Thursday, April 3, 2014

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !!

       "राजधानी एक्सप्रेस कोटा स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे-धीरे सरकने लगी थी ! अटेंडेट हाथों में आइस्क्रीम के कार्टन लिए बारी बारी से लकड़ी कि चम्मचों के साथ पूछ पूछ कर यात्रियों कि पसंद के फलेवर सर्व कर रहे थे ! "

बी6 कि साइड लोअर बर्थ पर बैठे आलोक से अटेंडंट ने उसकी पसन्द पूछी ? 

सर , आपके लिए कौन सी रखूँ ? 

आलोक लगभग कॉप सा गया ,अंतस कि उधेड़-बुन को जैसे बाहरी विराम मिले हों ! 

जैसे मंदिर में जलते दिये कि लौ अचानक आये हवा के झोंके से काँप उठती है !

अटेंडेंट : सर , आपका डिनर तो ठंडा हो चुका  है , लाइए में दूसरा ला देता हूँ !

आलोक ने मूक सहमति दी !

अटेंडेंट ने दूसरी गरम थाली ला कर आलोक के सामने रख दी और कहा :

सर , डिनर कीजिये मैं आइस्क्रीम सर्व कर के आता हूँ ! आप का कौन सा फलेवर रहेगा ? 

आलोक ने अनमने मन से कहा : कोई भी दे दो !

अंकल , पिंक वाली लीजिये बहुत अच्छी है ! सामने कि बर्थ पर बैठे परिवार कि बच्ची ने अपनी निष्काम राय दी !

          आलोक के विचलित और अधीर मन कि कम्पन को जैसे बच्ची कि आवाज़ से दो ठंडी हथेलियों का सहारा मिला हो ! उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए बच्ची कि तरफ और बच्ची के रूप में असीम आनंद आलोक के गले से लिपट गया , बिना देर किये !

         किसी को नहीं पता , क्यों और कैसे ये रिश्ते बन जाते है सफ़र में , और क्यों और कैसे रिश्ते दरक भी जाते है अत्याधिक आशाओं के ताप से शायद , ज़िन्दगी के इस सफ़र में ही  !

          डबडबाई आँखों से आलोक ने आइस्क्रीम के कप को अपनी हथेलियों में रख लिया और बच्ची गौरैया सी चहकते हुए उसमे लकड़ी कि चम्मच डूबोने लगी ! आलोक भीतर तक तृप्त होता जा रहा था स्नेह और अपनत्व धारा से ! सालों हो गए थे अपने बेटे को गोद में उठाये अलोक को , अब तो गोद लायक नहीं होगा , उसकी अँगुली पकड़े भी बरसों बीते !

" दिशा " , अंकल को डिनर कर लेने दो , फिर चले जाना उनके पास ! बच्ची के पिता ने बच्ची से आग्रह किया !

दिशा  ठीक है कहते हुए अपनी बर्थ पर आ गयी !

आलोक ने डिनर किया और नाईट सूट ले कर टॉयलेट कि तरफ बढ़ा तो किसी ने आवाज़ लगाई :

" तुम कबीर ही होना ? "

आलोक अचंभित था अपने बचपन के नाम को सुन कर जिसे उसने कब का भुला दिया था माँ के जाने के बाद  !

हाँ , तुम कौन ? आलोक ने पुछा !

        कोच के भीतर रौशनी कम हो चली थी ! लोग ऊंघने लगे थे ! कुछ ने परदे भी सरका लिए थे जिस से रौशनी और कम हो जाती थी , चेहरे साफ़ साफ़ नहीं दिखते थे !

आलोक ने थोडा झुकते हुए उस आवाज़ वाली बर्थ कि तरफ हो कर फिर से पुछा : कौन हो तुम ?

मुझे साक़िब  कहते हैं कबीर साहब : आवाज़ लगाने वाले शख्स ने उठते हुए जवाब दिया !

आलोक के मुँह से कुछ भी नहीं निकल रहा था !

         मानो शब्द रास्ता भटक गए हों और ज़ुबान वाक्य बनाने के लिए दिमाग से गुहार लगा रही हो और आँखे सब कुछ देख कर इधर उधर ताक रही हो जैसे खुद से निगाहे चुरा लेना चाहती हो कि ऐसा भी हो सकता है, भला !

सम्भलते हुए आलोक बोला : अरे साक़िब आज मिले हो दोस्त ! कितना ढूँढा तुम्हे ! वो उधार कि कुल्फ़ी  याद है कि नहीं ?

