वो रोज़,
अंगीठी कि आँच पर,नुक्कड़ नुक्कड़,
गलियों गलियों,
पराठे पकाता है,
रोटियों के लिए !
और ,वो भी,
रोज़, भटकता है,
दफ्तरों-दफ्तरों,
डिग्रियाँ लिए,
उम्मीदों पर !
अंततः
कच्चे कोयले सा,
ज़रूरतों,
ज़िम्मेदारियों,
कि अंगीठी में,
खुद को पकता पाता है,
केवल,
रोटियों के लिए !!
:: मनीष सिंह ::
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