विशाखा अपने दफ़्तर में बैठी किसी का इंतज़ार कर रही थी ! उसकी निगाहें टिक - टिक करती पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी पर टिकी थी ! खिड़कियों से आती जाती ठंडी हवांयें पास के मंदिर से लोहबान की खुशबू आपने साथ ले आती थीं ! सड़क पर शोर कुछ कम हो चला था ! पास के स्टेशन से आखिरी ट्रैन के अनाउंसमेंट हो चूका था ! पास के मोहल्ले में लगने वाली साप्ताहिक पैठ से अपनी दुकानदारी समेट कर व्यापारी वापसी पर थे ! सब दीखता था विशाखा की पीछे वाली खिड़की से ! शाम रात में तब्दील होने को बैचैन थी की अचानक दरवाज़े पर तैनात सिपाही ने सेल्यूट करते हुए विशाखा का ध्यान अपनी तरफ खींचा !
जनाब, कोई आबिद आप से मिलना चाहते हैं !
विशाखा ने सम्भलते हुए कहा : हाँ , उन्हें अंदर भेजिए !
सिपाही ने फिर से सेल्यूट किया और गर्वीले अंदाज़ में घूम गया !
आओ आबिद आओ , कोई परशानी तो नहीं हुई आने में ! विशाखा ने २३ , २५ साल के युवक आबिद से ममता भरी आवाज़ में कहा ! अपनी सीट से उठ कर लगभग दरवाज़े तक आ गयी थी वो आबिद को लेने के लिए !
आबिद , एक लम्बा अच्छी डिल डॉल वाला, नव युवक सुन्दर गोल चेहरा , नीली आँखे , काले रंग की टी शर्ट और डार्क ब्लू कलर की जींस में दरवाज़े की चोखट पर खड़ा झिझक रहा था रौबीली विशाखा के बड़े से दफ्तर में कदम रखने से ! वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थी वो जिले की ! ये पहली पोस्टिंग थी विशाखा की इस वरिष्ठ पद पर ! लगभग १५ सालों बाद मिल रहे थे दोनों एक दूसरे से !
आबिद ने विशाखा के पैर छुये और नमस्ते कहा !
डबडबाई आँखों से विशाखा ने आबिद को उठाते हुए उसका माथा चूमते हुए गले से लगा लिया !
विशाखा : आ , बैठ यहाँ !
बड़े बड़े सोफों पर बैठने के इशारा करते हुए विशाखा ने आबिद का बैकपैक ले कर सिपाही से अपनी गाड़ी में रखने को दिया और थोड़ी देर में निकलते हैं कह कर तैयारी करने को कहा !
सिपाही ने जी जनाब कहते हुए लॉगबुक आगे कर दी !
विशाखा : आबिद वो पेन पकड़ाना !
आबिद ने अपनी जेब से एक पेन निकाल के विशाखा की तरफ बढ़ा दिया और विशाखा ने लॉगबुक पर सिग्नेचर कर के पेन आबिद की तरफ़ वापस बढ़ाया ,
तभी आबिद ने पुछा :
दी , आपको ये पेन याद है ?
विशाखा को जैसे किसी ने बर्फ के टुकड़े से छू दिया हो , ये प्रश्न ऐसा था उसके लिए !
आबिद : दीदी ,आपको ये पेन याद है ?
विशाखा : हाँ रे , इसी पेन से हो हमारी दोस्ती हुई थी ! वाह , तूने ये अभी तक संभाल कर रखा है !!
आबिद : दीदी ये मेरी बांह पर लगे ठीके का दाग़ और ये पेन ताउम्र मेरे साथ रहेंगे !
विशाखा : पेन तो ये पकड़ और बता खा खाएगा , रस्ते से लेते चलेंगे घर पर तो नार्मल खाना बन चूका होगा मैंने किसी से तेरे आने की बात नहीं कही है !
आबिद : दीदी, अगर आज वो ही गोबी की पकौड़ियाँ खाई जायें तो ? जो आपने वैभव भैया की शादी के दिन बारात के जाने के बाद बनाई थी ?
विशाखा ने मुस्कुराते हुए घर पर नौकर को गोबी खरीद कर रखने को कहा और आबिद को ले कर चल दी अपने बड़े से सरकारी बंगले की तरफ ! आगे पीछे सिपाहियों की कतारें , हर काम के लिए एक सिपाही !
