाय किया हुआ था उन्होंने अपने सब पेड़ पौधों को पानी देने का ..... वो अपने घर के अन्दर बनी पानी की हौदी से एक छोटा सा प्लास्टिक का पाइप निकल कर ज़मीन पर रख देती थीं , और उसको अपने मुह से खीच कर पानी का प्रभाव बना देती थी जिस से जब पानी बाहर आने लगता था ...और वो ज़मीन का मुहाना उनकी क्यारी पर खुलता था बस ....दिन भर पानी औंकी क्यारी मैं चलता रहता था ...और पेड़ सूखते नहीं थे .... अद्भुद !!
 खैर हम अपना महत्वपूर्ण काम काया करते थे पर्चे बटोरने से पहले ...." हम उनके अमरुद के पेड़ से कुछ पत्ते तोड़ कर उनपर नमक लगा कर पान की तरह खाया करते अनोखे आनंद की प्राप्ति ....क्या  आनंद मिलता होगा सच्चा पान खाने वालों को ....पैसा भी खर्च किया और थूक भी दिया .... और ये अनुभव तो अनोखा था ... पान का स्वाद , बिना पैसे का, उत्साह और वीरता का अनुभव , पूरा का पुर पान खा जाइए थूकना भी नहीं .... कहने का अर्थ ये की नुक्सान कही से भी नहीं ...सब पाना ही पाना है ....! 

     हाँ अब मुख्य बात करते हैं ....तो तपती दोपहर हो या सर्दी की सुबह सी लगने वाली दोपहर ... किसी माइक के आवाज सुनी नहीं की दौड़ पड़ते थे , जीतनी कोशिश कर सकते थे करते और ज़यादा से ज्यादा पर्चे इकठ्ठा कर लेने की ....और शाम को हम सब दोस्त गिनती करते की किस के पास कितने पर्चे हैं ....जिसके पास ज्यादा होते वो तो बस मत पूछिए .... राजा का दर्जा पा जाता था ...अगली शाम तक उसको सब सम्मान देते थे ...जैसे किंग को मिलता है ...घर पर बनी सब अच्छी अच्छी चीजें उसको दी जाती थी ..... असामान्य से दिन थे वो ...फिर नहीं आ सकते ....कोशिश भी करें तो भी ....! !

    "  छपे हुए पर्चे - आज हम खुद इनको किस तरह से देखते हैं ये कोई परभाषा देने की बात नहीं ....किन्तु उन दिनों ये ही पर्चे महत्वपूर्ण थे ....आप को कुछ विशेष दिखने के माध्यम थे ....अमरुद के पत्ते अनोखी अनुभूति देने मैं सक्षम थे किन्तु आज कोई मूल्य नहीं ....इन चीज़ों का एसा हम मान सकते हैं ..."       कुछ भी विशेष हम से है ...कुछ भी मूल्यवान हम से है ... हम और आप किसी भी वक़्त कुछ भी संभव कर सकते हैं, यादों को संजो कर रखिये ताकि वर्त्तमान की कोख मैं भविष्य उस गर्माहट को अनुभव करते हुए बढे और आकार ले  ...एक नवीन चेतना के साथ ...नवीन पीढ़ी के लिए ....! "

 " पल - पल विशेष है , हां हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा उसको भविष्य के लिए संजोती है , ताकि संभावित अनुकरण हो सके ! "

Friday, October 28, 2011

" पूर्वाग्रह ( Bias ) " की " तपिश ( Heat ) "

" किसी भी तरह के "" पूर्वाग्रह ""  की "" तपिश "" आप के कोमल और अनमोल विचारों एवं उनकी  अभिव्यक्ति को भंजित अथवा " नष्ट " कर देती है ! "

Thursday, October 27, 2011

अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........

   " आज वो दोपहर याद आ गयी जब मैं अपने स्कूल से पैदल खरखाई नदी के पुल को पार कर रहा था .... दुरी पर एक दूसरा पुल था ...जिस पर से रेलगाड़ी आया जाया करती थी , पर पिछली रात एक दुर्घटना हुई थी.... पुरुषोत्तम एक्सप्रेस को एक माल गाड़ी ने टक्कर मार दी थी ... भयानक मंजर था ... माल गाड़ी का इंजन पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के पिछले डब्बे के लगभग ऊपर की जा चढ़ा था ... बहुत लोगो की मौत और घायल होने का समाचार आया था .... ! "

