Wednesday, October 24, 2012

.... नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!

              दिल्ली के आकाशवाणी भवन से बाहर निकला तो मेरे हाथ में एक निमंत्रण पत्र था जो उस दिन से मुझे दस दिनों पूर्व सन 1991 में एक सामान्य डाक से मिला था !
                आकाशवाणी के युववाणी के लिए कुछ कविताएँ रिकार्ड करवाने के लिए !
तकरीबन 10 मिनिट्स के लिए 2 गीत मैंने रिकार्ड करवाए अपने अन्य साथीयों के साथ !! वो बड़ा ही सुनेहरा दिन था , तीसरी बार आया था मेरे सामने ये समय , हर बार मैं कुछ सीखता ही जाता था !! 

                रिकार्डिंग के 10वें दिन एक चेक मिला " भारतीय स्टेट बैंक , संसद मार्ग " का एक पत्र के साथ जिसकी पहली पंक्ति को पढ़ कर लगता है जैसे की आप ने ना जाने कितना देश हित का कार्य कर दिया और किसके लिए आपको पारितोषिक दिया जा रहा है .... लिखा है ( है इस लिए लिख रहा हूँ क्यों की वो पत्र अब भी है मेरे पास ) " भारत के राष्ट्रपति की और से .....आपको दिनांक ......आपके द्वारा किये गए कविता पाठ के लिए प्रति पाठ रूपये मात्र 100/- संलग्न चेक भेजा जा रहा है जिसकी अवधि 6 माह है ( अब 3 माह हो गयी है ) ! अब उन दिनों मेरे पास कोई बैंक अकाउंट नहीं होता था  तो ये चेक कहाँ जमा करूं !! किसी बैंक में अकाउंट खुलवाना 1991 - 1995 में कितनी बड़ी बात और पेचीदा बात होती थी ....जो लोग उस समय के होने को पता होगा और मेरे से इत्तेफाक रखेंगे !!   एक रास्ता निकला !! एक बायलर बनाने वाली कंपनी के मालिक स्वर्गीय श्री संजीवा तानिय्यापा सुवर्णा जी के सबसे छोटे बेटे को हिंदी पढ़ता था तो उनकी पत्नी जी ने मेरा अकाउंट अपने बैंक " विजया बैंक " नवयुग मार्किट में खुलवा दिया ! मैंने चेक जमा करवाया और पुछा की सर कितने दिनों में पैसा आ जायगा ?

          मैं पंद्रह दिनों के बाद अपने बैंक पहुंचा ! सुबह के 10.15 बज रहे थे ! सरकारी बैंक अब भी 10 बजे ही खुलते हैं और पब्लिक डीलिंग 2 बजे बंद हो जाती है ! अजीब सी बात है ! अपना ही पैसा ! अपने ही काम के लिए किसी दुसरे की सुविधा के अनुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं !! कमाल है भाई ! वैसे आज कल कुछ निजी बैंकों ने फिर से सरकारी कर्मचारियों को थोडा और समय पर काम करने के किये मजबूर किया तो है !!   खैर हमें अपने सामने बैठे अधिकारी को पुछा की साहब ज़रा मेरे अकाउंट का बैलेंस देख कर बता दीजिये !! ठीक है अपना अकाउंट नंबर बोलिए ....हमने बताया , उन्होंने एक बड़ी मोटी  सी लेज़र जो की दो मोटे मोटे काले काले लकड़ी के दो फ़ाइल नुमा पन्नों को पलते हुए देखा और सबसे आखरी पंक्ति को पढ़ते हुए कहा ...हाँ जी इतना बैलेंस है ... मैंने हिसाब लगाया ...अरे अभी तो वही है जो खाता खुलवाते हुए था ...उन्होंने पुछा कब खुलवाया था ? 15 दिन पहले ....!! अच्छा रुकिए !!उन्होंने कहाँ ...हाँ रुकिए ..एक एंट्री करनी बाकी है ....हाँ अब इतना है !!

