वो,
रोज़ गलियों से,
निकलते हुए,
इसके उसके,
सबके,
हाल, जान लेता !
शब्दों से,
कैसे हो,
क्यों, कैसे,
कब हुआ,
कुछ चाहिए,
इत्यादि, इत्यादि !
सब संतुष्ट,
परिचित से !
गलियों के वही,
टूटे पत्थर,
उखड़ी इटें,
कोने का कचरा,
प्रथीक्षा में,
उसके शब्दार्थ भी !
प्रक्रिया,
अपरिचित होने की,
आयुनुरूप,
चलती रहती है !
<^><^ > मनीष सिंह <^><^>
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