" कसौनी " की एक पहाड़ी पर सूरज ऊँघ रहा था ! नीचे तलहटी में ठंडी हवाएँ कोहरे को गोद में उठाये लहरों पर सफर पे निकली थी ! परमहंस त्रिपाठी अपने बंगले में पूरे जोश से जलते अलाव के सामने बैठे नीबू की चाय का आनंद ले रहे थे की अचानक काँच के बर्तन के टूटने की आवाज़ ने उन्हें उस बेहद सर्दी की शाम कंपकपा दिया ! "
मुझ से ये टूट गया ! स्वेटर कोहनियों तक चढ़ाये , हाफ नेकर में , गले में गुलाबी मफलर और सर पर मंकी टोपी पहने सौम्य उनके सामने खड़ा था , डरा सहमा हुआ !
सफ़ेद पश्मीना का दोशाला ठीक करते हुए त्रिपाठी जी ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए बोले : एक कप और चाय ले कर आओ !
सौम्य : साब , मुझ से ये टूट गया !
त्रिपाठी जी : हाँ ,वो तो देख रहा हूँ !
सौम्य : तो ?
त्रिपाठी जी : तो क्या ?
सौम्य : आप मुझे कुछ नहीं कहेंगे ?
त्रिपाठी जी : हाँ कह तो रहा हूँ , एक कप और चाय ले कर आओ !
सौम्य हाथों में पकडे टुकड़ों की तरफ देखता हुआ रूंधे गले से बोला: ये बहुत महंगा था ना साब !
त्रिपाठी जी : भाई , इस वक़्त मुझे चाय चाहिए और उसकी कीमत मुझे पता है इस समय , तुम गए की में खुद जाऊं किचन में ?
सौम्य भागता हुआ किचन में गया और कप भर लाया !
सौम्य कप को उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला : साब , आप मुझे कुछ क्यों नहीं कहते इतना नुक्सान होने के बाद भी ?
त्रिपाठी जी फिर मुस्कुराये और बोले : बाहर से एक गुलाब का फूल तोड़ कर लाओ और लौटते वक़्त दरवाज़े के शीशे मत बंद करना ! बाहर की बत्ती जला देना और गेट पर ताला मत लगाना आज !
सौम्य : फिर तो ठंडी हवा और कोहरा अंदर आ जाएगा !
त्रिपाठी जी : हाँ , आने दो , तुम गुलाब के कर आओ , फिर बात करते हैं ! और हाँ , अपना ट्रैक सूट पेहेन लो ठण्ड बढ़ रही है ! होमवर्क पूरा नहीं हुआ हो तो वो भी लेते आना !
त्रिपाठी जी कंधे से सरकते दोशाले को ठीक करते हुए बोले !
सौम्य उठा और ढलती शाम के सहारे धरती पर उतरते कोहरे की चादर के बीच से होता हुआ लॉन के दूसरे छोर कर लगे गुलाब को ले आया ! बाहर की लाइट जला दी ! पड़ोसियों के घर से हलवे के लिए देसी घी में भुनती सूजी की खुशबू ने उसे कुछ देर दरवाज़े पर ही रोके रखा !
त्रिपाठी जी : क्या हुआ सौम्य, अंदर आ जाओ !
सौम्य ने दरवाज़ा बंद किया और गुलाब का फूल ले कर अंदर अपने कमरे में चला गया ! ट्रक सूट पहना और फिर त्रिपाठी जी के पास आकर फूल उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला : ये लीजिये !
त्रिपाठी जी एक बड़ी यूनिवर्सिटी के रिटायर VC थे तो गंभीरता स्वभाव में ऐसी थी जैसे रंगीन काग़ज़ पर उकेरी गयी स्याह तस्वीर !
अलाव में जलती लकड़ियों की चरमराहट ने अनोखा संगीतमय माहौल सृजित कर दिया था ! पहाड़ों के शांत आँचल में अटखेलियां करती नदी की लहरें और उनसे उठता तरन्नुम अपनी और खींचता था तो दूर खिलते चाँद को बाग़ में फूटते हरश्रृंगार की खुशबू टिमटिमाते तारों को खूबसूरत घरती का रास्ता दिखाती थीं !
सर, वाक़ई आप मुझे कुछ नहीं कहेंगे ?
सौम्य ने गंभीर होते वातावरण में हलके से शाब्दिक कंकरी उछाली !
