" नीलायन " आसमान छूते चिनारों के बीच कोहरे से खेलता हुआ गेस्ट हाऊस की तरफ बढ़ रहा था , की किसी ने पुकारा - चाय पियोगे बेटा ?
पुआल की छाई छोटी सी दूकान में उलटी सीधी बुनाई का दर्ज़नो रंग वाली ऊन से बना मफ़लर और स्वेटर जिसमे ऊपर नीचे बटन लगे थे ! बेतरतीब , लेकिन साफ़ सफ़ेद रंग की गले में लिपटी चुन्नी ओढ़े हज़ारों तजुर्बों समेटे एक बुज़ुर्ग महिला पनीली आँखों से " नीलायन " की तरफ देख रही थी !
गठीले शरीर का २३ - २४ साल का लड़का नीलायन कानो से ईयर फ़ोन निकालते हुए झुक कर दूकान में दाखिल हो गया ! एक करिश्माई खिचाव था उस आवाज़ में ! सवेरे मॉर्निंग वॉक के बाद रोज़ ताज़े फलों का जूस पिने की आदत वाला नीलायन , आज चाय की ऑफर को टाल नहीं सका था !
नीलायन : जी , आम्मा जी पिलाइये आज , चाय ही पियेंगे !
बड़ी ही सादगी और अपनत्व से पास रखे स्टूल पर बैठते हुए उसने मोबाइल का स्विच ऑफ किया और पूरा ध्यान चूल्हे और अदरक कूटती बूढी कलाइयों पर केंद्रित कर लिया ! गहरे आसमानी रंग की टी शर्ट ! काजली काले रंग के शॉर्ट्स ! मंहगे स्पोर्ट्स शूज़ और सफ़ेद जुर्राब ! सर्दी की सुबह भी हलके पसीने में लाल चेहरे वाला सुन्दर और सोबर किशोर नीलायन अम्मा की चाय का इंतज़ार करने लगा !
ये , लो बेटा !
बूढी अम्मा ने काँच के गिलास में चाय आगे बढ़ाई और पुछा : मठरी खाओगे ?
नीलायन : जी हाँ , दे दीजिये !
वो सामने रखी काँच के मर्तबान है , जीतनी चाहे ले लो : अम्मा बोली और अपने लिए चाय छानने लगी !
एक हाथ में चाय और दूसरे से मठरी का स्वाद लेते हुए नीलायन अम्मा को एक टक देखता जा रहा था और सोचता था की आज क्या हुआ उसे , बचपन से किस हाइजीनिक माहौल में पला बढ़ा और नौकरों की देख रेख में बड़ा हुआ और आज अचानक ये उसे क्या सूझी की सड़क किनारे लकड़ी के चूल्हे पर पकती काले से बर्तन की चाय और मठरी खाने लगा ? क्या था उस अम्मा की आवाज़ में की जो सब पर भारी पड़ गया ? एक बार भी ख़याल नहीं आया की माँ को पता चला तो क्या होगा ? साथ में आये किसी डेलीगेट मे से किसी ने देख लिया तो क्या सोचेंगे उसके बारे में ? अगर मेडिकल टीम को खबर लगी तो विजिटिंग इंश्योरेंस तो इमिडिएट खत्म देंगे और दिल्ली लौट कर इंस्टिट्यूट में जो जवाब देना पड़ेगा वो अलग !
नीलायन की पलकें झपक ही नहीं रहीं थीं ! चाय और मठरी अपने आप बारी - बारी से होठो तक चले जा रहे थे ! दिमाग कहीं और था , शरीर कहीं और तो आँखे कुछ देख कर संतुष्ट थी , मन और जुबान को चाय मठरी ने कंट्रोल किया हुआ था !
बीच बीच में कोहरा चूल्हे की नज़र बचा कर नीलायन गालों को छु जाता था ! होठ खुश्क होते जाते थे !
इसी बीच अम्मा की आवाज़ ने उसका ध्यान तोडा : लाओ थोड़ी और गरम चाय डाल दूँ बेटा गिलास में ठण्ड ज़्यादा है ना और कोहरा भी है !
बीच बीच में कोहरा चूल्हे की नज़र बचा कर नीलायन गालों को छु जाता था ! होठ खुश्क होते जाते थे !
इसी बीच अम्मा की आवाज़ ने उसका ध्यान तोडा : लाओ थोड़ी और गरम चाय डाल दूँ बेटा गिलास में ठण्ड ज़्यादा है ना और कोहरा भी है !
नीलायन ने झट से गिलास चायछन्नी के नीचे कर दिया और दूसरे हाथ से दूसरी मठरी निकाल कर चाय में डुबोते हुए बुदबुदाया : आप , बहुत अच्छी चाय बनती है !
अम्मा : अच्छी लगी तुम्हे ?
नीलायन : जी , बहुत बढ़िया !
