Thursday, November 3, 2011

...................किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है !

" किसी फास्टफूड के बड़े से होर्डिंग के नीचे खड़े होकर देखिये ...हाँ बगल मैं वो फास्ट फ़ूड की शॉप भी होनी चाहिए ....आप को कई तरह के नज़ारे देखने को मिलेंगे ...कुछ का शाब्दिक चित्रण मैं करता हूँ शायद कभी आप भी इस से रूबरू हुए हों ....:

" कोलर उचे , चिपकी हुई जींस , गले के बटन ऊपर से २ खुले हुए, हाथ पर एक बड़े नंबर  वाली रिस्त वाटच , कानो मैं आईपॉड के एअर्फोंन और कुछ एक के हाथों मैं जल रही श्वेत दंडिका ( सिगरेट ) भी .... और एक सलोनी सी विभिन लिंग की साथी ... किसी ठन्डे पे पदार्थ का सेवन करते हुए पता नहीं किस भविष्य के सपनो को साकार करते हुए बात करते दिखाई दे जायंगे ....नै पीढ़ी है ये ...हाँ बहुत तेज़ है ... सम्बन्ध बस अपने मतलब के हिसाब से बनती है ... ! "

अब दुसरा दृश्य : इसे ही आगे बढ़ाते हैं .... एक के बाद एक कुछ न कुछ ख्य अजा रहा है ...और खर्च शायद २ से ३ हज़ार की ऊपर चला गया है पर कोई चिंता नहीं ... ज़िन्दगी का आनंद अधिक महत्त्व रखता है ...ना की पैसा .... कल किस को नसीब या सब ...आज ही सब का लुत्फ़ उठा लेना चाहिए ....तब अचानक एक फटे पुराने कपड़ो मैं दो छोटे छोटे बच्चे आ कर हार फेला देते हैं ... ये nayi pedhi जो समाज बदलने की बात करती है ....मैं से २० रूपये निकल कर देती है ...तभी दूसरा बोलता है ...२० रूपये दोगे ? ये वही लोग हैं जो अपने ऊपर २ से ३ हज़ार खर्च करते हुए ....तनिक भी नहीं सोचते और जिसमें ९९ रुपे का एक बर्गर आता है ...और २० रुपे देते वक़्त इतना सोचते हैं की देश के लिए प्लानिंग करने वाले मोंटेक सिंह भी इनको अपने साथ रखने के लिए सोचे !! "
   " भविष्य वर्तमान के गर्भ मैं पलता है....सही है , किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है ! " 

     

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