सौम्य ने गंभीर होते वातावरण में हलके से शाब्दिक कंकरी उछाली !
त्रिपाठी जी लगभग ऊँघ रहे थे !
सर, काफ़ी महंगा होगा ना वो जो मुझ से टूट गया ? सौम्य ने फिर कोशिश करी !
हाँ , महंगा तो था बेटा !
त्रिपाठी जी ने पहला प्रश्न भी सुना था किन्तु उत्तर बाद वाले का दिया , कुर्सी पर ठीक से पीछे सरकते हुए !
त्रिपाठी जी ने पहला प्रश्न भी सुना था किन्तु उत्तर बाद वाले का दिया , कुर्सी पर ठीक से पीछे सरकते हुए !
सौम्य : तो सर अब मैं क्या करूँ ?
त्रिपाठी जी : क्या , अभी तक टुकड़े डस्टबीन में नहीं रखे ?
सौम्य : हाँ , वो तो डाल दिए, लेकिन ……।
त्रिपाठी जी : क्या चाहते हो ?
सौम्य : सर, मुझे आत्मग्लानि हो रही है !
त्रिपाठी जी अपनी आराम कुर्सी से उठे और सौम्य के करीब आ कर गाढ़ी लाल रंग की कालीन पर बैठ गए !
सौम्य सिकुड़ सा गया ! वैसे ही जैसे छुई मुई के पत्ते सिकुड़ जाते हैं गंभीर स्पर्श से !
जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब आया था दिल्ली और वही पर मेरी मुलाक़ात हुई थी विष्णु से ! चांदनी चौक पर जब में भटक रहा था तब मुझे विष्णु ने सहारा दिया था ! दो हफ्ते उसके साथ ही रहा था ! पटरियों के किनारे उसके झोपड़े में !
विष्णु का दिन शुरू करता था भगवान की पूजा से ! उस झोपड़ी में जिसका खुद का कोई भविष्य नहीं था वो अपने और फिर दो हफ़्तों तक मेरे अच्छे भविष्य की कामना करता था ! फिर वो निकल पड़ता था काम पर ! ढेर सारे फूल और उनकी खुशबू के बीच उसका दिन गुजरता था ! कभी गुलाब की पंखुड़ियों का गठर उठाना तो कभी मोतिया के लच्छों को यहाँ वहां पहुचना ! कभी गेंदे के फूलो को तोड कर ढेर बनाना तो कभी रजनीगंधा की कलियों पर पानी का छिड़काव ! कभी अशोक के पत्तों की लड़ियाँ बनाना तो कभी सूखे हुए फूलो को ठिकाने लगाना ! पूरा दिन फूलों के बीच ! चाय पानी , खाना पीना , नाश्ता और फिर घर शाम को थक हार कर आ जाना ! दिन में कभी गुरूद्वारे में लंगर कर लिया तो कभी जैन मंदिर में प्रसाद खा लिया ! कभी लाजपतनगर में पीपल के पेड़ के नीचे छोले भठूरे खा लिए तो कभी दूर लाल क़िले के पास छोले कुलचे का स्वाद ले लिया ! दो हफ्ते मैंने ही किया ये सब ! फिर पता लगा की अपनों का होना कितना ज़रूरी है इस दुनिया में जब तक आप ज़िंदा हैं !
त्रिपाठी जी सौम्य के कन्धों पर हाथ रखे रखे बोल रहे थे और सौम्य अपने वर्तमान को समझने की कोशिश करता था हर शब्द के साथ !
त्रिपाठी जी ने आगे कहना शुरू किया : एक रोज़ सुबह सवेरे छुट्टी का दिन था पिताजी रात देर से लौटे थे ! हम दोनों भाई खाना का कर उछल कूद कर रहे थे की मेरी निगाह पिता जी के स्टडी टेबल पर रखे सुन्दर गोल्डन कैप वाले फाउंटेन पेन पर पड़ी और मैंने झट से उठा लिया ये कहते हुए की ये मैं लूँगा ,बस छोटे भाई से मेरी खींचा तानी हुई और ऐलुमिनियम का गोल्डन प्लेटेड कैप ज़मीन पर गिर गया और उस पर मेरा पैर पड़ गया !
वो चिपटा हो गया था !
पिता जी कच्ची नींद में थे , रात देर से सोये थे वापस लौटने के बाद !
