Friday, March 8, 2013

प्रक्रिया, अपरिचित होने की !

वो,
रोज़ गलियों से,
निकलते हुए,
इसके उसके,
सबके,
हाल, जान लेता !

शब्दों से,
कैसे हो,
क्यों, कैसे,
कब हुआ,
कुछ चाहिए,
इत्यादि, इत्यादि !

सब संतुष्ट,
परिचित से !

गलियों के वही,
टूटे पत्थर,
उखड़ी इटें,
कोने का कचरा,
प्रथीक्षा में,
उसके शब्दार्थ भी !
प्रक्रिया,
अपरिचित होने की,
आयुनुरूप,
चलती रहती है !

<^><^ > मनीष सिंह <^><^>


No comments:

Post a Comment