Monday, February 18, 2013

मैं हूँ , माँ तुम भी हो - मेरे जीने में !

युग , संसार, पूरी  धरा,
गंगा , शिप्रा, गोदावरी,
हिम, ज्वालामुखी,
एवं  शांत समुद्र,
वात्सल्य ,करुणा, अनुराग,
सब की मुट्ठी बांधे,
वो ,हमारे आने और जाने,
पर आशीष छिड़कती,
हम हरे भरे रहे , ताकि !!

चोखट और आँगन ,
निहारता हूँ मैं, आज
अब  वो फुहारें , नहीं हैं,
वो मुट्ठी भी नहीं है,
जिनसे अमृत धार,
जिनसे हिम ,
जैसे बरसती थी,
तुम, पनपती असुरक्षा,
विफलता के ज्वालामिखी पर ,
और शांत  हो जाते थे,
उफनते कई , ज्वार भाटे !!

माँ - आज तुम नहीं हो !!
मैं हूँ , माँ तुम भी हो ,
मेरे जीने में  !
तुमने जीना सिखाया है,
सो , जी रहे हैं !!  

<>>< मनीष सिह ><<>

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