ये होठो पर खुश्की बहुत है तुम्हारे , लो ये थोड़ी सी मलाई लगा लो !
नीलायन : नहीं अम्मा जी गेस्ट हाउस में वेसलीन है , लौट का लगा लूँगा !
अम्मा : हाँ हाँ , वो तो लगा लेना , तब तक ये लगा लो !
नीलायन ने हलके से दो अँगुलियों से मलाई होठो पर लगाते हुए पुछा : इतने जंगल में आप अकेले रहती हैं ?
अम्मा : नहीं तो , ये लोग हैं ना मेरे साथ !
नीलायन : कौन लोग ?
अम्मा : ये पेड़ पौधे, पंछी , आस पास के जानवर !
नीलायन : कोई अपना नहीं है आपका ?
अम्मा : सब अपने ही तो हैं !
नीलायन : मेरा मतलब आपके नाते रिश्तेदार और कोई भी !
अम्मा : अच्छा वैसे , सब थे लेकिन एक एक कर के चले गए !
नीलायन : कहाँ चले गए ?
अम्मा : तरक्की के रस्ते पर !
नीलायन गंभीर हो गया था !
सर्द हवाएँ अपने साथ धुंध लिए घूम रहीं थीं की कहीं रौशनी दिखे तो जकड कर स्याह कर दे , कुछ पलों के लिए ही सही !
चाय खत्म होने को थी और समय ज़्यादा हो चला था ! सूरज का नमो निशाँ नहीं था जिसमे सिहरन बढ़ती जाती थी की तभी स्टूल के नीचे मखमली एहसास हुआ उसे अपने घुटनो के पास , जैसे कोई मलमली चीज़ उस से चिपकती जाती थी गर्म एह्साह के साथ ! उसने देखा छोटा दूधिया रंग का मेमना उसके दोनों पाओ के बीच लगभग बैठ गया था ! नीलायन असमंजस में था की क्या करे ! उस मेमने के विशवास को तोड़ कर उसे खुद से अलग कर दे या फिर वहीँ बैठा रहे उसके उठने और हवाओं के थमने तक !
नीलायन उठ ना सका किसी के विशवास पर खरा उतरने के लिए !
अम्मा ने धुंध और कोहरे में सिकुड़ती हुई चुप्पी तोड़ी : तुम यहाँ जंगल में कैसे ? कहाँ के हो बेटा ?
जी , हूँ तो पहाड़ का ही लेकिन बचपन दिल्ली में गुजर गया और जवानी में काम मिल गया तो शहर शहर घूमता फिरता हूँ : नीलायन ने मेमने की गर्दन को अपने पाँव के पंज्जों पर ठीक से सहारा देते हुए जवाब दिया !
बेटा लो ये शॉल पाँव पर रख लो , ठण्ड लगती होगी ! कहते हुए अम्मा ने एक चटक लाल और सफ़ेद रंग का शाल उसकी तरफ बढ़ा दिया जिसे नीलायन ने सलीके से अपने दोनों पाओ पर ऐसे रखा की नीचे बैठे नन्हे जीव के आनंद में खलल पड़े !
नीलायन : अम्मा आप कभी अरुणाचल प्रदेश गयी है ?
अम्मा : नहीं तो , पर क्यों ?
नीलायन : ऐसे शॉल वहीँ मिलते हैं , इस लिए पूछ रहा था !
अम्मा : अरे नहीं मेरा सबसे बड़ा बेटा शायद वहीँ रहता है , आया था पिछले बरस बहुत सा सामान दे गया उनमे से एक ये भी था !
आपके कितने बेटे हैं : नीलायन ने गंभीरता से पुछा !
अम्मा : दो !
दोनों आपके पास नही रहते ?
ना !
वो क्यों ?
बस वो खुश हैं वैसे ही और में खुश हूँ ऐसे ही !
कभी याद आती है उनकी ?
हमेशा याद करती हूँ ! इस संसार में अपनों के नाम पर वो दोनों और उनका परिवार ही है लेकिन सब दूर हैं और इस तेज़ चलते संसार में मेरे पास रह कर वो पीछे छूट जाएंगे इस लिए मैं उनकी दूरी ही अपना भाग्य और उनका भविष्य समझती हूँ !
अम्मा ने चूल्हे में थोड़े लकड़ी के कोयले झोंकते हुए बोली !
नीलायन जैसे जड़ हो चला था ! घुटनो तक के शॉर्ट्स में टंगे ठण्ड से कपकपा रही थी लेकिन रिश्तो नातों की धधकती आँच से सब कुछ जैसे मस्तिष्क में पिघल सा रहा था !
एक नहीं , अनगिनत द्वंदों ने घेर रखा था उसको !
उलझन !
उधेड़बुन सब अप्रयाषित !