विशाखा के लिए रोज़ दफ़्तर से घर जाना जैसे एक दूसरी डियूटी पर जाने जैसा था ! अकेले रात भर सरकारी बंगले में कभी लैपटॉप तो कभी टेलीविज़न तो कभी रेडिओ के साथ नींद आने तक कर सफर और फिर सुबह जल्दी से दफ्तर , घर पर रुके भी तो किसके लिए और घर वापस जल्दी आये तो लिए !
लेकिन आज ऐसा नहीं था ! उसका छोटा भाई आबिद था उसके साथ ! दफ्तर से सरकारी गाड़ी तक पहुचने में जितने भी अधिकारी मिले सब से आबिद को मिलवाती चली विशाखा मेरा छोटा भाई है कह कर !
सब अधिकारिओं ने पहली बार अपनी साब के चहरे पर मुस्कान देखी थी , मातृत्व देखा था !
विशाखा ने रस्ते से कुछ कोक और स्वीट्स खरीदी ! बंगले के पास के मदर डेरी वाले को फ़ोन कर दिया की घर पर एक टूटी फ्रूटी आइसक्रीम की ब्रिक पंहुचा दे !
आबिद पूरे रस्ते विशाखा को देखता रहा ! उसके हाव भाव पढता रहा ! बीच बीच में आते अधिकारीयों के फ़ोन काल पर वो कैसे बात करती थी , जवाब देती थी सुनता रहा और याद करता रहा १२ , १५ साल पहले का वो दिन जब पहली बार वो विशाखा से मिला था !
अरे आप कहाँ चली गयी थी फातिमा बी , इतना सारा काम पड़ा है ! विशाखा की चाची ने आबिद की अम्मी को ज़ोर दे कर बोला !
फ़ातिमा बी : जी , आबिद के स्कूल की छुट्टी का वक़्त था तो बस उसको लेने थी !
चाची : ठीक है , अब आगया ना ! अब काम देख लीजिये !
फातिमा बी : जी अच्छा कहते हुए ८ , ९ साल के हाफ़ नेकर में खड़े आबिद से बहार बरामदे में जा कर बैठने को कहा !
आबिद : अम्मी , प्यास लगी है !
फातिमा बी : अच्छा तुम वहां चलो पानी लाती हूँ !
आबिद बाहर बरामदे में किनारे बैठ गया और देखने लगा कही फूल तो कहीं लाईट लगाते कारीगरों को ! कभी कोई आता तो कभी कोई ! सब्ज़ियों के ठेले , तो कभी राशन वाले के रिक्शे ! कभी दूध के बर्तन तो कभी मिठाइयों से भरी टोकरियाँ ! कभी उसके आस पास से खेलते हुए गुज़ारे शादी में शामिल होने आये रिश्तेदारों के बच्चे तो कभी वैभव भैया के दोस्तों के सिलसिला ! एक दो बार कुछ लोगो ने आबिद से घर से किसी को बुलाने को कहा और आबिद बड़े अपनत्व से भीतर जा कर जो भी पहला शख्स मिला उसे बुला लाया ! मानो जैसे उस बड़े घर में उसके होने की भी सब को फ़िक्र है ! कभी चाचा जी ने किसी मेहमान के आने पर आबिद से ही कह डाला जाओ अंदर जा कर चाय नाश्ते का देखो !
इस सब में शायद अम्मी पानी देना भूल गयी थी आबिद को, पर कोई था जिसे ख्याल था की आबिद स्कूल से सीधे शादी के घर में आया है और भूखा प्यासा है सब बरात की तैयारी में लगे थे तो सका ख्याल अम्मी को भी नहीं रहा !
किसी ने आबिद की तरफ एक पत्ते का दोना और गिलास में पानी आबिद की तरफ बढ़ाते हुए कहा , लो तब तक पानी पियो तुम्हारी अम्मी काम कर रही है !
आबिद : जी अच्छा !
इस घर में पहले तो देखा नहीं था आबिद ने इनको ! शायद वैभव भैया की रिश्तेदार होंगी और शादी में आई है ! कितनी अच्छी है ! आबिद पानी पीते और मिठाई खाते सोचता जाता था की तभी चाची ने आवाज़ लगाईं !