साक़िब ने आलोक को बैठने को कहा ! दो पुराने दोस्त सालों बाद मिले थे !

आलोक ने साक़िब से दरवाज़े के पास चलने को कहा : भाई लोग सो रहे हैं !

साक़िब ने स्लीपर पहनते हुए चलने का इशारा किया !

साक़िब : क्या, कहाँ , कब से हो ?

आलोक : मुम्बई में एक बड़ी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

साक़िब : 3rd  ए सी से क्यों ?

आलोक : कहीं नहीं मिला तो इस में ही आना पड़ा ,अमूमन ऐसे नहीं आता ! मुझे ट्रेन में चलना पसंद नहीं है !

सुनते ही , साक़िब ने अपने हाथों में लिया छोटा पेकेट धीरे से पीछे छुपाने कि कोशिश करी !

आलोक :  क्या छुपा रहे हो ?

साक़िब : कुछ नहीं , तुम्हे पसंद नहीं आएगा !

लेकिन ये है क्या कहते हुए आलोक ने साक़िब से ज़बरदस्ती पेकेट छीन लिया !

            छोटी चाय कि पत्ती कि खाली पोलिथीन में बंधे घर के बने कुछ नमकपारे और मठरी थी उस पेकेट में जिसे साक़िब कि पत्नी ने सफ़र के लिए दिया था साक़िब को और बड़े उत्साह से साक़िब ने सोचा था कि बरसों बाद मिले अपने बचपन के दोस्त को घर का पका कुछ खिलाएगा लेकिन उसके एक कथन से कि ट्रैन में  चलना उसको पसंद नहीं , से हिम्मत नहीं पड़ी और छुपाने कि कोशिश कर के भी नहीं छुपा सका !

आलोक  ने मठरी का एक टुकड़ा चखते हुए तारीफ में कहा : भाभी जी तो बहुत अच्छा पकाती है ! तभी साक़िब के फ़ोन कि घंटी बजी और बंद हो गयी !

आलोक : साक़िब सुन लो किसी कि मिस कॉल है !

साक़िब : हाँ वो वाइफ कि ही होगी , कर लूँगा बात अभी तुझ से तो मन भर लूं , ले तू नमकपारे खा !

इस बीच एक बार फिर घंटी बजी और बंद हो गयी !

इस बार आलोक ने साक़िब से कुछ कहा नहीं बस देखा !

साक़िब ने अपने फ़ोन में देखा दोनों बार उसके घर से ही फ़ोन था ! उसने कॉल बेक किया !

आपने डिनर किया पापा ? साक़िब के बेटे ने दूसरी तरफ से पुछा !

साक़िब के चेहरे पर खीची तनाव कि रेखाये अचानक ग़ायब हो चुकी थीं जो बार बार फ़ोन कि घंटी के बजने से बनी थीं आलोक से सामने ! घर के सब लोगो से बारी बरी से बात करते करते साक़िब आलोक को भूल चूका था !

          ट्रेन धीरे धीरे नागदा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी ! राजधानी के आने से कोई सामान बेचने वाले भी आस पास नहीं आते , क्यों ट्रेन से सफ़र करने वालो ने न चाह कर भी अद्रश्य दूरी जो बना ली होती है , कूलीन होने  और बन जाने के बीच !

साक़िब ने आलोक कि तरफ देखा !

वो एकटक साक़िब के चहरे पर आते ख़ुशी के भाव और सन्तुष्टि से जीवन का आनंद लेता दिख रहा था !

ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरक रही थी ! साक़िब ने अटेंडेंट से दो आइसक्रीम मांगी !

सर फलेवर तो सिर्फ एक ही है दोनों एक सी ही दे दूं ? अटेंडेंट ने झिझकते हुए कहा !

हाँ हाँ दो कोई भी दो : आलोक बोला !

आलोक ने साक़िब से पुछा : तुम क्या करते हो ?

