01.05.1992 को लिखा मेरा एक गीत ......संग्रहण से .....
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तम घुल रहा तरु झूमते ,
अब भोर गाती है , सुनो !
सूर्य निर्मित नव - धुनें ,
इस और आती हैं , सुनो !!
<><><><> पहला अंतरा <><><><>
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तम घुल रहा तरु झूमते ,
अब भोर गाती है , सुनो !
सूर्य निर्मित नव - धुनें ,
इस और आती हैं , सुनो !!
<><><><> पहला अंतरा <><><><>
हर कली पर, थी निशा भर,
मौनता छाई हुई,
श्वेत चन्दा की किरण भी,
आईं शरमाई हुई !
बांटता फिरता था सुरभि,
जब कभी शीतल पवन,
जिस से शीतल हो रही थी ,
मौन वृछो की तपन !!
शून्य तकते पत्थरों से,
आज निर्झर कह रहे ,
पर्वतों पे अब किरण कुछ ,
शोर लाती हैं , सुनो ......!!
भोर गाती है सुनो ....
<><><><> दूसरा अंतरा <><><><>
दूर तक धरती सजीली,
श्याम रंग से थी रंगी,
ओस की बूंदों में लिपटी ,
दूब कोमल थी सजी !!
जिनको गाता था पवन,
वो स्वर चलो फिर से भरें,
उन स्वरों संग सूर्य किरणे,
आज अम्बर से झरें !!
सूर्य नव कुछ रच रहा ,
अब "तूलिका" किरणे बनीं,
जो शिखर के व्योम पर ,
कुछ नव रचाती हैं सुनो !!
भोर गाती है , सुनो ........
::::::::::::::::: मनीष कुमार सिंह - 01.05.1992 में लिखा एक गीत :::::::::::::::::
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