अग्नि, अंतिम शुद्ध है !!
अग्नि,
अंतिम शुद्ध है !
संपर्क में आते,
कंटकों पाषाणों,
चल ,अचल,
निम्न, उच्च,
जीव, निर्जीव,
अतिशुद्ध,
हो जाते हैं !
अपनी पहचान,
खोते हुए !
संबंध कंटक
हो जाते हैं,
संपर्क दूरस्थ
की सम्भावना,
तलाशते है,
पाषाण से व्यक्तित्व,
पिघल जाते हैं,
जब क्रोधाग्नि,
पनपती है ,
अशुद्ध से,
व्यवहार में ,
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