हमारा शोर अचानक से रुक गया और वही सन्नाटा कारण बना पिता जी के नींद से जागने का , उन्होंने ज़मीन पर पड़े चिपटे कैप को देखा और एक तमाचा जड़ दिया मेरे गुलाबी गाल पर ये कहते हुए की : तुम बड़े हो सिर्फ उम्र से अकल से कब बड़े होओगे ? दे देते छोटे भाई को , कम से कम नुकसान से तो बच जाते !
ये सब इतना अचानक हुआ की कुछ समझ नहीं आया ! माँ , बड़ी दीदी , घर में काम करने वाली आंटी और पड़ोस से आई एक दीदी की सहेली सब देख रहे थे ! अच्छा नहीं लगा मझे !
मुझे पता नहीं क्या सूझा और मैंने जवाब दिया पिता जी को : क्या मुझे पीटने से नुकसान की भरपाई हो गयी आपकी ? इसके जवाब में एक और तमाचा मेरे गाल पर पड़ा और फिर माँ ने मुझे अपने से चिपका लिया !
मुझे पता नहीं क्या सूझा और मैंने जवाब दिया पिता जी को : क्या मुझे पीटने से नुकसान की भरपाई हो गयी आपकी ? इसके जवाब में एक और तमाचा मेरे गाल पर पड़ा और फिर माँ ने मुझे अपने से चिपका लिया !
पूरा दिन और पूरी रात मेरे दिमाग में ये सब चलता रहा ! क्यों किया पिताजी ने मेरे साथ ऐसा सब के सामने ! मुझे कितने सवाल खुद से करने पड़ रहे थे और उनके जवाब ढूंढने निकल पड़ा मैं देर रात एक चप्पल और वही टूटा कैप का पेन ले कर सुनसान रस्ते पर ! रोडवेज़ की बस से दिल्ली पहुंच गया ! वहीँ विष्णु ने मुझे से गेंदे के फूलों का गट्ठर सर पर रखने की मदद मांगी और फिर बातों बातों में मैं उसके साथ हो लिया !
पूरे दो हफ़्तों बाद पता लगा की अपनों की कमी …………तब ज़यादा लगती है जब आपको पता हो की आपके आपने आपके आस पास हैं लेकिन आपके साथ ना हों !
कुछ दिनों के बाद विष्णु ने ही मुझे मेरे घर भेजा ! उसने सब किया मेरे लिए ! मेरे घर पर इत्तला दी ! फिर पढ़ाई लिखाई और सरकारी नौकरी ! मैं विष्णु को भूल ही गया था जैसे ! कई बार सोचा अपनी ट्रांसफर वाली नौकरी में एक बार तो फूल बाजार जा कर पता करूँ विष्णु के बारे में लेकिन अफ़सोस मुझे समय नहीं मिला और समय निकलता गया !
सौम्य गुमसुम सा सब सुनता जाता था ! बाहर ठंडक बढ़ गयी थी ! भीतर यादों की ताप से वातावरण गरमाया सा था और त्रिपाठी जी बोलते जाते थे !
त्रिपाठी जी ने पानी का गिलास पास की टेबल पर रखते हुए आगे कहा :
एक रोज़ जब यूनिवर्सिटी के काम से दिल्ली में था तो अचानक उस से मुलाक़ात हो गयी ! वो अब भी फूलों के करीब था ! फ़र्क़ था तो इतना की नगर निगम के पार्क में कॉन्ट्रैक्ट के माली के रूप में ! मैं चांदनी चौक पर नई सड़क की तरफ मुड़ने वाली सड़क के कोने पर रखे लंबे बेंच पर दरी वाले के सामने खड़े छोले कुलचे वाले से नीम्बू लेने को मुड़ा ही था की वो मुस्कुराता चेहरा मुझे दिखा ! बरसों पहले वाली ही मुस्कान ! तज़ुर्बा चहरे की झुर्रियों से बाहर झांकता था तो भावनाओं के पानी से सूख चुकी आँखें भीतर गड़ी जाती थीं ! हम अचानक मिले थे ! उसे याद मेरा नाम हंस !