कहाँ रह गई विशाखा ?
विशाखा आई चाची कहती हुई अंदर चली गयी !
चाची : विशाखा बार बार मैं काम के लिए टोकूंगी नहीं , बड़ी हो सब बच्चो में कुछ तो ख्याल करो भाभी जी और भैया का ! शादी के घर में कई तरह के लोग आते हैं और तुमको इस लिए भी हॉस्टल से शादी में बुलाया है की शायद किसी की तुम पर नज़र पड़े और तुम्हारी शादी की बात बने ! तुम्हारे चाचा कब तक अपने बच्चो के साथ साथ तुम्हारा भी खर्च उठाते रहेंगे ! भैया भाभी कुछ छोड़ कर तो गए यही जो था वो सब उनके इलाज़ पर खर्च हो चूका है ! तुम समझ रही हो ना ?
" विशाखा तो जैसे कोने में लगी तुलसी सी सुकुड गई थी ! कड़वे शब्दों और घूरती निगाहों के स्पर्श से मुरझने को थी वो की तभी आबिद भीतर आया और बोला : दीदी वो डाकिया आया है ,कोई रजिस्टरी है ,कहता है बिना सिग्नेचर के नहीं देगा ! "
चाची : अच्छा अच्छा उसको रोको अभी आती हैं तेरी दीदी !
विशाखा ने मन ही मन आबिद और देखिए को शुक्रिया कहा , नहीं तो और कुछ से चाची बातों के ताने देती !
डाकिया : यहाँ सिग्नेचर करिये !
विशाखा : जी पेन दीजिये !
डाकिया : बिटिया , आज पेन मेरा रास्ते में गिर गया !
विशाखा : ओह्ह , ठीक है रुकिए मैं लाती हूँ अंदर से !
आबिद : दीदी ये लीजिये पेन , चलता गुलाबी है मुझे पिछले हफ्ते ही क्लास टीचर ने दिया था , पूरी अटेंडेंस होने पर !
विशाखा ने रजिस्ट्री ले ली और गुलाबी पेन को लिए लिए भीतर चली गयी !
आबिद बाहर बैठा बैठा इंतज़ार करता रहा ! अपनी अम्मी और विशाखा का भी !
पूरी गली में रौशनी , बैंड बाजा, शहनाई का तरन्नुम , केवड़े और गुलाबजल की खुशबु , सजे धजे मेहमान ! चारो तरफ़ खुशियों और उल्लहास माहौल ! वैभब भैया की बारात चलने को थी !
चाचा : अरे , विशाखा तुम नहीं चलोगी ?
अभी विशाखा कुछ बोलती चाची बीच में बोल उठी , सब शादी में चले जायंगे तो घर पर कौन रहेगा !
चाचा : अच्छा ठीक है , विशाखा तुम यही रुको , फातिमा बी से भी बोल देता हूँ रात में इधर ही रुकने को !
विशाखा : जी चाचा जी आज देर शाम मेरे आई पी एस का रिजल्ट आने को है रिटन का मैंने आपका ही नंबर दिया है अपने दोस्त को , हो सका तो वो आपको फ़ोन करेगा लखनऊ से !
चाची : अरे इतने शोर में कहाँ फ़ोन सुनाई देगा ,कल सुबह शादी के बाद देख लेंगे !
मायूस हो गया विशाखा का चेहरा और पास खड़े आबिद को भी कुछ ठीक नहीं लगा ये सब !
बारात जा चुकी थी ! घर में दिन भर के शोर ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली थी ! बड़े से घर के दरवाज़े खिड़की बंद कर के विशाखा अकेली बैठी थे ड्राइंग रूम में ! तभी नीचे से फातिमा बी ने आवाज़ लगाईं :
विशाखा दरवाज़ा खोलो , आबिद को तब तक रखो अपने साथ में घर पर खाना बना कर बुला लूंगी उसको !
विशाखा : चाची ( फातिमा बी को भी चाची पुकारा उसने ) , आप यही रहिये और यहाँ जो खाना बना है वो ही बहुत है हम सब के लिए !
आबिद को अचानक जैसे किसी ने झकझोर दिया था ! उसकी माँ को किसी ने चाची कह कर पुकारा था ! वो भी विशाखा ने जो अब तक के मिले सब लोगो में सब से अच्छी लगी थी उसको !
