Wednesday, November 2, 2011

............. हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा !

" यही कोई १९८५ की बात होगी ,हाँ छोटा ही था ...उन दिनों छपे हुए पर्चे बांटने का चलन कुछ ज्यादा ही था ... और हम स्कूल से आने के बाद कोशिश करते थे की जितने ज्यादा से ज़यादा इसे पर्चे इकट्ठे कर सके ! "
  
       तपती दोपहर में मैं और मेरे कुछ साथी जिनमे से कुछ के नाम याद हैं .... राजे , बबलू और भी कुछ निकल पड़ते थे अपने इस बहुमूल्य और उत्साहित कम को अंजाम देने के लिए .... !
       जब तक कोई माइक पर आवाज नहीं आती थी पता नहीं चलता था की कोई रिक्शे पर पर्चे बाँट रहा है की नहीं ....और इस बीच हम एक और महत्वपूर्ण काम किया करते थे ...पड़ोस की आंटी जी के क्यारी मैं एक अमरुद का पेड़ था उस पर अमरुद तो कम ही लगा करते थे फिर भी आंटी जी को उसकी चिंता खूब रहती थी.... साथ मैं और भी बहुत से फल के पेड़ थे ...पर फल कम ही लगते थे उनपर.... हाँ एक वैज्ञानिक उपाय किया हुआ था उन्होंने अपने सब पेड़ पौधों को पानी देने का ..... वो अपने घर के अन्दर बनी पानी की हौदी से एक छोटा सा प्लास्टिक का पाइप निकल कर ज़मीन पर रख देती थीं , और उसको अपने मुह से खीच कर पानी का प्रभाव बना देती थी जिस से जब पानी बाहर आने लगता था ...और वो ज़मीन का मुहाना उनकी क्यारी पर खुलता था बस ....दिन भर पानी औंकी क्यारी मैं चलता रहता था ...और पेड़ सूखते नहीं थे .... अद्भुद !!
 खैर हम अपना महत्वपूर्ण काम काया करते थे पर्चे बटोरने से पहले ...." हम उनके अमरुद के पेड़ से कुछ पत्ते तोड़ कर उनपर नमक लगा कर पान की तरह खाया करते अनोखे आनंद की प्राप्ति ....क्या  आनंद मिलता होगा सच्चा पान खाने वालों को ....पैसा भी खर्च किया और थूक भी दिया .... और ये अनुभव तो अनोखा था ... पान का स्वाद , बिना पैसे का, उत्साह और वीरता का अनुभव , पूरा का पुर पान खा जाइए थूकना भी नहीं .... कहने का अर्थ ये की नुक्सान कही से भी नहीं ...सब पाना ही पाना है ....! 

     हाँ अब मुख्य बात करते हैं ....तो तपती दोपहर हो या सर्दी की सुबह सी लगने वाली दोपहर ... किसी माइक के आवाज सुनी नहीं की दौड़ पड़ते थे , जीतनी कोशिश कर सकते थे करते और ज़यादा से ज्यादा पर्चे इकठ्ठा कर लेने की ....और शाम को हम सब दोस्त गिनती करते की किस के पास कितने पर्चे हैं ....जिसके पास ज्यादा होते वो तो बस मत पूछिए .... राजा का दर्जा पा जाता था ...अगली शाम तक उसको सब सम्मान देते थे ...जैसे किंग को मिलता है ...घर पर बनी सब अच्छी अच्छी चीजें उसको दी जाती थी ..... असामान्य से दिन थे वो ...फिर नहीं आ सकते ....कोशिश भी करें तो भी ....! !

    "  छपे हुए पर्चे - आज हम खुद इनको किस तरह से देखते हैं ये कोई परभाषा देने की बात नहीं ....किन्तु उन दिनों ये ही पर्चे महत्वपूर्ण थे ....आप को कुछ विशेष दिखने के माध्यम थे ....अमरुद के पत्ते अनोखी अनुभूति देने मैं सक्षम थे किन्तु आज कोई मूल्य नहीं ....इन चीज़ों का एसा हम मान सकते हैं ..."       कुछ भी विशेष हम से है ...कुछ भी मूल्यवान हम से है ... हम और आप किसी भी वक़्त कुछ भी संभव कर सकते हैं, यादों को संजो कर रखिये ताकि वर्त्तमान की कोख मैं भविष्य उस गर्माहट को अनुभव करते हुए बढे और आकार ले  ...एक नवीन चेतना के साथ ...नवीन पीढ़ी के लिए ....! "

 " पल - पल विशेष है , हां हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा उसको भविष्य के लिए संजोती है , ताकि संभावित अनुकरण हो सके ! "

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