एक रोज़ जब यूनिवर्सिटी के काम से दिल्ली में था तो अचानक उस से मुलाक़ात हो गयी ! वो अब भी फूलों के करीब था ! फ़र्क़ था तो इतना की नगर निगम के पार्क में कॉन्ट्रैक्ट के माली के रूप में ! मैं चांदनी चौक पर नई सड़क की तरफ मुड़ने वाली सड़क के कोने पर रखे लंबे बेंच पर दरी वाले के सामने खड़े छोले कुलचे वाले से नीम्बू लेने को मुड़ा ही था की वो मुस्कुराता चेहरा मुझे दिखा ! बरसों पहले वाली ही मुस्कान ! तज़ुर्बा चहरे की झुर्रियों से बाहर झांकता था तो भावनाओं के पानी से सूख चुकी आँखें भीतर गड़ी जाती थीं ! हम अचानक मिले थे ! उसे याद मेरा नाम हंस !
सौम्य : आप उनको लेकर अपने साथ आ गये ?
त्रिपाठी जी : नहीं ,वो नहीं आया ?
सौम्य : तो अब वो क्या वही रहते हैं ?
त्रिपाठी जी : हाँ शायद !
सौम्य : फिर आप कभी नहीं मिले उनसे ?
ना : त्रिपाठी जी बोले !
घने होते कोहरे के बीच बाहर दरवाज़े पर कुछ आहट हुई !
त्रिपाठी जी : देखो तो सौम्य !
सौम्य दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा !
अरे दादा जी आप यहाँ अचानक ? कुछ खबर नहीं दी ? : सौम्य किसी से पूछ रहा था !
त्रिपाठी जी भी पश्मीना का दुशाला ठीक करते करते दरवाज़े के करीब आ गये थे !
कौन है सौम्य ? त्रिपाठी जी ने बाहर टिमटिमाते बल्ब की धुँधली रौशनी में देखने की कोशिश करते हुए पुछा !
मेरे दादा जी है : सौम्य ने चहकते हुए जवाब दिया !
इतनी रात में और यहाँ ? तुमने तो कभी इनका ज़िक्र नहीं किया ! ठीक है अंदर आओ उनको ले कर बाहर ठंडक है बढ़ रही है : त्रिपाठी जी बोले !
चहरे पर हलकी सी दाढ़ी ! मुस्कुराता चेहरा ! आँखों पर पुराना ऐनक और एक हाथ में छड़ी लिए एक व्यक्तित्व धीरे धीरे अँधेरे से रौशनी की तरफ बढ़ रहा था ! भीतर खड़े त्रिपाठी जी के चहरे पर की सिकुड़न विस्तृत होती जाती थी और होठो से अचानक शब्द निकले : अरे , विष्णु तुम ?
दो बीतते युग आमने - सामने थे और उनके बीच खड़ा वर्तमान जो अभी अभी बीते कल के सफर से गुजरा था अपने भविष्य की राह देखता था दोनों की बाँहों के सहारे ! स्तब्ध और शांत ! अलाव की लकड़ियाँ चरमराते हुए आवाज़ लगा रही थी की करीब आओ और जमीं हुयी यादों एवं प्रश्नो की बर्फ को पिघलने दो !
रात के खाने के बाद सौम्य तो सो गया तब विष्णु ने सब कहा : बहुत साल पहले मुझे सौम्य मुझे स्टेशन पर भटकता मिला था जिसे मैंने अनाथश्रम में रखवा दिया ! वहाँ से तुम उसे अपने साथ ले आये ! ये जब भी मौका मिलता मुझे मिलने ज़रूर आता था वही सरदार पटेल की मूर्ति वाले पार्क में ! हम दोनों एक एक कंचे वाली ठंडी निम्बू पानी की बोतल पीते और फिर उसको मैं बस में बैठा कर वापस आ जाता ! स्कूल यूनिफार्म में खूब अच्छा लगता है मुझे ये ! जब तुम रिटायर हुए तब इसने मुझे बताया की तुम दूर पहाड़ पर रहने जा रहे हो और वहां का पता दिया !
रिटार्यड परमहंस त्रिपाठी और विष्णु की आवाज़ें गुजरती रात के साथ - साथ मद्दम होती जाती थीं और दूर बहती नदी पर बने सेतु से गुजरते रात के मुसाफिरों की फुसफुसाहटों से सन्नाटा बार - बार नींद से जाग जाता था ! बगल के कमरे में सोता इन दोनों के बीच का सौम्य रूपी " सेतु " भविष्य के आगंतुकों की राह तकता था करवटें बदलते हुए चादर की सलवटों में गुलाब की पंखुड़ियों सा !
एक कहानी : " सेतु "
********** समाप्त **********
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