Monday, March 31, 2014

केवल, रोटियों के लिए !!

वो रोज़,
अंगीठी कि आँच पर,
नुक्कड़ नुक्कड़,
गलियों गलियों,
पराठे पकाता है,
रोटियों के लिए !

और ,वो भी,
रोज़, भटकता है,
दफ्तरों-दफ्तरों,
डिग्रियाँ लिए,
उम्मीदों  पर !

अंततः
कच्चे कोयले सा,
ज़रूरतों,
ज़िम्मेदारियों,
कि अंगीठी में,
खुद को पकता पाता है,
केवल,
रोटियों के लिए !!

:: मनीष सिंह ::

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