मौसम खराब हो चला था ! तेज़ बारिश , बिजली का चमकना और फिर तेज़ हवायें ! ठंडक बढ़ गयी थी !
चाय पियेंगी चाची : विशाखा ने फातिमा बी से पुछा और आबिद से बोली तुम खाना खा लो , फिर सो जाना !
आबिद : क्या है , खाने में दीदी ?
कढ़ी और चावल ,पर पकौड़ियाँ खत्म हो गयी हैं !
आबिद : तो क्या हुआ , लाइये दीजिये बगैर पकौड़ियों के खा लूँगा !
अजीब से संतोष की खुशबू थी आबिद के इस कथन में जैसे भरी दोपहर में तेज़ लू के बीच अचानक चन्दन की खुशबू फ़ैल गयी हो !
अच्छा रुको आबिद कुछ देर ! विशाखा ने एक तरफ चाय और एक तरफ गोभी की पकौड़ियाँ बनाई !
आबिद खाने के बाद विशाखा की गोद में ही सो गया और फातिमा बी के कहने के बावजूद उसने उसे अपने से अलग नहीं किया !
पड़ोस के घर में लैंड लाइन कब से बज रहा था ! सब तो शादी में गए थे बस एक २० , २३ साल का लड़का विपुल था जो कभी कभी विशाखा को छत से देखा करता था !
विपुल : अरे ,विशाखा है कोई वैभव भैया के घर में !
फ़ोन वाले घर से उस लड़के ने आवाज़ लगाईं !
फ़ोन वाले घर से उस लड़के ने आवाज़ लगाईं !
विशाखा ने आबिद के सर को धीरे से सोफे के कुशन पर संभाल कर सरकाया और भाग कर गयी बरामदे में !
हाँ बोलो ?
विपुल : तुम विशाखा हो ?
हाँ ? क्यों क्या हुआ ?
विपुल : तुम्हारे चाचा जी का फोन था , तुम्हारा रिज़ल्ट आ गया है और तुम ने क्लियर कर लिया है !
उछल पड़ी इतना सुन कर ! छलांग लगाने को तैयार इतना उत्त्साह !
विपुल : अरे , सम्भलना और पहले अंदर जाओ , मैं आता हूँ वहां थोड़ी देर में !
विशाखा बिना चुन्नी के चली आई थी बरामदे में , विपुल के अंदर जाओ कहने के बाद समझी और नज़रें झुका कर अंदर चली गयी !
विपुल दरवाज़े पर था छतरी लिए , फातिमा बी ने अंदर आने को कहा उसको !
विपुल : किस चीज़ का एग्जाम क्लियर किया तुमने ?
आय पी एस का रिटन ! विशाखा बोली !
वाओ , ये बड़ी अच्छी बात है ! लाओ मिठाई खिलाओ !
विशाखा ने लो कहते हुए परवल की घर में बनी मिठाई आगे बढ़ा दी !
अपना लैंड लाइन नंबर दे दो प्लीज़ , कभी चाचा जी से बात करने को मन किया तो कॉल कर लूंगी !
विपुल : हाँ हाँ , लाओ पेपर और पेन दो !
विशाखा ने वो आबिद का गुलाबी पेन आगे बढ़ा दिया ! विपुल ने नंबर लिखा और पेन अपनी जेब में रख लिया , शायद जान बूझ कर किया था उसने !
आबिद अब जाग गया था ! सब सुन और देख रहा था !
बारिश थमी तो विपुल अपने घर लौट गया ! अगले दिन बारात वापस आई ! विशाखा अपने हॉस्टल फिर वहां से ट्रेनिंग पर गयी ! सब का व्यवहार बदला बदला था ! कुछ दिनों में पोस्टिंग और पोस्टिंग के साथ वो आज सीनियर पोस्टिंग पर थी !
ड्राइवर ने लंबा हॉर्न दिया , गाड़ी बंगले के सामने कड़ी थी !
ओ भाई कहाँ खोये हो ? घर आ गया ! सरकारी गाड़ी में पुरानी यादों में खोये आबिद को विशाखा ने पुकारा !
आबिद का यादों का झूला अचानक थम गया था !
