" " ......जब हस्ताक्षर बनते हैं !! " "
हम सब आज किसी न भाषा में अपने होने का प्रमाण " हस्ताक्षर " के रूप में देते हैं !
कालेज में होने वाली किसी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए भरे गए फॉर्म की बात हो ये फिर संयोग से मिले किसी वजीफे ( स्कोलरशिप ) के चेक को भुनाने की लिए खोले गए पहले बचत खाते की बात !!
संभवतः हर इंसान के जीवन में एक ऐसा वक़्त होता है जब वो किसी न किसी अपने आसपास के व्यक्ति से प्रभावित होते हैं ....:
1. उसके पहनावों से,
2. उसके बोलने से तरीके से ,
3. उसके चलने के तरीके से,
4. उसके हस्ताक्षर से .....
आठवीं क्लास से ही हम कोशिश करने लगते हैं हस्ताक्षर करने की ... अपनी पहचान बताने की दुनिया को ...अपने न केवल अपने कार्यो से बल्कि अपने हस्ताक्षर से हमेशा के लिए स्थापित हो जाने की कोशिश करने लगते हैं ...ये समझते हुए की हम अपने नाम के प्रथम अक्षर से शुरू कर के रेखाओं को विभिन्न प्रकार से घूमाते हुए अंत में कभी कभी एक , दो ये फिर अनेक बिन्द्दियों से खतम कर के एक ये दो छोटी रेखाएं बना का ख़तम कर देना और बस हो गए हस्ताक्षर !!
बड़े बड़े पदों पर आसीन लोगो के हस्ताक्षर , बड़े बड़े स्थापित लोगो के हस्ताक्षर .. जैसे वैज्ञानिक , खोजकर्ता , राजनेता , अभिनेता इत्यादि ....!
कितने ही लोग हैं की हस्ताक्षर के करने के तरीके से पता कर लेते हैं की : -
हस्तक्षर करने वाला क्या है ? कहाँ तक आगे जाएगा ? किस छेत्र से है ? उसके जीवन में किस तरह के उतार चढ़ाव आयेंगे या आ चुके हैं ? मुझे ये नहीं समझ आता की जब हस्ताक्षर हम सवयं ही अपने हस्ताक्षर बनाते हैं तो क्या हम भविष्य ...जी हाँ हम अपना भविष्य बना सकते हैं क्या , अपने हस्ताक्षर के माध्यम से ?
दसवीं , बारहवीं, स्नातक और आगे की पढ़ाई के हर फॉर्म पर किये जाने वाले आपके हस्ताक्षर हर बार पिछले किये गए से ज्यादा बेहतर और परिष्कृत होते जाते हैं ....जसे जसे आप का ज्ञान और संपर्कों की परिधि बढ़ती जाती है तो भविष्य का व्यास पुनर्परिभाषित होता जाता है ....हस्ताक्षरों के माध्यम से ....और हम बड़े होते जाते हैं , जिम्मेदार और अपने आस पास की जुड़ती नई पीढ़ियों के लिए एक बार पुनः आदर्श के रूप में बनती हुई !!
धीरे धीरे ....हम बड़े हो रहे होते हैं ....जब हस्ताक्षर बनते हैं !!
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