साक़िब : एक पक्की नौकरी कि तलाश में हूँ ! अपने गाव से आई टी आई किया था !  गाव में ही एक दूकान पर काम करता रहा ! अब शहर में एक कंपनी के ऑथोरीज़ेड सर्विस सेंटर पर कॉन्ट्रैक्ट पर काम करता हूँ ! जहाँ भी काम होता है कंपनी भेजती है ! अभी बरोड़ा जा रहा हूँ ! कंपनी ने टिकट दिया तो राजधानी का सफ़र नसीब हुआ वर्ना कहाँ ये सब मेरे बूते में है ! दो बच्चे है और बीवी , कुछ ना कुछ कर के महीना चला लेता हूँ ! बच्चे पढ़ रहे है ! बस अपनी तो ये ही है ! सुबह निकला तो शाम को बच्चो के चेहरे देख कर सब भूल जाता हूँ !

ट्रेन रतलाम स्टेशन पर लग रही थी !

आलोक : आ चल एक एक कुल्फी खाते हैं ! यहाँ का स्टॉपेज ज़यादा है , मुझे पता है !

दोनों रतलाम स्टेशन पर आधी रात के वक़्त कुल्फी खा रहे थे और खो गए पुरानी यादों में ! 

       क़बीर इतनी दोपहर में कहाँ जा रहे हो ? सात आठ साल के कबीर से उसकी माँ ने दरवाज़े से बहार निकलते हुए पुकारा !

       कबीर बचपन में गर्मियों कि छुट्टियों में अपनी नानी के घर जाया करता था ! वहीँ साक़िब उसका दोस्त हुआ ! दोपहर में धुल उड़ाती लू और नीम के पेड़ के नीचे " बॉम्बे कुल्फी " के नाम से गाव का ही एक लड़का अपनी जादुई पेटी को ठेले पर  लिए गॉव भर में घूम घूम कर कुल्फी बेचता था ! तेज़ धुप में कुल्फी खाते दोस्त जीवन के उतार चढ़ाव से अनजान धूल भरी पगडंडियों से खेत खेत घूम आते थे ! समय बीता , कबीर का गाव आना कम होता गया और शहर के बड़े स्कूल में दाखिले के वक़्त कबीर आलोक हो गया और साक़िब गाव के ही आई टी आई में दाखिल !

आलोक : तू मेरे साथ चल , दिल्ली !

साक़िब : कहाँ जा सकूंगा ! खैर घर पर कौन कोन है तेरे ?

आलोक : मेरे घर पर मुझे कोई मठरी और नमकपारे बना कर देने वाला नहीं है ! कोई नहीं है जो मेरे रात के खाने कि खबर ले ! कोई नहीं है जो मुझे से रात कि सलामती कि दुआ ले या दे ! दरअसल में किसी घर में रहता ही नहीं हूँ ! मैं तो ईंट पत्थरों के मकान में रहता हूँ ! कभी घर था ये भी पर बीवी बच्चो के चले जाने के बाद अब नहीं है !  

साक़िब हैरत से सब सुन और देख रहा था ! दोनों ट्रेन के सरकने के साथ उस पर चढ़ गए ! ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार पर थी और आलोक अभी शुरुआत भी नहीं कर सका था जीवन के सफ़र कि , ऐसा साक़िब समझ रहा था !!

ट्रेन बरोडा स्टेशन पर खड़ी थी !

साक़िब ने झिझकते हुए आलोक से कहा : कबीर अगर तू मेरे साथ मेरे घर चलता तो अच्छा था !

कबीर को जैसे ऐसे ही अनुरोध कि आशा थी !

अगले दिन कि रात को कबीर कि गोद में बैठा साक़िब का बेटा डिनर करते हुए केह रहा था :  चाचा आज खाने के बाद आइसक्रीम खाने चलेंगे , चौराहे पर " बॉम्बे कुल्फी " वाले के पास !

साक़िब : यहाँ भी एक उसी नाम का कुल्फी वाला है , खूब भीड़ होती है गर्मियों में शाम के वक़्त !

कबीर ने हाँ बेटा कहते हुए सफ़ेद रुमाल से भीगी पलकें पोंछ लीं और बोला : और कल चलेंगे आपकी चाची और कमल को लेने !

साक़िब का बेटा : हाँ चाचा , अब बहुत दिन हुए !

साक़िब के बेटे ने एक बड़ी बात कह दी थी !

        असंख्य उत्तर असंख्य सवालों के आने से पहले दिए जा चुके थे आलोक के द्वारा ! पिघलती कुल्फी से चिपकती उँगलियों कि  गुफ्तगू कई कहानियाँ  कहती  थीं, तो रात के सन्नाटे गुपचुप पलकों के नीचे छुपी बूंदो में आहिस्ता-आहिस्ता सब सुनते जाते थे !

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !

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