आओ आबिद ये है तुम्हारी दीदी का घर ! विशाखा ने गर्मजोशी से आबिद का स्वागत किया !
डिनर के बाद आइसक्रीम खाते हुए आबिद ने विशाखा से पुछा : दीदी आप इतने साल मुझ से मिली क्यों नहीं ? आपने मेरी हर ज़रुरत का ख्याल रखा फिर भी आप मुझ आज मिली जब मैं कुछ बन गया और नौकरी शुरू करने वाला हूँ , क्यों ? मुझे भी खुद से मिलने नहीं दिया , क्यों ? हर बार प्रिंसिपल से कह कर मुझे अपना पता देने से मना कर दिया !
अचानक डाइनिंग टेबल पर माहौल बदल गया था !
विशाखा ने खाना परोसने वाले सहायक को अंदर जाने को कहा !
विशाखा : क्या ये सब जानना ज़रूरी है आबिद ? आज हम दोनों एक दूसरे के साथ हैं क्या ये ही कम है ?
आबिद : हाँ वो तो ठीक है पर क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं की मेरी परवरिश करने वाले ने क्यों मुझे खुद से अलग रखा इतने दिन ? आप बताइये और अभी बताइये !
आबिद ने अपनी चम्मच प्लेट में रखी पिघलती आइसक्रीम पर रख दी और आँखे नीची कर कर चुप हो गया !
विशाखा जैसे ऐसे अधिकार को तरस रही थी ! कोई उस से ऐसा अधिकार जताता ! वो उठी और आबिद के करीब आ कर खड़ी हो गयी ! आबिद लिपट गया अमर लता सा विशाखा से ! अपने जीवन को सँवारने वाले से शिकवा करता हुआ ! विशाखा ने आबिद की आँखों टपकती लालसा देखी जो चाहती थी की उसे पता चले की माँ के बाद दूर रह कर भी कैसे कोई उसकी माँ का फ़र्ज़ निभा रहा था !
विशाखा ने आबिद के चहरे को दोनों हथेलियों से सँभालते हुए कहा : अच्छा चल , ये आइसक्रीम फिनिश कर फिर वाक पर चलते हैं , सब बताती हूँ !
विशाखा : वैभव भैया की शादी के बाद मैं ट्रेनिंग पर चली गयी ! बीच बीच में मैं विपुल से बात करती रहती थी ! तुम्हारा हाल भी मिलता रहता था ! एक साल के बाद मेरी ट्रेनिंग खत्म हुई ! मुझे पहली पोस्टिंग मिली ! मैंने ख़ुशी ख़ुशी विपुल को फ़ोन किया लैंड लाइन पर तो मुबारकबाद के बाद उन्होंने बताया की फातिमा बी नहीं रही ! मुझे तुम्हारी चिंता हुई ! तब मैंने और विपुल ने तुम्हे अच्छे हॉस्टल में दाखिल करने का फैसला लिए ! हर महीने तुम्हारे स्कूल की फीस मैं भर्ती थी तो बाकि की चीज़ों का ख्याल विपुल करते थे ! दिन बीतते जा रहे थे , मैं और विपुल करीब आते जा रहे थे ! तुम्हारी पढ़ाई ज़रूरतों का वो ही ख़याल करते थे ! मैं तो बस अपनी सैलेरी का एक हिस्सा तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर करती थी जिसे वो ऑपरेट करते थे तुम्हारे लिए !
सुनते सुनते आबिद ने ध्यान दिया की अचानक दीदी ने विपुल भैया को उन्हें , उनके कह कर सम्बोधित करना शुरू किया था !
विशाखा तो जैसे पानी से बही जा रही थी यादों की सुरंगों से ,जिसके एक किनारे पर आबिद था तो दूसरे किनारे पर विपुल !
विशाखा : एक रोज़ विपुल ने मेरे सामने शादी का प्रोपोजल रखा ! अच्छा कारोबार था उनका ! अच्छा परिवार ! उनके परिवार ने मेरे चाचा जी से बात करी और शादी भी हो गयी ! कुछ दिन मैं रही भी अपने ससुराल फिर पोस्टिंग्स के कारण मुझे आना पड़ा ! व्यापार के कारन वो मेरे साथ नहीं आ सकते थे तो मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी ! बस फिर धीरे धीरे हमारा मिलना कम हो गया और पिछले ३ सालों से बिलकुल संपर्क नहीं है !