ये सब क्यों किया हुआ है उसने खुद ! इतना अच्छा जीवन है ! काम है , दोस्त हैं , कोई कमी नहीं है फिर भी कम क्यों आँकता है वो खुद को इन सब के बीच ? क्या समेटने की कोशिश में है वो की बार बार फिसल जाता है ? इतनी उम्र में नई ज़िन्दगी के ख्वाब देखने वाले किशोर युवक के सामने ये क्या समय है की वो खुद से बार बार हार जाता है और जिन्हे जीताने के लिए हारता है वो और कमज़ोर दिखाई देने लगते हैं ! क्या करे नीलायन , किस आसमान को चुने की उसके एक अकेले की सांस की पतंग कितनी डोरियों से एक साथ सब से बंधी रहे और एक से दूसरी डोरी को पता भी ना चले की वो किस के सहारे से नीलाभ में उड़ रहा है ! लेकिन कब तक करेगा वो ये सब ? एक अंतहीन सफर सा लगता है !
क्या हुआ बेटा ? कुछ परेशानी है ? नीलायन के कन्धों पर हाथ रखते हुए अम्मा ने पुछा !
नीलायन को अचानक जैसे अम्मा ने अपरिभाषित संबंधों की धधकती आँच से दूर कर लिया था !
हाँ हूँ तो ! नीलायन ने सर नीचे की तरफ अपने जूतों से मिटटी कुरेदते हुए रूंधे गले से कहा !
अम्मा उसके और करीब आ कर बैठ गयी थी अब !
क्या हुआ , मुझ से कहो मन हल्का लगेगा !
नीलायन की आँखों से कुछ बूंदे मेमने के कानो पर पड़ी, अनमना सा हो कर फिर भी वो लिपटा रहा उसके पैरों से !
क्या बात है बेटा बताओ मुझे , अम्मा ने चूल्हे से दूध का पतीला नीचे उतार दिया था और पास आ कर बैठ गयी थी उसके पास ! नीलायन की गालों पर उतरती आंसूओं की बूंदें सुर्ख गुलाबी रंग पर बेरंग रेखाएँ खींच रहीं थी ! अम्मा ने उन्हें पोंछते हुए कहा ! बोलो बेटा , अंदर ही अंदर मत घुटो सब कह डालो मुझ से मैं हूँ यहाँ जो सब कुछ सुनेगी !
नीलायन छोटे बच्चे सा अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लगा ! बरसों से घुटन का बुलबुला तेज़ आवाज़ और आंसुओं के साथ फूट गया था ! शांत पहाड़ और सलीके से बहते कोहरे के बीच अम्मा की गोद में सर रख कर रोता नीलायन किसी झरने सा फूट गया था जिस से रिसती गरम आँसुंओं और आवाज़ के रूप में भावों की धाराएं कभी कभी अम्मा को भी धैर्य खोने पर मज़बूर कर देती थी !
धीरे धीरे शांत होते , सुबकते नीलायन को बिलकुल नहीं रोका अम्मा ने ! रो लेने दिया ! बह जाने दिया २५ साल की धार को अपनी गोद में जिसे तलाश थी बरसों से एक शिवजाटा की जो थाम सके ये सैलाब ! दूकान में शरण लेता कोहरा धुंध अब सुस्ता रहे थे ! मेमना किनारे खड़ा हो कर उसे देखता था , अचंभित !
अम्मा ने नीलायन के सर पर हाथ फेरा ! वो शांत था !
जैसे चूनापत्थर में कुछ बूँद पानी के पड़ते ही तेज़ प्रतिक्रिया के बाद शांत हो कर सब कुछ सौंप देते है पानी को , आज नीलायन गले तक भरे उलझन और द्वंदों के पत्तथरों को अम्मा के नेह रुपी पानी में घोल चूका था और बह चला था सर को उनकी गोद में रखे रखे अपनी उलझन बताता हुआ !
अम्मा जी सब हैं , माँ हैं , पिता हैं , बड़ा घर है , नौकर चाकर हैं और आज के ज़रूरतों के लिए जो चाहिए वो सब है बल्कि उस से भी ज़्यादा है लेकिन ये सब पिछले १० सालों से मुझे खुशियां नहीं देता ! मुझे परेशान करता है !
अम्मा ने पुछा : वो क्यों बेटा ?
तब मैंने दसवीं पास करी थी ! जैसे सब नानी के घर जाते हैं मैं भी गया था ! एक रात सब गर्मी के कारण बड़े से मकान की छत पर सो रहे थे ! मेरी आज की माँ भी सो चुकी थीं ! मुझे नींद नहीं आई इस लिए मैं जाग रहा रहा तब मैंने अपनी छोटी मौसी को नानी से बात करते सुना ! वो कह रही थीं की ये अच्छा हुआ की बीच वाली दीदी के बेटे को हमने बड़ी दीदी को दे दिया इसकी भी ज़िन्दगी बन गयी और हमारी दीदी की भी जान बच गयी !
