इच्छाएं पिघलती है !
जब स्नेह की,
अपनत्व की,
गर्माहट लिए,
बढ़ते है हाथ,
किसी अपने के,
शब्दों के रूप में !
जैसे उड़ जाती है,
सुर्ख सर्दी की भोर,
गर्म चाय की
भाप संग !!
यायावर,
किन्तु एकांकी,
अंतर्मन की सघनता,
पिघलती है,
गतिमान होती हैं,
अनगिनत इच्छाएं,
जब मिलते हैं,
रेल एवं पटरी
सरीखे हम ,
आप संग !!
~~~*~~ मनीष सिंह ~~~*~~
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