            सही रकम के बारे में आश्वस्त होने के बाद मैंने कहा कुछ पैसे निकलवाने हैं !! उन्होंने एक विद्रोवल फॉर्म मेरी और बढ़ा दिया ...इस को भर दीजिये ...! हमें भरा ! फिर उनको दिया !! उन्होंने एक टोकन नुम्बर उस पर लिखा और मुझे एक पीतल का टोकन दे दिया मुझे और कह दिया की वहां बैठ जाइए ...जब ये नंबर पुकारा जाए तो केश काउंटर पर जा कर पैसे ले लीजियेगा !! हम जैसे एकदम विजयी मुस्कान के साथ वहां रखे एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गए और अपने चेक की यात्रा को देखने लगे !!
          सबसे पहले टोकन देने वाले साहब ने टोकन दिया और टोकन नुम्बर लिखा विठ्राल फॉर्म पर ! फिर वो चेक चला गया एक और वरिष्ठ अधिकारी के पास , उन्होंने फिर से उसी मोटी सी फ़ाइल को पलता और बस दो बार में ही मेरे अकाउंट वाला पेज निकाल लिया , और समान्तर ही कम्प्यूटर पर कुछ देखा ....और कुछ किया ...बाप रे  उसको करते हुए वो साहब कुछ कुछ सामंजस में थे ....पर कुछ कर गए ...! अब अगले काउंटर पर चेक गया ! ये काउंटर सब से महत्वपूर्ण !! अगर यहाँ से पास हो गया तो पैसा मिलेगा नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!  वहां क्या क्या की हुआ ..... पहले तो उन्होंने देखा ....टोकन नंबर लिखा है की नहीं , फिर दो मैन्युअल लेज़र में एंट्री है तो उसके होने के प्रमाण सवरूप पहले अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं , फिर वो ही एंट्री कम्पुटर में है की नहीं ....अगर हैं तो उसके होने के प्रमाण सवरूप दुसरे अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं ....चलिए ये दोनों तो मिल गए ...अब बारी आई ...मेरे हस्ताक्षर मिलाने की .... उन्होंने अपने सामने रखी एक अलमारी में करीने से रखे कुछ छोटे छोटे गट्ठों में से मेरे एकाउंट्स के नुम्बर वाले गट्ठे को निकला और वो ही कार्ड निकला जिसमे मेरे दो नमूना हस्ताक्षर थे ...उनसे मिलान किया गया ...तब सब ओके मिला तो वहां से अगले काउंटर पर दिया गया ...वहां नंबर से सैम को बुलाया जा रहा था ... लगभग 15 मिनट्स के बाद मेरा नंबर आया ...मेरा चेक मेरी तरफ ही बढाते हुए उन्होंने कहा अपने हस्ताक्षर कीजिये ...ये कन्फर्म करने के लिए की में ही हूँ ...जिसने वो चेक सबसे पहले काउंटर को अपना चेक दिया था !! और पूरे 1 घंटे के बाद मुझे मेरे ही पैसे मिले .. वाह वो ज़माना !!  और आज सिर्फ एक क्लिक करने के बाद हम निश्चिंत हो जाते हैं की हमारा पैसा सही जगह पर सही समय पर पहुच गया !! मुझे याद नहीं की आजकल मैं अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से कब गया होऊंगा !! जब आज कल की सुविधाएं नहीं थीं तब ये चाहिए था किन्तु ये भी सही है की 50% लोग ...अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से नहीं जाते और ये तक नहीं जानते की वो लोग जो ये सुविधाएँ दे रहे हैं वो दिखने में कैसे हैं .... !! अरे ये क्या बात कह दी मैंने ..ज़रुरत क्या है उनको देखने की ? काम हो रहा है ना !! भाई तो कम तो तब भी होता था लेकिन हम उनको देख पाते थे और मन की भड़ास निकल पाते थे ...पर आज समय पर काम हो रहा है तो भी उनको साधुवाद नहीं दे पाते ...हाँ मन में हुआ तो कस्टमर केयर पर एक इ मेल छोड़ देते हैं .......लेकिन सुना है की इन बैंकों के दफ्तर काफी बड़े और सुन्दर होते हैं ....और कर्मचारी ड्रेस कोड में रहते हैं ...सब सामान दिखने के लिए ...क्यों की सरकारी सोपानो पर  आरक्षण का सहारा भी होता है ना म उस पर ना असर पड़े इस लिए !! 
                     
         


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