आबिद बीच में बोला : लेकिन इतना सब के बाद भी मुझे और मेरी पढ़ाई पर आप दोनों ने कोई असर नहीं होने दिया !
विशाखा : हाँ वो ख्याल रखते है बहुत तुम्हारा !
आबिद विशाखा से लिपट गया और ज़ोर से पकड़ लिया अपनी दीदी को ,रूंधे गले भीगी आँखों से कहता हुआ आप दोनों एक साथ क्यों नहीं है ?
विशाखा के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था !
अगले दिन !
आबिद तुम आज रहोगे ना तुम्हारी जॉइनिंग तो कल से है ना ? विशाखा ने आबिद के कमरे के परदे सरकाते हुए पुछा !
आबिद : हाँ दी !
ठीक है , लो ऑरेंज जूस पियो और फिर अपने आप प्लान कर लो सब ,मैं गाड़ी और ड्राइवर छोड़े जा रही हूँ !
आबिद : जी दीदी ! ड्राइवर वही है ना जिसे आपने मुझे लाने के लिए हॉस्टल भेजा था !
विशाखा : हाँ , वो ही हैं ! पहचान हो गयी उनसे तुम्हारी ? गुड !
शाम को विशाखा घर लौटी ! भीतर घुसते साथ लेवेंडर की खुशबू से सारा घर महक रहा था ! आबिद ने रजनीगंधा के गुच्छे से वेलकम किया अपनी दीदी का और कहा की आइये भीतर चलते है , विशाखा ने जैसे ही अगला कदम डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ाया सामने टेबल के उस छोर पर विपुल को बैठा देखा फिर नज़रे आश्चर्य से आबिद की तरफ कर ली !
डाइनिंग टेबल का माहौल बदल चूका था और पीछे दीवारों पर लगे वूफर्स पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ गूंज उठी "
" ओ शहज़ादी सपनो की ,
इतनी तू हैरान ना हो !
मैं भी तेरा सपना हूँ,
जान मुझे अनजान हो ! "
जनम जनम का साथ है ,
निभाने को ………
सौ सौ बार मैंने जनम लिए !!
विपुल , विशाखा और आबिद याद कर रहे थे उस गुलाबी पेन को जसे डाकिया ने माँगा था , जिससे लैंड लाइन नंबर लिखा था ................... उस बारिश की रात गोबी की पकौड़ियों की महक के साथ
~~~~ समाप्त ~~~~
एक कहानी : वो गुलाबी पेन !
::: मनीष सिंह :::
आबिद ने अपनी चम्मच प्लेट में रखी पिघलती आइसक्रीम पर रख दी और आँखे नीची कर कर चुप हो गया !
विशाखा जैसे ऐसे अधिकार को तरस रही थी ! कोई उस से ऐसा अधिकार जताता ! वो उठी और आबिद के करीब आ कर खड़ी हो गयी ! आबिद लिपट गया अमर लता सा विशाखा से ! अपने जीवन को सँवारने वाले से शिकवा करता हुआ ! विशाखा ने आबिद की आँखों टपकती लालसा देखी जो चाहती थी की उसे पता चले की माँ के बाद दूर रह कर भी कैसे कोई उसकी माँ का फ़र्ज़ निभा रहा था !
विशाखा ने आबिद के चहरे को दोनों हथेलियों से सँभालते हुए कहा : अच्छा चल , ये आइसक्रीम फिनिश कर फिर वाक पर चलते हैं , सब बताती हूँ !
विशाखा : वैभव भैया की शादी के बाद मैं ट्रेनिंग पर चली गयी ! बीच बीच में मैं विपुल से बात करती रहती थी ! तुम्हारा हाल भी मिलता रहता था ! एक साल के बाद मेरी ट्रेनिंग खत्म हुई ! मुझे पहली पोस्टिंग मिली ! मैंने ख़ुशी ख़ुशी विपुल को फ़ोन किया लैंड लाइन पर तो मुबारकबाद के बाद उन्होंने बताया की फातिमा बी नहीं रही ! मुझे तुम्हारी चिंता हुई ! तब मैंने और विपुल ने तुम्हे अच्छे हॉस्टल में दाखिल करने का फैसला लिए ! हर महीने तुम्हारे स्कूल की फीस मैं भर्ती थी तो बाकि की चीज़ों का ख्याल विपुल करते थे ! दिन बीतते जा रहे थे , मैं और विपुल करीब आते जा रहे थे ! तुम्हारी पढ़ाई ज़रूरतों का वो ही ख़याल करते थे ! मैं तो बस अपनी सैलेरी का एक हिस्सा तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर करती थी जिसे वो ऑपरेट करते थे तुम्हारे लिए !
