गली का शीशम,
कही नहीं जाता !
मोहल्ले का
साँझा तंदूर,
नेवाड़ की चारपाई,
रेत में दबे,
पानी के मटके,
इंटों का चबूतरा,
सब इसके नीचे,
जन्मे ,शेष हुए !
बूढी नानी का भय,
अब नहीं !
दोपहर भर,
खेलते फिरते है,
शीशम,
नहीं रोकता,
नई पीढ़ी को,
कथित प्रगति से !
हम दूर हो गये
स्वयं की
नीवों से !
गतिशीलता,
पुनः परिभाषित,
होना चाहती है !
छिछली,
नीवों के सहारे !
::: मनीष सिंह :::
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