      हाँ लेकिन मेरे और मेरे जैसे और कितने ही लोगों के लिए एक सामान्य सा दिन था.... ... स्कूल से छुट्टी के बाद मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ मदमस्त हो कर के वापस आ रहा था.... नदी पर पहुँच कर हम कुछ देर के लिए रुके और दुर्घटना को देखने लगे .... बचाव का काम चल रहा था .... कुछ जीवें अगर बच सकें तो बचा लिए जाए , प्रशाशन के प्राथमिकता ....!!
      नदी के किनारे किनारे खूब घने पेड़ थे.... और जंगल कहा जाये तो भी कोई बात नहीं .... हमें दर नहीं लगता था....क्यों की "छठ " के अवसर पर हम यहाँ आया करते थे ... .... पर आज कुछ अजीब सा वातावरण था... इस लिए हम जंगल मैं नहीं गए .... ! आदित्य पुर की तरफ नदी का पुल पार होते ही एक छोटी सी चाय वाले की दूकान थी...४ गुना ४ की... उसमे वो चाय और मठरी रखता था.... पर मुझे पसंद थे उसके गुलगुले ..... जो वो अक्सर बारिश के दिनों मैं बनता था ...और चार आने के ४ देता था..... लेकिन उन दिनों चार आने बमुश्किल मिलते थे .... !
             एक बार तो मुझे अपने एक ग्रुप फोटो को खरीदने के लिए ५ रुपे की ज़रुरत थे... पेसे जमा करने की आखरी तारीख पास थी और मुझे कोई उम्मीद नहीं की मुझे पैसे मामा जी या मामी जी देंगी.... हाँ पिता जी के देहांत के बाद मुझे मेरे मामा जी के घर रहना पड़ा था कुछ ५ साल.... तो मैंने अपने मामा जी के जेब से २० रुपे चुराए थे ५ - ५ के चार नोट.....जमा भी किये.... फोटो भी मिला ..और चोरी के जुर्म मैं खूब पिटाई भी हुई.... !

            आप क्या हैं ये आपके साथ बीते और किये गए व्यवहार पर भी निर्भर करता था.... साधन की बात बहुत बाद मैं आती है.... आप क्या चाहते हैं पहले ये नियत होना चाहिए ...और उसके लिए वातावरण , और वातावरण के लिए आप के बड़ों की पहेल ....और सब हो जाए तो साधन जुटाने की बात.... आती है.... !  हम अपने को दूसरों के लिए सही या गलत करते वक़्त ये भूल जाते हैं ...की दूसरा भी आप के ही तरह इंसान या सोच रखने वाला है...... बड़ों को ये चाहिए की यदि आप किसी भी तरह से छोटो के लिए ज़िम्मेदार हैं तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए ....झूठा आश्वाशन या निभाने के ढोंग की प्रकिया आप को ही उनकी नज़रों मैं छोटा कर देगी ....और आपके द्वारा बाद के वादे कोई मायने नहीं रखेंगे ....क्यों की जिस वक़्त बेल को सहारे की ज़रुरत थी आप नहीं थे और आज जब संभल गये तो अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........

समय पर लिया गया कोई भी निर्णय ......निर्णायक ही साबित होता है .... चाहे किसी भी सन्दर्भ मैं हो....फिर....हाथ पर हाथ रख कर कोई मंजिल नहीं मिला करती.... बस के तमगा मिलता है.... ये इंसान कभी कुछ गलत नहीं .......न ...न .न..... कुछ करता ही  नहीं !

..............याद रखना होता है !

रौशनी के उत्सव पर विशेष तजुर्बा - " रौशनी करने के लिए अंधेरों को अधिक प्रबलता से याद रखना होता है ! "

Sunday, October 23, 2011

एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! "

                 एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! " .... लोग दिवाली पर उल्लू की बलि दे कर के लक्ष्मी को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं ......की लक्ष्मी उनके पास आयेंगी !
     भाई लेकिन मेरे हिसाब से तो इस दिवाली पर कुछ उल्टा ही है .... उल्लुओं की मौज है ....!
कंपनी मैं जो लोग पुरे साल  उल्लू कहे जाते हैं .... बराबर का इन्क्रीमेंट पाते हैं ....
     पूरी क्लास मैं उल्लू कहे जाते हैं.... बस एक आरक्षण का कार्ड चलते हैं ... वोही सीट पाते हैं जिसके लिए दुसरे  जी जान लगाते  हैं .... उल्लू ...अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं ... दिवाली मानते हैं ...!

  भाई इस दिवाली उल्लू परेशानी मैं नहीं मौज मैं है ,,,,, और आरक्षण वाले तो पुरे साल ही मौज मैं होते हैं...और पुरे के पुरे घी मैं दुबे रहते हैं... इश्वर की ये तो माया है ... कहीं सिर्फ धुप तो कहीं छाया ही छाया है....  " उल्लू मौज मैं हैं भी , कभी भी ... कहीं भी ..... बे शक ! "