सुनते सुनते आबिद ने ध्यान दिया की अचानक दीदी ने विपुल भैया को उन्हें , उनके कह कर सम्बोधित करना शुरू किया था !
विशाखा तो जैसे पानी से बही जा रही थी यादों की सुरंगों से ,जिसके एक किनारे पर आबिद था तो दूसरे किनारे पर विपुल !
विशाखा : एक रोज़ विपुल ने मेरे सामने शादी का प्रोपोजल रखा ! अच्छा कारोबार था उनका ! अच्छा परिवार ! उनके परिवार ने मेरे चाचा जी से बात करी और शादी भी हो गयी ! कुछ दिन मैं रही भी अपने ससुराल फिर पोस्टिंग्स के कारण मुझे आना पड़ा ! व्यापार के कारन वो मेरे साथ नहीं आ सकते थे तो मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी ! बस फिर धीरे धीरे हमारा मिलना कम हो गया और पिछले ३ सालों से बिलकुल संपर्क नहीं है !
आबिद बीच में बोला : लेकिन इतना सब के बाद भी मुझे और मेरी पढ़ाई पर आप दोनों ने कोई असर नहीं होने दिया !
विशाखा : हाँ वो ख्याल रखते है बहुत तुम्हारा !
आबिद विशाखा से लिपट गया और ज़ोर से पकड़ लिया अपनी दीदी को ,रूंधे गले भीगी आँखों से कहता हुआ आप दोनों एक साथ क्यों नहीं है ?
विशाखा के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था !
अगले दिन !
आबिद तुम आज रहोगे ना तुम्हारी जॉइनिंग तो कल से है ना ? विशाखा ने आबिद के कमरे के परदे सरकाते हुए पुछा !
आबिद : हाँ दी !
ठीक है , लो ऑरेंज जूस पियो और फिर अपने आप प्लान कर लो सब ,मैं गाड़ी और ड्राइवर छोड़े जा रही हूँ !
आबिद : जी दीदी ! ड्राइवर वही है ना जिसे आपने मुझे लाने के लिए हॉस्टल भेजा था !
विशाखा : हाँ , वो ही हैं ! पहचान हो गयी उनसे तुम्हारी ? गुड !
शाम को विशाखा घर लौटी ! भीतर घुसते साथ लेवेंडर की खुशबू से सारा घर महक रहा था ! आबिद ने रजनीगंधा के गुच्छे से वेलकम किया अपनी दीदी का और कहा की आइये भीतर चलते है , विशाखा ने जैसे ही अगला कदम डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ाया सामने टेबल के उस छोर पर विपुल को बैठा देखा फिर नज़रे आश्चर्य से आबिद की तरफ कर ली !
डाइनिंग टेबल का माहौल बदल चूका था और पीछे दीवारों पर लगे वूफर्स पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ गूंज उठी "
" ओ शहज़ादी सपनो की ,
इतनी तू हैरान ना हो !
मैं भी तेरा सपना हूँ,
जान मुझे अनजान हो ! "
जनम जनम का साथ है ,
निभाने को ………
सौ सौ बार मैंने जनम लिए !!
विपुल , विशाखा और आबिद याद कर रहे थे उस गुलाबी पेन को जसे डाकिया ने माँगा था , जिससे लैंड लाइन नंबर लिखा था ................... उस बारिश की रात गोबी की पकौड़ियों की महक के साथ
~~~~ समाप्त ~~~~
एक कहानी : वो गुलाबी पेन !
::: मनीष सिंह :::
दिन बीतते जा रहे थे , मैं और वैभव करीब आते जा रहे थे sir i think Vipul should be there instead of Vaibhav.
ReplyDeleteThank You Rakesh Ji Edited with correction of Name ....
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