दरअसल मेरी आज का माँ मेरी बायोलॉजिकल माँ नहीं है ,और वो ये जानती भी नहीं हैं ! उस दिन तक मुझे भी पता नहीं था ! अब मुझे पिछले १० - १५ सालों से दोहरी ज़िन्दगी जिनि पड़ रही है !
माँ को देख कर उनसे हिम्मत नहीं होती सच्चाई कहने की और कभी असली माँ से मुलाक़ात होती है तो उनकी आँखों में अपनत्व देख कर और चाह कर भी उनसे मन की कह नहीं पाता की मैं जनता हूँ की आप मेरी माँ हैं ! पिता जी के पास जा कर मैं झगड़ नहीं सका उस दिन के बाद से किसी भी चीज़ के लिए अधिकार से ! वो अधिकार मुझ से किसी ने छीने नहीं लकिन मैंने खुद को उनके लिए कमतर मानना शुरू कर दिया ! ये सब मेरा है नहीं मुझे तो बस दिया गया है किसी की जान बचाने के लिए तो किसी का बोझ कम करने के लिए !
अम्मा करुणा के पानी से भीगे नीलायन के शब्दों को सुनती जाती थीं और समझने की कोशिश करती थी की कैसे जीता था नीलायन सब जान कर भी अनजान रहते हुए की कही किसी को ठेस ना पहुंचे ! कितना परेशान रहा होगा ये बच्चा ! किस से कहे की वो सब जनता है जो उसको नहीं जानना चाहिए था और उस से भी बड़ी बाद वो किसी को कहता नहीं की कही किसी के इतने सालों के बना रेत का क़िला ढह ना जाये ! सब कुछ अपने ऊपर ही झेलता हुआ रहा और आज ज़रा सा सहारा मिला तो निरंतर बह निकला , भरभरा गया !
अम्मा की गोद में सर रखे नीलायन सब कहता कहता कर शांत हो चूका था की उन्हें लगा की कोई तीसरा भी वहां था जो ये सब सुन रहा था !
आप कौन हैं ? अम्मा ने पीछे देखा तो गले तक सुन्दर कला ऊनी मफ़लर पहने एक सोबर लड़की नीले काले स्वेटर में खड़ी शांत हो कर सब सुन रही थी !
कौन हो आप ? अम्मा ने दोबारा पुछा !
नीलायन भी अब तक संभल चूका था , उसने उठते हुए देखा तो दूर उसकी बैचमेट खड़ी थी !
अरे , तुम यहाँ कब आई निहारिका ? : नीलायन ने अपनी सूजी हुयी आँखों को पोंछते हुए पुछा !
निहारिका डबडबाई आँखों से जवाब में मुस्कुरा दी !
अम्मा जी ये निहारिका है , हम साथ में काम करते हैं और इस ट्रिप में साथ आए हैं !
अम्मा निहारिका को और निहारिका निलायन को देखे जा रहे थे !
क्यों तुमने सब मुझ से शेयर नहीं किया इतने दिन ? निहारिका ने गंभीरता से पुछा !
नीलायन : क्या , शेयर करना था ?
निहारिका : जो कुछ आज मैंने सुना !
नीलायन : क्या ? तुम ने सब सुना ?
निहारिका : हाँ , एक एक शब्द सुना !
नीलायन : ओहह , तो फिर हम आज के बाद ना मिले ?
नहीं , आज के बाद ऐसे बंधन में बंध जाएंगे की फिर अलग ना हो : निहारिका बोली !
अम्मा जी ने चाय की केतली गर्म करने को चूल्हे पर रख दी थी ! मेमना शॉल के साथ दुबका बैठा था और दूर चिनारों से सूरज झाँकने की कोशिश कर रहा था की भविष्य कैसे आकार लेता है दो मानस के मध्य !
लो बेटा चाय पियो और भूल जाओ उन सब बातों को जो तकलीफ देती हैं , साथ दो सिर्फ उस का जो आनंद देता हो और साथ चले !
नीलायन और निहारिका हाथो में हाथ डाले गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ चले अम्मा की तरफ हाथ लहराते हुए फिर आने के वादे के साथ !
अम्मा , मेमना , चूल्हा, चाय की केतली और मठरी का मर्तबान उन दोनों को जाते हुए देख रहे थे वापस आने की आस में !
एक कहानी : नीलायन
** समाप्त **
Very Nice... Your Story Description and Transition is excellent... Great Work.
ReplyDeleteThank You Paras.. keep reading and commenting ...
DeleteVery Touchy
ReplyDeleteVery smooth story. Surprise end as usual. you are master in creating scene by words.
ReplyDeleteHello Lav ...
DeleteThanks Bhai .... keep reading and commenting to work more harder and create such scenes ......